कूड़ा चुनने वाली ज्योति आज पटना में चलाती हैं कैफ़े, रेनबो होम ने संवारा भविष्य

कई बार जीवन में हमें जो हासिल करना होता है उस रास्ते में कई बाधाएं होती हैं, लेकिन फिर भी हम उसे हासिल करने की जी तोड़ कोशिश करते हैं और आखिर में उसे हासिल भी करते हैं. ये लाइन कई लोगों को थोड़ी फ़िल्मी लग सकती है लेकिन ये ज्योति की ज़िन्दगी की हकीकत है. ज्योति, जो पटना जंक्शन पर कूड़ा चुनने और भीख मांगने का काम करती थी आज पटना के मजिस्ट्रेट कॉलोनी में एक कैफ़े चलाती हैं.


और पढ़ें- #Bihar के युवाओं की अनूठी मुहिम, रद्दी अखबार से बना रहें हैंडबैग


ज्योति का जन्म कहां हुआ ये उसे पता नहीं है लेकिन जब वो 1 साल की थी तब उसे पटना जंक्शन के पास छोड़ दिया गया था. ज्योति को पटना जंक्शन के पास दातुन बेचने वाली महिला ने पालना शुरू किया. उसके बाद ज्योति भी पटना जंक्शन पर कूड़ा चुनने और भीख मांगने का काम करती थी. लेकिन ज्योति के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव आया जब 13 साल की उम्र में वो रेनबो होम में आयीं. रेनबो होम, ऐसे बच्चों के लिए जिनके मां-बाप नहीं होते हैं या उन्हें पालने में असक्षम होते हैं, उनके लिए एक आश्रय गृह होता है. राजवंशी नगर में स्थित रेनबो होम रेनबो होम में ज्योति की परवरिश हुई और वो यहीं पर पली बढीं.  

(लेमन कैफ़े में काम करती ज्योति)

रेनबो होम ने उनके जीवन में क्या बदलाव लाया इसके बारे में बात करते हुए ज्योति कहती हैं:-

जब मैं रेनबो होम में गयी तो मुझे पढ़ाई करने का बिल्कुल भी मन नहीं करता था. तब विशाखा मम्मा (रेनबो होम की वार्डन) ने खेल के ज़रिये मुझे पढ़ाना शुरू किया. वो मुझे पेंटिंग के ज़रिये शब्द और इंग्लिश पढ़ाती थी. उसके बाद मुझे पढ़ाई में दिलचस्पी हुई और फिर रेनबो होम की तरफ़ से मुझे स्कूल में दाख़िला दिलवाया गया. अगर विशाखा मम्मा नहीं होती तो हम ना पढ़ पाते ना जीवन में कुछ कर पाते.

रेनबो होम की स्थापना सरकार द्वारा इसी मकसद से की जाती कि जो बच्चे यहां आश्रय ले रहे हैं उन्हें बेहतर जीवन की संभावनाओं को तलाशना. रेनबो होम में पढ़ाई के साथ-साथ खेल और सांस्कृतिक पक्ष को निखारने का काम किया जाता है. डेमोक्रेटिक चरखा की टीम जब राजवंशी नगर के रेनबो होम पहुंची तो वहां पर स्थिति वैसी ही थी जैसा ज्योति ने बताया था. रेनबो होम में बच्चियों के सुविधा से सम्बंधित सभी चीज़ें मौजूद थी. सबसे अधिक ध्यान बच्चियों की साफ़-सफ़ाई पर दिया जाया है.

(रेनबो होम, राजवंशी नगर में खेलते बच्चे)

रेनबो होम के बारे में विस्तार से बताते हुए राजवंशी नगर रेनबो होम की संचालिका विशाखा कुमारी बताती हैं-

यहां पर बच्चे जिस सामाजिक परिवेश से आते हैं अगर उसमें हमलोग उन्हें सीधा किताब-कलम दे देंगे तो बच्चे उससे और दूर भागेंगे. इसके लिए हम लोगों ने ब्रिज कोर्स की शुरुआत की. जिसमें हम बच्चों को खेल में पढ़ाने का काम करते हैं. इसके साथ हम ये देखते हैं कि किस बच्चे को किस क्षेत्र में ज़्यादा रुचि है. अगर उनका मन कराटे में है तो हम कराटे की ट्रेनिंग दिलवाते हैं, अगर वो पेंटिंग करना चाहें तो हम उन्हें पेंटिंग की क्लास देते हैं. इससे बच्चों का सम्पूर्ण विकास होता है और आगे चल कर ये बच्चे कुछ अच्छा करते हैं.

साथ में रेनबो होम फाउंडेशन की बिहार प्रमुख विशाखा बताती है कि पटना में पांच सेंटर हैं, जिसमे ऐसे गरीब, अनाथ लड़के-लड़कियों को रखा जाता है और उन्हें शिक्षित कर आगे बढ़ाया जाता है. पढ़ाई में दिलचस्पी आने के बाद ज्योति ने मैट्रिक की परीक्षा दी और अच्छे नंबर से पास भी हुई. अभी ज्योति कैफ़े चलाने के साथ-साथ इंटर की परीक्षा की तैयारी भी कर रही हैं.

(रेनबो होम, राजवंशी नगर की संचालिका विशाखा कुमारी)

18 साल की उम्र हो जाने के बाद बच्चों और बच्चियों को रेनबो होम में रहने की इजाज़त नहीं है. इसलिए ज्योति ने काफ़ी कम उम्र से ही काम करना शुरू कर दिया था. पहले वो बतौर सेल्स गर्ल काम करती थी. अब 19 वर्षीय ज्योति कैफ़े के पास ही एक रूम किराए पर लेकर रह रही हैं. इसके अलावा ज्योति ने टिकरी आर्ट की भी ट्रेनिंग भी ली है और वो टिकरी आर्ट भी बनाती हैं. जिस उम्र में बच्चों को परिपक्व नहीं समझा जाता है उस उम्र में ज्योति सहित रेनबो होम में रहने वाली अनेकों बच्चियां अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए मेहनत कर रहे हैं. ये कहानी सिर्फ़ ज्योति की नहीं है. विशाखा बाकी बच्चियों की उपलब्धि की जानकारी देते हुए बताती हैं-


ज्योति ने जो काम किया वो काफ़ी बेहतरीन है. ज्योति के अलावा हमारी कई लड़कियां हैं जो सारे बंधनों को तोड़ते हुए आगे बढ़ रही हैं. हमारी दो बच्चियों का दाख़िला अभी बैंगलोर के लोयला डिग्री कॉलेज में साइकोलॉजी में हुआ है. इसके अलावा जो हमारी छोटी बच्चियां हैं वो इस छोटी उम्र में ही अनगिनत अवार्ड्स जीत चुकी हैं. हमारी 4 बच्चियां अभी दिल्ली में स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम में चुनी गयी हैं. इसके अलावा एक बच्ची मास कम्युनिकेशन की भी पढ़ाई कर रही हैं.

(रेनबो होम की बच्चियों द्वारा जीते गए पुरस्कार)

रेनबो होम के इस पूरे काम की वजह से बच्चियों के अंदर आत्मविश्वास आया कि वो अपनी ज़िन्दगी में बहुत कुछ हासिल कर सकती हैं. पहले जो ये बच्चियां भीख मांगने या कूड़ा चुनने पर आश्रित रहती थी अब उनके जीवन में सबसे बड़ा बदलाव ये आया है कि वो अब किसी पर आश्रित नहीं हैं.

(रेनबो होम में बच्चों की लाइब्रेरी)

पटना के गांधी मैदान से लेकर पटना जंक्शन के रास्ते में अनगिनत बच्चे हैं जो अभी भी भीख मांगने का काम करते हैं. लेकिन उन्हें ये मौका भी नहीं मिल पाता है कि वो अपने भविष्य को बेहतर बना सकें. इस मामले पर बात करने के लिए डेमोक्रेटिक चरखा की टीम ने चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर पर कॉल किया लेकिन हेल्पलाइन नंबर किसी ने उठाया ही नहीं. इसके बाद जब चाइल्ड केयर में डेमोक्रेटिक चरखा की टीम पहुंची तो जानकारी मिली कि कोरोना की वजह से अभी बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित है.

सरकार की रेनबो होम योजना कुछ जगहों पर काफ़ी अच्छा काम कर रही है जिससे बच्चों का भविष्य सुधर रहा है. लेकिन अभी भी सरकार को इसके विस्तार पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है.

निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता ज़रूरी है

आपके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आपके लिए ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स पब्लिश करता है जिससे आपको फ़र्क पड़ता है
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.