यूक्रेन में फंसे बिहारी छात्रों को वापस लाने के लिए क्या है सरकार की तैयारी?

रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आशंका जताई है कि रूस कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकता है। उनका कहना था कि अमेरिका के पास इस बात का कारण है कि यूक्रेन पर रूस हमला करेगा। हालांकि इन सारे उथल-पुथल के बीच जो बाइडेन ने यह भी कहा है कि अगर रूस शांति की पहल करता है तो अमेरिका रूसी राष्ट्रपति से बात करने को तैयार हैं। यूक्रेन की सीमाओं पर 1,25,000 रूसी सेना के जवान खड़े हैं।


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स्थिति इस कदर गंभीर बन गई है कि नाटो (NATO) देशों और रूसी सेना के बीच कभी भी युद्ध शुरू हो सकता है। दरअसल विवाद का कारण यह है कि यूक्रेन उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो का सदस्य देश बनना चाहता है और रूस इसका विरोध कर रहा है। नाटो अमेरिका और पश्चिमी देशों के बीच एक सैन्य गठबंधन है, इसलिए रूस नहीं चाहता कि उसका पड़ोसी देश नाटो का मित्र बने। इन सारे विवाद और तनाव से भारत भी अछूता नहीं है और सबसे अहम यह कि बिहार के कई परिवारों के लोग इन देशों में फंसे हुए हैं जिस वजह से टेंशन का माहौल बना हुआ है।

(रूस और यूक्रेन में बढ़ता तनाव, तस्वीर-गेटी इमेज)

दरअसल अपने देश के कई राज्यों समेत बिहार के कई ऐसे युवा हैं जो यूक्रेन में मेडिकल के साथ कई दूसरे विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं। एक आंकलन के अनुसार यूक्रेन में केवल बिहार से ही एक हजार से ज्यादा स्टूडेंट पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें करीब 600 मेडिकल व 350 के करीब इंजीनियरिंग के स्टूडेंट हैं। युद्ध के लगातार मंडरा रहे बादल के कारण यह सभी सहमें हुए हैं और भारत लौटना चाह रहे हैं। स्टूडेंट्स अपनी पीड़ा को सोशल मीडिया के द्वारा भी जाहिर कर रहे हैं। यूक्रेन के इवानोफ्रीस्क्यू नेशनल मेडिकल कॉलेज, विनिस्तिया नेशनल मेडिकल कॉलेज के अलावा कई अन्य कॉलेज में बिहार के छात्र स्टडी कर रहे हैं।

(यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई करने गए कुंदन)

यूक्रेन के एक मेडिकल कॉलेज में स्टडी कर रहे कुंदन कुमार अपने वतन लौट आना चाह रहे हैं। मेडिकल के फोर्थ ईयर के स्टूडेंट कुंदन बताते हैं,

अभी दिल्ली के लिए टिकट लेने का प्रयास कर रहा हूं लेकिन बहुत अधिक भीड़ है अभी तक मेरा टिकट कंफर्म नहीं हो पाया है। वह यह भी बताते हैं, यहां के हालात को देखते हुए ज्यादातर स्टूडेंट्स अपने वतन लौटना चाह रहे हैं। मेरा भी यह प्रयास है।

बिहार के सीवान जिले के मैरवा की निवासी स्वाति प्रियदर्शनी भी उन स्टूडेंट्स में शामिल हैं जो यूक्रेन से मेडिकल की स्टडी कर रहे हैं। युद्ध के हालात को देखते हुए स्वाति भी अपने देश वापस आना चाहती हैं।

(सीवान की स्वाति भी यूक्रेन में फंसी हुई हैं)

प्रसिद्ध शिक्षाविद् और कैरियर काउंसेलर आशीष आदर्श कहते हैं,

अपने देश में स्टूडेंट्स के एक वर्ग का रूझान मेडिकल में कैरियर को लेकर शुरू से ही आकर्षित करता रहा है। किसी भी हालत में यह छात्र एक डॉक्टर के रूप में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। उनके सपनों को पूरा नहीं हो पाने का एक बड़ा कारण भारत के निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा लिया जाने वाला अप्रत्याशित शुल्क है।

वह कहते हैं, वैसे स्टूडेंट्स जो नीट का क्लियर करते हैं, उनको तो सरकार संपोषित मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन मिल जाता है। यह उनके लिए तो आसान है परंतु अन्य स्टूडेंट्स के पास ज्यादा शुल्क होने से विकल्प कम बच पाता है लिहाजा वह मेडिकल की स्टडी करने के लिए विदेश की तरफ रूख करते हैं। इनमें चीन, रूस, यूक्रेन के अलावा कई अन्य देश भी शामिल हैं, जहां पर मेडिकल की स्टडी अपने देश के निजी कॉलेजों की तुलना में एक चौथाई है। वह कहते हैं,

अपने देश के विभिन्न निजी कॉलेजों में जहां मेडिकल की पढ़ाई के लिए 80 लाख से एक करोड़ रूपये तक की फीस लगती है वहीं यूक्रेन जैसे देश में यह स्टडी 20 से 25 लाख में पूरी हो जाती है। यदि इसमें रहना व खाना पीना जोड़ लिया जाए तो 30 से 35 लाख रूपये में सबकुछ पूरा हो जाता है।

हालांकि वह यह भी बताते हैं, इन देशों में स्टडी करने वाले स्टूडेंट्स को अपने देश में वापस आने के बाद एक डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करने के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित स्क्रीनिंग टेस्ट को क्लीयर करना होता है, जिसके बाद ही इनका रजिस्ट्रेशन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा प्रैक्टिस करने के लिए एक डॉक्टर के रूप में हो पाता है। वह कहते हैं, इन देशों में एक तो फीस कम रहती है दूसरी वहां स्टडी के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर व अन्य सुविधा भी बेहतर होती है।

(यूक्रेन में फंसे बिहारी छात्रों ने सरकार से गुहार लगाई, तस्वीर- ट्विटर)

इंटरनेशनल मामलों पर गहरी पकड़ रखने वाले महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी मोतिहारी के प्रोफेसर सह डीन सोशल साइंस प्रोफेसर राजीव कुमार कहते हैं,

दरअसल इस क्षेत्र में तनाव का मुख्य कारण नाटो का यूक्रेन तक हो रहा विस्तार है। वह कहते हैं, 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद कई देश बने थे, जिनमें एक यूक्रेन भी था। यूक्रेन का बडा हिस्सा सुदूर पूर्व में रूस के साथ लगता है। इसी बीच अमेरिका ने नाटो के विस्तार को लेकर पहल किया और पोलैंड तक अपनी पहुंच बनायी जिसकी सीमा रूस से लगती है। अमेरिका बेलारूस, यूक्रेन को नाटो का मेंबर बनाना चाह रहा है जबकि रूस को इसपर आपत्ति है। वह नाटो का विस्तार अपनी देश की सीमा तक नहीं चाहता है। देखा जाए तो कुल मिलाकर रूस के पक्ष में पूरा मामला है। रूस की आपत्ति एक हद तक सही भी है। हालात को भांप कर यूक्रेन नाटो का मेंबर नहीं बनेगा। यूक्रेन की करीब 40 प्रतिशत आबादी रूसी भाषा को बोलती है। प्रोफेसर कुमार बताते हैं, इन दोनों ही देशों से भारत के अच्छे संबंध हैं। भविष्य को देखते हुए हमारी सरकार ने शांति की अपील भी की है। अभी हमारी फ्लाइट चालू है। सरकार भी किसी अप्रिय हालात से बचने के लिए अपने नागरिकों को वहां से लाने की पहल कर रही है।

(प्रोफ़ेसर राजीव कुमार)

यूक्रेन में फंसे बिहारियों को वापस लाना सरकार की ज़िम्मेदारी है। हालांकि राज्य सरकार की ओर से इस मामले पर किसी भी तरह का बयान या कोई अपडेट नहीं आया है।

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