आखिर क्यों हमारे मज़दूर वापस दूसरे राज्य जा रहे हैं? क्या नीतीश सरकार को फ़ेल माना जाए?

भारत में लॉकडाउन शुरू होने के हफ़्तों बाद प्रवासी मज़दूर घर वापस लौटे थे. कोरोना महामारी के फैलाव और लॉकडाउन के बीच जब लाखों की संख्या में मजदूर बिहार के अपने गांवों की तरफ लौट रहे थे, तब राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि अब यहां लाचारी में किसी को जाने की ज़रुरत नहीं है. उन्होंने मनरेगा के ज़रिये 24 करोड़ श्रम रोजगार का दावा किया था और क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे मजदूरों की स्किल मैपिंग करवायी थी, ताकि जो मज़दूर जिस रूप में सक्षम हो उसे उसी रूप में बिहार में ही रोज़गार उपलब्ध कराया जाये.

मज़दूरों ने भी वीडियो कांफ्रेंसिंग में बात करते हुए इस बात पर सहमति जताई थी कि नून (नमक) रोटी खायेंगे, बिहार छोड़ कर नहीं जायेंगे. मगर अनलॉक-1 के दौरान पलायन को रोकने का सरकार का दावा फेल होता जा रहा है. इस दौरान बिहार के तकरीबन हर जिले से बड़ी संख्या में मजदूर वापस अपने काम के इलाके में लौट रहे हैं.

कोरोनावायरस लॉकडाउन लागू होने के करीब डेढ़ महीने बाद केंद्र सरकार ने श्रमिकों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलवाईं. लाखों लोगों को उनके घर और राज्य पहुंचाया गया. अभी भी श्रमिकों को उनके घर ले जाने के लिए स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं, लेकिन इस बीच यह खबर भी हमें मिली है कि बिहार लौटे मजदूर एक बार फिर रोजी-रोटी कमाने के लिए पलायन कर रहे है.

बिहार में मजदूरों का पलायन एक बार फिर शुरू हो गया. बिहार के समस्तीपुर में मजदूरों के पलायन का एक वीडियो सामने आया है. पलायन को लेकर मज़दूरों का कहना है कि अगर वो कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दावा कर रहे हैं कि राज्य लौटे मजदूरों को काम दिया जाएगा लेकिन पलायन रुक नहीं रहा है. आखिर कब काम उपलब्ध कराया जाएगा मज़दूरों को? क्या सरकार भूल गयी है कि उन्होंने मज़दूरों को वादा किया था कि उन्हें काम ढूंढने के लिए राज्य से बाहर जाने की ज़रूरत नही है?

लॉकडाउन ख़त्म हो गया है, और अब लोग अपनी कमाई को लेकर परेशान है. अब मज़दूर यह सोच रहे कि वह कमाएंगे नही तो खाएंगे कैसे! सरकार ने तो भरोसा दिलाया था कि सबको काम दिया जाएगा लेकिन अब तक उनके तरफ से कोई ख़बर नहीं आई कि कब दिया जाएगा. ऐसे में बाहर राज्यों से लौटे मज़दूरों के पास अब एक ही रास्ता बाच जाता है वह यह है कि वे वापस से दूसरे राज्यों में अपनी रोइ रोटी कमाने को चले जाए.

कोरोना महामारी के इस संकट के दौर में यह भी एक सबक है कि असंगठित क्षेत्र के इस स्वरूप को बदलने के नीतिगत फ़ैसले होने चाहिए. उसपर असुरक्षित, अस्थायी, गारंटीविहीन या सामाजिक सुरक्षा विहीन होने का जो ठप्पा लगा है, उसे मिटाना होगा. कुशल या अकुशल मजदूरों के पलायन को रोकने और आर्थिक विकास का मज़बूत आधार बनाने के लिए हर राज्य में वहां की परिस्थितियों के अनुरूप प्रयास बहुत ज़रूरी है. नौकरी की तलाश में वही लोग निकलते हैं जिन्हें अपने यहां कोई संभावना नहीं दिखती. आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण में राज्यों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी होनी चाहिए. अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए, केंद्र सरकार खुद को राज्यों के साथ सहयोग वाले मॉडल का पक्षधर बताती है लेकिन अब कोरोना पश्चात के समय में ये दिखना भी चाहिए.

– अनुकृति प्रिया

निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता ज़रूरी है

आपके लिए डेमोक्रेटिक चरखा आपके लिए ऐसी ग्राउंड रिपोर्ट्स पब्लिश करता है जिससे आपको फ़र्क पड़ता है
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *