पेड़ों को ट्रांसप्लांट कर दूसरे जगह लगाना असफ़ल, अधिकांश पेड़ सूखे

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पल्लवी कुमारी
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पेड़ों को ट्रांसप्लांट कर दूसरे जगह लगाना असफ़ल, अधिकांश पेड़ सूखे

पेड़ पर्यावरण संरक्षण में कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. ये ज़्यादा ऑक्सीजन तो देते ही हैं साथ ही इनका जैव विविधता के संरक्षण में भी काफी अहम योगदान होता है.

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(बिहार में बराबर की गुफाओं के पास की हरियाली)

बिहार सरकार ने राजधानी में हरियाली को बनाये रखने के उद्देश्य से किसी भी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की ज़द में आने वाले पेड़ों को ट्रांसप्लांट किये जाने का आदेश दिया है. ट्रांसप्लांट या प्रत्यारोपण का अर्थ है कि किसी भी पेड़ को काटने के बजाय उसे जड़ समेत मशीनों द्वारा उखाड़ कर किसी दूसरी जगह लगाया जाए.

इसी के तहत पटना एयरपोर्ट के नये टर्मिनल भवन और पार्किंग के निर्माण में बाधा बने पेड़ों को वहां से हटाकर संजय गांधी जैविक उद्यान  में ट्रांसप्‍लांट किया गया था. साथ ही सड़क निर्माण या किसी अन्य प्रकार के निर्माण में बाधक बन रहे पेड़ों को भी ट्रांसप्लांट किया गया था. राजधानी में रेलवे पटरी उखाड़कर आर ब्लॉक-दीघा फोर लेन सड़क बनाया गया. सड़क के बीच में डिवाइडर पर पेड़ों को ट्रांसप्लांट कर लगाया गया है. संजय गांधी जैविक उद्यान में भी कई पेड़ों को ट्रांसप्लांट कर के लगाया जा चुका है.

भवन और सड़क निर्माण सहित अन्य विकास कार्य में बाधक बने लगभग 4000 पेड़ों को राजधानी के कई जगहों पर लगाया गया था. लेकिन आज आलम यह है कि इनमे से करीब 2500 पेड़ सूख चुके हैं. वहीं 1500 पेड़ ऐसे हैं जिनमे छोटी-छोटी टहनियां तो आयीं है, लेकिन अगर इनका ध्यान नहीं रखा गया तो ये भी सूख जाएंगी.

इतने पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने में 12 करोड़ खर्च हो चुके हैं. हर एक पेड़ को ट्रांसप्लांट करने में कम से कम 30 हज़ार रूपए खर्च किये गये थे. लेकिन इतनी राशि खर्च करने के बावजूद 30 साल से अधिक पुराने पेड़ को बचाया नहीं जा सका है.

राज्य में पेड़ को ट्रांसप्लांट करने कि योजना फेल होने के कगार पर है. गंगा किनारे एलसीटी घाट पर करीब 100 पेड़ों को लगाया गया था जिसमे से करीब 70 पेड़ सुख चुके हैं. वहीं जू में 100 पेड़ लगाये जाने के लिए जगह चिन्हित किया गया था, जिसमे से 60 पेड़ लगाये गये थे. उसमे से भी करीब 40 पेड़ सुख चुके हैं. पेड़ लगाये जाने के समय उद्यान के अधिकारियों ने हर्ष के साथ कहा था कि

एयरपोर्ट परिसर से बड़े पेड़ मिल रहे हैं. ऐसे पेड़ तैयार होने में कई वर्ष लग जाते हैं. वन्य प्राणियों के केज में अगर छोटे पौधे लगाए जाएं तो इनका पेड़ के रूप में बढ़ना मुश्किल होता है. ऐसे में जो बड़े पेड़ मिल रहे हैं, उन्हें ट्रांसप्लांट कर लगाया जा रहा है. बरगद व पीपल प्रजाति के पेड़ शत-प्रतिशत लग जाते हैं. बड़े पेड़ों को गैंडा प्रजनन केंद्र वाले क्षेत्र में भी लगाया जाएगा.

लेकिन अधिकारी इन पेड़ों उचित देखभाल करने में सफ़ल नहीं रहे.

वहीं बिहटा-सरमेरा रोड के दोनों तरफ प्रत्यारोपित किये गये 200 में से करीब 150 से ज्यादा पेड़ मर चुके है और जो बचे भी है वो सूखने के कगार पर हैं. आर ब्लाक दीघा फॉर लेन बनाने के लिए पेड़ों को उखारकर डिवाइडर के बीचो बीच और सड़क के दोनों किनारे लगाया गया था. सबसे पहले पेड़ों को यहीं ट्रांसप्लांट किया गया था. लेकिन आर ब्लॉक से बेली रोड तक लगाये गये 20 पेड़ में से 15 सूख चुके हैं.

लेकिन दो साल पहले जिस उम्मीद के साथ इन पेड़ों को उनके वास्तविक स्थान से उखाड़ कर दूसरे जगह पर लगाया था, आज उसके ठीक विपरीत इतनी संख्या में स्वस्थ और व्यस्क पेड़ों को विकास के नाम पर शहर से उजाड़ दिया गया.

वहीं पर्यावरणविदों का कहना है कि

पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने का विचार ही बताता है कि नीति निर्धारकों को पर्यावरण की सही समझ नहीं है. ट्रांसप्लांट जैसी तकनीक 10 या 15 साल पुराने पेड़ों पर तो कारगर हो सकती है लेकिन बहुत पुराने पेड़ों पर इसे नहीं आजमाना चाहिए क्योंकि वैसे पेड़ नई जगह पर जिन्दा नहीं रह पाएंगे. ऐसे पेड़ जो 30 या 40 साल पुराने हैं उनकी जड़ें काफी फैली होती है. ऐसे पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने के लिए आप उन्हें कैसे निकालेंगे जिनकी जड़ें काफी फैली हों? फिर उनकी विशाल शाखाओं को काटना होगा. उसके बाद इन पेड़ों को ले जाकर कहीं लगाया जायेगा तो क्या वह बचेंगे?

वहीं इतनी संख्या में पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने के बाद उनमे से अधिकांश पेड़ जब सूख गये तो विभाग इसका ठीकरा दुसरे विभाग पर  मढ़ने में लगे हैं. वन पर्यावरण विभाग और जलवायु परिवर्तन विभाग के अनुसार पेड़ों कि प्रत्यारोपण और देखभाल करने कि जिम्मेवारी उस विभाग कि होती है जिसके द्वारा कंस्ट्रक्शन या डेवलपमेंट का काम कराया जा रहा है.

लेकिन सम्बंधित विभाग द्वारा प्रत्यारोपण तो कर दिया गया लेकिन उसके बाद उन पेड़ों के नियमित देखभाल के लिए किसी एजेंसी को काम नही दिया गया. और दूसरा कारण वन विभाग कि टीम कि गैर मौजुदगी में पेड़ों को मशीन के द्वारा निकाला जाता है. जिसके कारण पेड़ की जड़ें टूट जातीं है.     

वहीं मुख्य वन संरक्षक गोपाल सिंह का कहना है कि

वर्तमान में जो पेड़ लगाये गये हैं उनका सर्वाइवल रेट अच्छा नहीं है. सर्वाइवल रेट पेड़ कि प्रजाति, उम्र, ट्रांस्प्लांट तकनीक और उसके रख-रखाव पर निर्भर करता है. ट्रांसप्लांट तकनीक को और बेहतर करने की आवश्यकता है.

इससे पहले मुंबई में मेट्रो रेल लाइन बिछाने के लिए जिन पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया गया उनमें से ज्यादातर पेड़ नहीं बचे. खुद मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने अदालत में माना था कि साल 2019 में प्रत्यारोपित किए गए 1,500 पेड़ों में से करीब 64% नहीं बच पाए थे. भारत में कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान भी यह प्रयोग किया गया लेकिन पूरी तरह असफल रहा था.