बिहार में मनरेगा में कम ग्रामीणों को मिल रहा काम, फिर से हो रहा पलायन

कोरोना महामारी के समय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार के सभी मज़दूर वापस आ जायें, उन्हें बिहार में ही काम दिया जाएगा और साथ ही अब उन्हें बाहर जाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी. रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून 2020 में 50 हज़ार करोड़ रूपए के ‘प्रधानमंत्री ग़रीब रोज़गार अभियान’ का शुरुआत किया था. जिसके तहत 3 महीने के लिए रोज़गार देने का वादा किया गया था. इस योजना में 6 राज्यों का चयन किया गया था जिसमें बिहार भी एक राज्य था. बिहार के 32 जिले इस योजना के तहत आये थे. प्रधानमंत्री मोदी ने 20 जून को इस योजना की घोषणा करते हुए वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये कहा था कि जो मज़दूर अपने गांव वापस लौटे हैं उन्हें उन्हीं के गांव में काम दिया जाएगा.

इससे पहले साल 2006 में मनरेगा की शुरुआत यूपीए के शासन काल किया गया था. इस योजना के तहत एक परिवार को न्यूनतम 100 दिनों का रोजगार देने का वादा किया गया है.

लेकिन ये घोषणा उन मज़दूरों के लिए नाकाफी थे जिन्हें अपने घर परिवार के भरन पोषन के लिए कमाना होता है. मज़दूरों का कहना है कि कौन अपने घर परिवार के पास रहकर नहीं कमाना खाना चाहता है. लेकिन मजबूरी ऐसी है कि हमे बाहर जाना ही पड़ता है. यहां रहेंगे तो हमारे बच्चे क्या खाएंगे? रोजगार के नाम पर जो काम मिलता भी है उसमे उतनी मज़दूरी नहीं मिलती कि हमारा घर चले. जबकि बाहर इसी काम का दुगना पैसा मिलता है.

बिहार इकोनॉमिक सर्वे बताता है कि बिहार की एक फैक्ट्री में काम करने वाले वर्कर को हर साल 1.29 लाख रुपए मिलते हैं. वहीं, पड़ोसी राज्य झारखंड में हर वर्कर को सालाना 3.44 लाख मिलते हैं. बिहार की एक फैक्ट्री औसतन 40 लोगों को रोजगार देती है. वहीं, हरियाणा में एक फैक्ट्री औसतन 120 लोगों को रोजगार देता है.

बिहार से बाहर कमाने गए मजदूरों को पहले तो अपने घर से दूर अपने राज्य से दूर जाकर कमाने खाने का गम था. वहां के माहौल में ढलकर रहना और खाने और रहने का इंतजाम करना भी एक चुनौती रहती है. आए दिन उनके साथ दुर्व्यवहार की ख़बरें आती रहती हैं. अभी पिछले साल अक्टूबर महीने में जम्मू कश्मीर में चार बिहारी मजदूर कि आतंकवादियो ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस घटना के बाद बिहार से जम्मू कश्मीर कमाने गए लोगों के परिजन की चिंता बढ़ गयी.

इस घटना के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि

सरकार की योजना है की कोई मजबूरी में बाहर कमाने न जाए, इसके लिए राज्य में कई तरह के रोजगार के अवसर मुहैया कराए गए हैं.

लेकिन ये दावा कितना सही है ?

साल 2011 के जनगणना के आंकड़ें बताते हैं साल 2001 से 2011 के बीच 93 लाख बिहारियों ने अपने राज्य को छोड़कर दूसरे राज्य में पलायन किया था. देश की पलायन करने वाली कुल आबादी का 13 प्रतिशत केवल बिहार से है. जो पूरे भारत में उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज़्यादा है.

मात्र एक से तीन प्रतिशत मजदूर को ही मिला 100 दिन का रोजगार

पिछले महीने कैग की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ था कि बिहार में 2014 से 2019 के बीच केवल 1 से 3 प्रतिशत मजदूरों को ही 100 कार्यदिवस का रोज़गार मिला था. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक(सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार का रोजगार देने का वादा खोखला साबित हुआ है. बिहार में भूमिहीन मजदूरों की संख्या देश में सबसे ज़्यादा है. बिहार में मनरेगा में निबंधित मज़दूरों की संख्या 8 से 10 प्रतिशत है. राज्य में भूमिहीन मजदूरों की संख्या 88.61 लाख हैं. लेकिन रोजगार मांगने के इच्छुक 90 हजार लोगों में 3.34% का ही जॉब कार्ड है. इनमें भी केवल 1% लोगों को ही 100 दिनों तक काम मिला है. मनरेगा के तहत 100 दिन  काम देने की गारंटी होती है लेकिन इनमें अधिकतर लोगों को 34 से 45 दिनों का ही रोजगार दिया गया. सरकार का तर्क है कि कृषि कार्यों में ज़्यादा मजदूरी होने की वजह से मज़दूर मनरेगा में काम करने नहीं आते हैं. मनरेगा के तहत प्रतिदिन 177 रुपये मजदूरी तय है तो कृषि कार्यों में 300 के करीब मज़दूरी मिलती है.

पश्चिम चंपारण के डुमरी गांव की रहने वाली हिरामती देवी डेमोक्रेटिक चरखा से बातचीत के दौरान बताती हैं कि

हम जॉब कार्ड बनवाने के लिए कई बार दौड़े हैं. कई बार कोशिश किये हैं कि हमारे परिवार में से किसी को मनरेगा के तहत गांव में ही काम मिल जाए. लेकिन काम नहीं मिलने की वजह से अब मेरे पति और बेटा दूसरे शहर जाकर काम कर रहे हैं.

वर्ष 2014-19 के दौरान योजना निधि 11,181 करोड़ में से 10,960 करोड़ का ही उपयोग किया गया था. इस अवधि में राज्य  परिवारों द्वारा 33,642 रूपए मज़दूरी अर्जित किए थे, जो राष्ट्रीय औसत 37,639 रूपए से कम था. औसत मज़दूरी के मामले में बिहार का देश में 21वां स्थान था. पांच वर्षों यानी 2014 से 2019 तक मनरेगा के तहत रोज़गार देने का प्रतिशत 14 से घटकर 2 प्रतिशत हो गया है. इसके अलावा मनरेगा में निबंधित वरिष्ठ नागरिकों की संख्या 5 से 9 प्रतिशत और दिव्यांगों की संख्या 9 से 14 प्रतिशत हो गया है.

कटिहार के सेमापुर की रहने वाली फुलवंती देवी कहती हैं

हमारा जॉब कार्ड बना हुआ है, इसलिए हम कई बार काम मांगने के लिए रोज़गार सेवक का चक्कर लगा चुके हैं. 100 दिन तो बहुत दूर की बात है हमें बस 33 दिन ही काम दिया गया है.

जॉब कार्ड और मनरेगा की कार्यशैली को बेहतर तरीके से समझने के लिए डेमोक्रेटिक चरखा की टीम ने डुमरी गांव के पंचायत रोज़गार सचिव शंकर पांडेय से बात की. उन्होंने डेमोक्रेटिक चरखा से बात करते हुए जानकारी दी की

अधिकांश लोग जब कार्ड बनवा तो लेते हैं लेकिन मज़दूरी करने आते नहीं हैं. लेकिन फिर भी हमारी कोशिश यही रहती है कि किसी तरह से हम लोग ज़्यादा से ज़्यादा काम का सृजन कर सकें.

पिछले साल आई कैग रिपोर्ट से बिहार के मजदूरों की दशा साफ दिख रही है और कारण भी साफ झलक रहा है कि आखिर क्यों बिहार के मज़दूर बिहार से बाहर जाने को मजबूर होते हैं. एक तो उन्हें समुचित मज़दूरी नहीं मिलती है दूसरा उन्हें समुचित रोज़गार का अवसर भी नहीं मिलता है. इस साल भी चालू वित्तीय वर्ष में बिहार सरकार मनरेगा के तहत आवंटित 20 करोड़ मानव कार्यदिवस पूरा करने के लक्ष्य को पूरा करने में पिछड़ गया है.

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