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पटना: अस्पतालों के बाहर बायोमेडिकल कचरे का अंबार, इस्तेमाल हुई सुईयों से कई बीमारियों का ख़तरा

अशोक राजपथ: ख़ुदाबक्श लाइब्रेरी के सामने स्थित अरविंद हॉस्पिटल के परिसर में खुले में फैला मेडिकल कचरा अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का प्रत्यक्ष उदाहरण है. अस्पताल कैंपस में खुले में इस्तेमाल की गई सुईयां, ग्लव्स, दवाइयों के बोतल, इस्तेमाल की गयीं रुई और बैंडेज आदि पड़े हैं. अस्पताल परिसर के अंदर बैंक होने के कारण सामान्य लोग भी यहां से रोज गुजरते हैं. जिनका सीधे या परोक्ष रूप से इन कचरों से रोज़ संपर्क होता है. 

खतरे को लेकर गंभीर नहीं अस्पताल

पटना के सरकारी और कुछ बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल को छोड़ दें तो अधिकतर हॉस्पिटल मेडिकल वेस्ट को नष्ट करने के लिए गंभीर नहीं है.

राजधानी पटना की सच्चाई यह है कि यहां छोटे-बड़े नर्सिंग होम, हॉस्पिटल और पैथोलॉजी के साथ अन्य जांच केंद्र मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट (medical waste treatment) एजेंसी को मेडिकल वेस्ट नहीं दे रहे हैं. वह खुले में ही मेडिकल वेस्ट को ठिकाने लगा रहे हैं जो पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है.

मेडिकल वेस्ट पर्यावरण में पहुंचने के बाद उसे प्रदूषित करता है जिसके बाद यह इंसानों और जानवरों के लिए खतरनाक हो जाता है. कोरोना महामारी के बाद इससे फैलने वाला खतरा और भी बढ़ गया है.

राज्य के अधिकांश जिलों के अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट को लेकर एक ही जैसा हाल है. जब राजधानी पटना में अस्पतालों के हालात ऐसे हैं तो ग्रामीण इलाकों के अस्पताल क्या कर रहे होंगे इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

पटना जिले में बायोमेडिकल वेस्ट को कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (Bio- medical waste treatment) में ट्रीट करने के लिए प्राइवेट कंपनी को टेंडर दिया गया है. जिले में इस तरह के कचरे के उचित तरीके से निपटारे के लिए संगम मेडिसर्व प्राइवेट लिमिटेड को जिम्मेदारी सौंपी गई है.

अरविन्द हॉस्पिटल के एक कर्मचारी ने हमें नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि कचरे का निस्तारण ठीक से नहीं किया जाता है. अस्पताल कर्मी के अनुसार

बायो मेडिकल वेस्ट में से अस्पताल के सफ़ाई कर्मचारी ऐसे कचरे को अलग कर लेते हैं जिन्हें कबाड़ी में बेचा जा सकता है. बाकि बचे कचरे को या तो जला देते हैं या फिर निगम की गाड़ी को ही दे देते हैं.”

वहीं अस्पताल के सुपरवाइजर ओम प्रकाश तिवारी कचरे के उचित निष्पादन नहीं होने की बात मानने से इंकार करते हैं. उनका कहना है कि

“अस्पताल में रोज 5 से 6 किलो बायो मेडिकल कचरा पैदा होता है. मरीज़ की संख्या बढ़ने-घटने पर इसमें बदलाव होता है. बायो मेडिकल कचरे को अलग-अलग करके रखा जाता हैं. इस मेडिकल कचरे को लेने के लिए आईजीआईएमएस (IGIMS) से गाड़ी आती हैं.” 


क्या अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट
(Medical waste) को लेकर जागरूकता (awareness) है?

संगम मेडिसर्व प्राइवेट लिमिटेड के कार्यकारी अधिकारी (Director) हरि ओम शरण द्विवेदी ने हमें बताया कि उनके पास सरकारी और निजी अस्पतालों से बायो मेडिकल कचरे (Bio medical waste) को इकट्ठा करने और उसके निपटारे का ज़िम्मा है.

द्विवेदी डेमोक्रेटिक चरखा से बातचीत करते हुए बताते हैं

“पटना के अस्पतालों में जागरूकता की कमी हैं. वे लोग बायो मेडिकल कचरे को अलग नहीं करते हैं. कई बार अस्पताल वाले बायो मेडिकल कचरे में अन्य कचरों जैसे खाने-पीने के बचे सामान, अन्य कामों में इस्तेमाल हुए कागज और प्लास्टिक को भी मिला देते हैं. तब हम इस तरह के कचरे नहीं लेते हैं.”

द्विवेदी कहते हैं

“हमारे पास कचरे को उठाने और उसके निपटारे का टेंडर है. लेकिन हम केवल वही कचरा इकट्ठा करता है जिसे नियमों के अनुसार तरीके से संबंधित रंग के बैग में अलग-अलग करके रखा गया होता है. लेकिन जिन अस्पतालों में बायो मेडिकल कचरे को मिला कर भी रखा गया होता है हम उसे भी ले लेते हैं और उसे प्लांट पर लाकर अलग करके नष्ट करते हैं.”

बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट सुविधाएं होने के बावजूद भी, जिले में मिश्रित बायोमेडिकल कचरे को अन्य कचरों के साथ मिलाकर खुले में फेंका जा रहा है.

इसपर द्विवेदी कहते हैं

“देखिए शहर में जागरूकता (Awareness) की कमी है. हमारे प्लांट में 15 टन कचरे के ट्रीटमेंट की क्षमता है, लेकिन रोज शहर से मात्र तीन से साढ़े तीन टन कचरा ही हमारे पास पहुंच रहा है. कोविड से पहले तक हमारे पास 4200 के करीब मेडिकल संस्थान कचरा देने के लिए निबंधित थे. लेकिन कोरोना के बाद 1600 के करीब संस्थान बंद हो गए जहां से अब कचरा नहीं दिया जा रहा है.”

बायो- ट्रीटमेंट प्लांट्स की है कमी

राज्य के चार जिलों पटना, गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर में अभी कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट काम कर रहे हैं. इन मेडिकल वेस्ट को नष्ट करने के लिए राज्य में तीन एजेंसियां काम कर रही हैं. इसमें पटना में संगम मेडिसर्व, मुजफ्फरपुर में मेडिकेयर, भागलपुर और गया में सिनर्जी वेस्‍ट मैनेजमेंट.

एक आंकड़े के अनुसार बिहार राज्य में सरकारी और निजी मिलाकर 15 हज़ार से अधिक स्वास्थ्य सुविधा केंद्र चलाए जा रहे हैं. लेकिन इन केन्द्रों से निकलने वाले सैकड़ों टन मेडिकल वेस्ट और बायो मेडिकल कचरे के निस्तारण के लिए सिर्फ चार बायो मेडिकल वेस्ट प्लांट ही हैं. जबकि केंद्र सरकार की मार्गदर्शिका के अनुसार स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों के हिसाब से राज्य में ऐसे प्लांट की संख्या 10 होनी चाहिए.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने राज्य में निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए बायो मेडिकल वेस्ट प्लांट बढ़ाए जाने का निर्देश दिया था. जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग और राज्य प्रदुषण नियंत्रण परिषद ने बैठक कर चार और बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाने का निर्णय लिया है.

ये प्लांट प्रदुषण नियंत्रण परिषद द्वारा मधुबनी, पूर्णिया और गोपालगंज में लगाया जाएगा. इसके आलावे पटना में भी एक और ट्रीटमेंट प्लांट लगाया जाएगा. 

सामान्य कचरों से 100 गुना ज़्यादा खतरनाक

कोई भी कचरा जब बाहर फेंका जाता है तो वह किसी ना किसी तरह से जल, हवा या मिट्टी को प्रदूषित करता है. बायो-मेडिकल वेस्ट सामान्य कचरों से 100 गुना ज्यादा खतरनाक होता है. इसलिए इस प्रकार के कचरों को नष्ट करने को लेकर इंसीनरेटर का इस्तेमाल किया जाता है.

पटना के अधिकांश हॉस्पिटल के आसपास बायो मेडिकल वेस्ट फेंके हुए नज़र आते हैं. हॉस्पिटल लोगों की बीमारी ठीक करते हैं वहीं दूसरी ओर यही अस्पताल लोगों को बीमार करने वाले मेडिकल वेस्ट भी खुले में फेंक देते हैं.

कोविड के बाद से मेडिकल वेस्ट की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. कोरोना संक्रमित मरीज़ों द्वारा इस्तेमाल किये गए ग्लव्स, किट और मास्क आदि यदि हवा के संपर्क में रहते हैं तो इसके कीटाणु हवा में पहुंच सकते हैं. कोरोना महामारी के बाद से इन कचरों को लेकर और ज्यादा सावधानी बरतें जाने की आवश्यकता है.

वहीं कोविड से पहले हेपेटाईटिस और एड्स संक्रमित मरीजों के इलाज में इस्तेमाल हुए मेडिकल वेस्ट ज़्यादा खतरनाक माने जाते थे.  

कचरे को रखना है अलग-अलग रंग के प्लास्टिक बैग में

अस्पतालों से निकलने वाला सभी तरह का कचरा – चाहे वो सर्जरी से निकले, या दवाइयों से, या इलाज के दौरान निकलने वाली चीजें हों – ये सब बायोमेडिकल वेस्ट होता है. इस कचरे के निपटारे के लिए सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) ने गाइडलाइन्स बना रखी है. मेडिकल वेस्ट की हैंडलिंग (clinical waste treatment), ट्रीटमेंट और डिस्पोज़िंग का काम सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के तहत करने का नियम बनाया गया है.

आंकड़ों के अनुसार एक मरीज़ यानी एक बेड से 24 घंटे में 240 ग्राम कचरा निकलता है. इसमें लाल, पीला, उजला और नीले चार तरह का कचरा होता है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तैयार किए गए अस्पताल कचरा प्रबंधन (clinical waste management) नियम के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्र पर कचरे को अलग-अलग रंग के बैग- पीले, लाल, सफेद और नीले रंग में अलग किया जाना चाहिए.

लाल में दूषित अपशिष्ट जैसे- प्लास्टिक के पाउच, किट, टयूबिंग बोतल, इंटरावेनस ट्यूब और सेट, कैथेटर, मूत्र बैग, सुई के बिना सीरिंज, सुइयों के साथ फिक्स्ड सुई सिरिंज, और दस्ताने जैसे डिस्पोजेबल कचरे आदि. पीला में मानव या जानवर के कटे अंग और उत्तक, खून से सने रुई, पट्टी, खून या यूरिन के बैग, स्टॉक या सूक्ष्मजीवों के नमूने, टीके आदि, उजला में नुकीला पदार्थ जैसे- सुई, सुई लगा सिरिंज, ब्लेड आदि तथा नीले में कांच की शीशी व टूटे या फेंके गए और दूषित कांच के अन्य सामान होते हैं.

ये मानक भारत सरकार द्वारा तय किये गए हैं और इसी के हिसाब से हॉस्पिटल से निकलने वाले वेस्ट को ट्रीट करना है. अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट का आंकड़ा भी इसी से लगाया जाता है. तय मानक के आधार पर मेडिकल वेस्ट का ट्रीटमेंट नहीं करने पर अस्पतालों के ऊपर कार्यवाही करने के नियम भी बनाये गए हैं.

क्या कहना है सरकारी अधिकारी का?

पटना के सिविल सर्जन कमल किशोर राय का कहना है कि

“पटना में अब किसी अस्पताल द्वारा बायो-मेडिकल कचरा खुले में नहीं फेंका जा रहा है. लगभग सभी अस्पतालों का निबंधन कचरा देने के लिए किया जा चुका है और जिनका नहीं हुआ है उन्हें जल्द से जल्द निबंधन करवाने का निर्देश दिया गया है.”

राय आगे कहते हैं

“यदि सामान्य कचरों में बायो मेडिकल कचरा किसी अस्पताल द्वारा दिया जा रहा है तो इसकी निगरानी निगम के कर्मियों को करनी चाहिय. शिकायत मिलने पर अस्पतालों के ऊपर करवाई करने का नियम है.”

कब अस्पतालों में फैलेगी जागरूकता?

आमजन अस्पतालों में इलाज के लिए जाते हैं लेकिन अस्पतालों में फैली गंदगी की वजह से कई बार और अधिक बीमार हो जाते हैं. अस्पतालों को चाहिए कि जो भी बायोमेडिकल वेस्ट उनके अस्पताल से निकलते हैं उन्हें सही से ट्रीटमेंट प्लांट तक भेजें. साथ ही प्रशासन को इस पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए.

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