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कोरोना महामारी में बिहार के दिव्यांगों के अधिकारों का हनन, ना राशि मिली और ना ही वैक्सीन

“कोरोना महामारी को रोकने के लिए अपनी बारी आने पर वैक्सीन ज़रूर लें”

भारत में लगभग सभी लोगों ने मोबाइल कॉल से पहले कोरोना वैक्सीन को लेकर ये जागरुकता संदेश तो ज़रूर ही सुना होगा. इस कॉलरट्यून के ज़रिये लोगों को कोरोना वैक्सीन को लेकर जागरुक किया जा रहा है. सरकार ने सभी को जागरुक तो कर दिया लेकिन सभी के लिए वैक्सीन का इंतज़ाम नहीं कर पायी. बिहार सरकार ने अभी तक दिव्यांग लोगों के लिए वैक्सीन या कोरोना जांच का कोई भी इंतज़ाम नहीं किया है और उनके अधिकारों को पूरे तरीके से ख़त्म कर दिया है. सेन्सस 2011 के मुताबिक बिहार में लगभग साढ़े तेईस लाख (2,331,009) दिव्यांग मौजूद हैं. इतनी बड़ी आबादी के लिए बिहार सरकार के पास ना तो कोई विज़न है और ना ही कोई प्लैन.

ममता भारती व्हीलचेयर यूज़र हैं. वो एक आर्टिस्ट हैं और मिथिला पेंटिंग्स बनाती हैं. ममता भारती को कहीं आने-जाने में काफ़ी तकलीफ़ होती है. जब लॉकडाउन लगा तो उनका रोज़गार भी पूरे तरीके से ख़त्म हो गया. लेकिन उनके लिए सबसे कठिन समय था जब वो कोरोना से पीड़ित थी. ममता बताती हैं

“मेरी तबीयत काफ़ी बिगड़ गयी थी लेकिन चाह कर भी कोई RT-PCR जांच के लिए नहीं आया. किसी तरह डॉक्टर से ऑनलाइन दिखाया और उन्होंने दवाएं दी. जब तबीयत और बिगड़ी तो डॉक्टर ने पानी चढ़ाने के लिए कहा लेकिन कोई भी नहीं मिला”

बिहार में किसी भी दिव्यांग व्यक्ति के लिए सरकार ने कोई भी ठोस कदम नहीं उठाये हैं. साल 2020 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने एक नोटिफ़िकेशन जारी करके ये कहा था कि दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कोरोना की जागरुकता, इलाज तथा अन्य सामग्री मुहैय्या कराई जाए. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के अनुसार-

The RPWD Act, 2016 provides that “the appropriate Government shall ensure that the PWD enjoy the right to equality, life with dignity, and respect for his or her own integrity equally with others.”

यानी सरकार को ये बात सुनिश्चित करनी है कि सभी दिव्यांगजनों को आम जनता की तरह ही बराबरी में रखा जाए. लेकिन बिहार सरकार ने इस अधिनियम की उपेक्षा ही की है. बिहार सरकार ने दिव्यांगजनों तक वैक्सीन या कोरोना जांच को पहुंचाने के लिए कोई कोशिश ही नहीं की. साथ ही केंद्र सरकार के नोटिफ़िकेशन में ये बात भी साफ़ तौर से कही गयी थी कि कोरोना सम्बंधित जानकारी को सरल तरीके से दिव्यांग व्यक्तियों तक पहुंचाई जाए. सरल तरीके से पहुंचाने का मतलब है कि इसे ब्रेल लिपि, टेप रिकॉर्डर और साईन भाषा में भी मुहैय्या कराई जाए. लेकिन कोरोना की जानकारी सामग्री तो पहुंचाना दूर की बात है, बिहार सरकार की सरकारी वेबसाइट जो दिव्यांगजनों के लिए है उसमें भी साईन भाषा के वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग नहीं है. इस नोटिफ़िकेशन के आने के 1 साल बाद तक बिहार सरकार ने दिव्यांगजनों के बीच जागरुकता फैलाने के लिए एक काम भी नहीं किया है. डेमोक्रेटिक चरखा ने बिहार सरकार की दिव्यांगजनों से सम्बंधित सभी वेबसाइट की जांच की लेकिन उसमें किसी भी तरह के आंकड़ें या जानकारी नहीं मिली. बिहार सरकार के सामाजिक कल्याण विभाग के ट्विटर से भी ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है जिससे ये बात प्रमाणित हो कि बिहार सरकार ने दिव्यांगजनों के लिए कोरोना महामारी में कोई काम किया है या नहीं.

ममता आगे बताती हैं,

मैं व्हीलचेयर पर हूं, मेरे लिए कहीं भी आना-जाना मुश्किल है और अगर मैं कहीं जाती भी हूं तो मेरे साथ एक व्यक्ति हमेशा चाहिए. सरकार के पास हमारी जानकारी है वो चाहे तो हमारे घरों पर वैक्सीन की सुविधा उपलब्ध करवा सकती हैं लेकिन सभी सरकारी योजनायें केवल कागज़ों पर ही मौजूद है

बिहार सरकार ने नियर-टू-होम (Near to home) वैक्सीन ड्राइव की घोषणा 2 जून 2021 को 60 साल से ऊपर के बुज़ुर्ग और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए की थी. इसके अलावा केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी दिव्यांग व्यक्तियों को घर पर वैक्सीन लगाने का आदेश दिया था. केन्द्रीय राज्य स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने अपने फेसबुक पोस्ट के ज़रिये 28 मई 2021 को ही ये ऐलान कर दिया था कि दिव्यांग व्यक्तियों को जल्द ही वैक्सीन दी जायेगी.

जब डेमोक्रेटिक चरखा ने नियर-टू-होम वैक्सीन के ज़रिये कितने लोगों को वैक्सीन लगी है ये आंकड़ें जानने चाहे तो विभाग ने कोई भी जानकारी नहीं दी. सामाजिक कल्याण एवं अधिकारिता मंत्रालय, बिहार के दिव्यांग सेक्शन से जानकारी ली तो उन्होंने कहा कि उनके पास अभी इसके कोई भी आंकड़ें मौजूद नहीं है. साथ ही उन्होंने राज्य आयुक्त निःशक्तता के कार्यालय में बात करने को कहा. राज्य आयुक्त निःशक्तता के कार्यालय में भी किसी के पास इससे संबंधित किसी तरह के आंकड़ें मौजूद नहीं है.

कुमारी वैष्णवी, विकलांग अधिकार मंच की अध्यक्ष हैं और सरकार के पास आंकड़ें नहीं रहने के बारे में बताती हैं

कोई आंकड़ा ही नहीं है क्योंकि कोई काम ही नहीं हुआ है. सरकार ने कहा था कि घर आकर वैक्सीन दी जायेगी और प्राथमिकता दी जायेगी लेकिन अभी तक इसपर किसी तरह का काम शुरू ही नहीं हुआ है. तो आंकड़ा कहां से रहेगा? हमें नहीं लगता है कि 1-2 दिव्यांगजनों को छोड़कर किसी और को वैक्सीन मिली है. वैक्सीन लेने के लिए काफ़ी लंबा प्रोसेस है इस वजह से वो वैक्सीन नहीं ले पा रहे हैं. एक तो घर से बाहर जाना उस पर से दूर जाना दिव्यांग व्यक्तियों के लिए संभव नहीं है. अभी तक सरकार ने दिव्यांग व्यक्तियों के बीच जागरुकता फैलाने का भी काम नहीं किया है

भारत सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के ओर से सभी राज्यों को 29 अप्रैल 2021 को एक पत्र जारी किया गया जिसमें दिव्यांग व्यक्तियों को वैक्सीन देने और साथ ही उनके जांच में उन्हें प्राथमिकता देने की बात सख्ती से कही गयी थी.

#DEPwD took up the matter with @MoHFW_INDIA to issue appropriate instructions to Central n State healthcare authorities to give priority to #Divyangjan in #COVID19 testing, treatment and vaccination.@TCGEHLOT @PIB_India pic.twitter.com/8EWUmRs0Y6

— Disability Affairs (@socialpwds) April 29, 2021

लेकिन अभी तक बिहार में प्राथमिकता देना का कोई भी काम नहीं किया गया है. बिहार के किसी भी जांच केंद्र पर दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अलग से लाइन या काउंटर की भी व्यवस्था नहीं की गयी है. पटना यूनिवर्सिटी के छात्र आफ़ताब देख नहीं सकते. अपने शैक्षणिक जीवन में उन्हें अपनी दिव्यांगता से दिक्कत हुई लेकिन उन्होंने उसे पार करते हुए अपनी पढ़ाई अव्वल दर्जे से की. अब जब बारी वैक्सीन लेने की आई तो वो पटना के IGIMS हॉस्पिटल में वैक्सीन लेने पहुंचे. ये हॉस्पिटल उनके घर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है. साथ ही उन्हें एक लंबी लाइन में इंतज़ार करना पड़ा फिर उन्हें ये बताया गया कि उन्हें पहले अपने स्मार्टफ़ोन से रजिस्टर करना होगा तब ही उन्हें वैक्सीन मिलेगी.

(पटना यूनिवर्सिटी के छात्र आफ़ताब)

सरकार ने जिस तरीके से दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई है उसके बारे में बताते हुए कुमारी वैष्णवी बताती हैं,

इस समय सभी को कोरोना से हुई मौत ही दिख रही है लेकिन सच्चाई तो ये है कि दिव्यांग व्यक्ति बिना कोरोना के ही मर रहे हैं. कई ऐसे दिव्यांग व्यक्ति हैं जिनका रेगुलर इलाज शहर के अस्पतालों में होता है और वो रहते गांव में हैं. एक तो लॉकडाउन में वो उतनी दूर दवाई लेने शहर आ नहीं पा रहे हैं और उनका काम ख़त्म हो जाने के कारण से अब उनके पास पैसे भी नहीं हैं. कई दिव्यांग व्यक्ति कॉल पर रो रहे हैं कि अब हम नहीं बचेंगे

इसके बारे में ज़्यादा जानकारी देते हुए कुमारी वैष्णवी बताती हैं,

बिहार में दिव्यांग व्यक्तियों को मुख्यमंत्री दिव्यांग विवाह योजना, 2016 के तहत राशि मिलनी थी जो पिछले 4 साल से अटकी हुई है. हमलोगों ने पटना हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की लेकिन 1 साल से वहां भी मामला अटका हुआ है. अगर लॉकडाउन के समय उनके पास ये पैसे होते तो शायद उन्हें इतनी तकलीफ ना होती

साल 2016 में बिहार में दिव्यांग विवाह योजना की शुरुआत हुई थी और इसमें 40% से अधिक दिव्यांगता के विवाह पर 50 हज़ार रूपए दिए जाने थे. अगर पति-पत्नी दोनों दिव्यांग हैं तो फिर ये राशि 1 लाख की हो जायेगी. लेकिन इसकी आवदेन की प्रक्रिया को पूरे तरीके से जटिल बना दिया गया है. साल 2020 में सिर्फ़ 30 लोगों ने इस योजना के तहत आवेदन दिया जिसमें में अधिकांश के आवेदन रिजेक्ट हो गए हैं. कृष्णा कुमार पटना के एक गांव मंझोली में रहते हैं.

कृष्णा कुमार और उनकी पत्नी सविता कुमारी दोनों ही दिव्यांग हैं. दोनों के पास 40% से अधिक दिव्यांगता का सर्टिफिकेट भी है लेकिन अभी तक उन्हें किसी भी तरह की राशि नहीं दी गयी है. उनकी शादी को 4 साल हो चुके हैं. कृष्णा कुमार बताते हैं,

हम और हमारी पत्नी दोनों ही चल नहीं सकते हैं. सोचे थे कि जो सरकार के तरफ़ से राशि मिलेगी उससे एक दुकान खोलेंगे. आज अगर वो पैसा मिल जाता तो मेरे घर में भूखमरी नहीं होती. मेरे घर में छोटा बच्चा है उसको कहां से खाना खिलाएंगे? इलाज और दवाई के लिए भी पैसा नहीं है. प्रखंड कार्यालय में जब वेरिफिकेशन के लिए कागज़ मंत्रालय से आया तो प्रखंड वालों ने कहा कि आपका कागज़ ही खो गया है. प्रखंड के अधिकारियों के गलती की सज़ा हम और हमारा परिवार भुगत रहा है. ऐसे में हम क्या खायेंगे और क्या बच्चे को खिलाएंगे. हमारी सरकार से विनती है कि हमें हमारी राशि जल्द दे दें

दिव्यांगों को वैक्सीनेशन कार्यक्रम में प्राथमिकता देने के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक रिट पिटीशन लगाई गई है. इसमें कहा गया है कि संविधान के आर्टिकल 47, दिव्यांगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के आर्टिकल 11 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के सेक्शन 8 और 25 के अनुसार दिव्यांगों को वरीयता देकर वैक्सीन दिया जाना चाहिए. याचिका में मांग की गई कि जो दिव्यांग घरों से बाहर नहीं निकल सकते उन्हें उनके घर तक इलाज और वैक्सीन दी जाए. इसके साथ ही झारखंड हाईकोर्ट में भी 19 मई 2021 को याचिकाकर्ता अरुण कुमार सिंह की ओर से अधिवक्ता अनूप कुमार अग्रवाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका के माध्यम से उन्होंने अदालत को जानकारी दी है कि राज्य के दिव्यांगों, गरीबों और बेसहारा लोगों को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन दी जाएगी, ताकि वह इस संक्रमण से संरक्षित रहे. दायर याचिका में कहा गया है कि दिव्यांग व्यक्ति संक्रमण से जल्दी प्रभावित होते हैं. 5 मई 2021 को दिल्ली हाईकोर्ट में वैक्सीन में प्राथमिकता देने के लिए PIL दायर की गयी है. 2 अप्रैल को बॉम्बे हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की गयी और ये मांग की गयी कि सभी बुज़ुर्ग व्यक्ति और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए डोर-टू-डोर कैंपेन चलाया जाए. मद्रास हाईकोर्ट ने तमिल नाडू सरकार को 20 अप्रैल 2021 को ये आदेश दिया है कि सभी सरकारी वैक्सीन केन्द्रों पर दिव्यांग व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाए साथ ही उनके लिए एक स्पेशल काउंटर बनाया जाए. जस्टिस एस.बैनर्जी और जस्टिस एस. रामामूर्ती ने ये आदेश दिया है.

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