Weather News: जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य ने झेला कड़ाके की ठंड और भीषण गर्मी

आंकड़े बताते हैं कि राज्य में क्लाइमेट चेंज की परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में यह स्वास्थ्य और रोजगार को प्रभावित करेगा.

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पल्लवी कुमारी
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क्लाइमेट चेंज

जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य ने झेला कड़ाके की ठंड

पिछले 20 सालों में बीता वर्ष अप्रैल-मई से साल 2024 के जनवरी तक बिहार में मौसमी बदलाव सबसे ज्यादा खतरनाक रहा है. दो दशकों में पहली बार राज्य के लोगों ने हिट वेव और कोल्ड वेव को लंबे समय तक झेला है. पिछले एक साल में राज्य में ठंड में कड़ाके की शीतलहर और गर्मी में भयानक लू लोगों ने झेला है. आइएमडी ने इन सभी घटनाक्रमों को जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव माना है.

आंकड़े बताते हैं कि राज्य में क्लाइमेट चेंज की परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में यह स्वास्थ्य और रोजगार को प्रभावित करेगा. आइएमडी राज्य में बीते एक साल में हुए मौसमी बदलाव का कारण अलनीनों और जेट स्ट्रीम की घटनाओं को मानते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि कोल्ड डे या सीवियर कोल्ड डे लम्बे समय तक बने रहने का कारण जेट स्ट्रीम है.

दरअसल, दशकों बाद जेट स्ट्रीम बिहार के ऊपर ठहरा रहा था जिसके कारण धुंध या फॉग छंट नहीं पाया. यही कारण रहा कि जनवरी महीने में लंबे समय तक कोल्ड डे या सीवियर कोल्ड की स्थिति बनी रही. सामान्य तौर पर जेट स्ट्रीम ऊपर नीचे होते रहता हैं जिसके कारण ठंड लंबे समय तक लगातार नहीं पड़ता है.

आइएमडी के आंकड़ो के अनुसार जनवरी 2024 में 18 दिन कोल्ड डे (शीत दिवस) और 15 दिन सीवियर कोल्ड (severe cold) डे (भीषण शीत दिवस) की स्थिति रही थी. वहीं अल नीनो की सक्रियता की वजह से इस बार राज्य में शीतकालीन बारिश भी मात्र एक मिलीमीटर दर्ज की गई है. जनवरी में सामान्य से 90 फीसदी कम बारिश होने के कारण सूखी पछुआ हवा ने ठंड को और बढ़ा दिया था.

हीट वेव भी रही थी खतरनाक

ठंड के साथ-साथ राज्य ने बीते साल भयानक गर्मी का भी सामना किया था. अप्रैल से लेकर जून तक देश के विभिन्न हिस्सों में खतरनाक हीट वेव चली. इसमें 30 अप्रैल से 18 मई तक लगातार 19 दिन चला हीट वेव बीते दो दशकों में सबसे अधिक रहा था. बीते वर्ष विश्व के लगभग सभी हिस्सों में गर्मी के रिकॉर्ड टूट गए. सेंटर फॉर साइंस के रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2023 के शुरूआती नौ महीनों के 235 से 273 दिन तक अतिविषम मौसम रहा था. अतिविषम मौसम से तात्त्पर्य मौसम में अप्रत्याशित बदलाव से हैं. लंबे समय तक अधिक गर्मी, ठंड और बारिश से है. वैज्ञानिकों ने साल 2023 को पिछले एक लाख साल की अपेक्षा सबसे गर्म साल बताया है.

हीट वेव

इंडियास्पेंड में छपी रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण आए बाढ़ और भूकंप के कारण 2,923 लोग और 92,000 से अधिक जानवर मारे गए. वहीं 1.84 मिलियन हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गए साथ ही 80,000 घर नष्ट हो गए.

तेजी से होते जलवायु परिवर्तन के कारण मौसमी घटनाओं जैसे- लू, अधिक वर्षा, बाढ़, सूखा, भूकंप, चक्रवात जैसी घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति हर साल बदल रही है.

खाद्य सुरक्षा और कृषि आय पर पड़ेगा प्रभाव

मई 2019 में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेस ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका जर्नल द्वारा प्रकाशित लेख के अनुसार, 2040 तक चार प्रमुख फसलों- गेहूं, सोयाबीन, चावल और मक्का पर क्षेत्रीय वर्षा पैटर्न का प्रभाव दिखेगा. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन फसलों को प्रमुखता से उगाने वाले भारत सहित अन्य देश स्थायी सूखे का सामना करेंगे. वहीं अन्य देश जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से आद्र जैसी परिस्थितियों का सामना करेंगे. वर्तमान में भारत में गेहूं की खेती के लिए जो समर्पित भूमि है, वहां ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन के

वर्तमान रुझानों के तहत 2020 और 2060 के बीच सामान्य से अधिक वर्षा होगी. वहीं चावल की खेती वाली 100 फीसदी भूमि, मक्का की 91% भूमि और सोयाबीन की 80% भूमि अगले 40 वर्षों के भीतर आर्द्र परिस्थितियों से गुजरेगी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 50 से 100 वर्षों के दौरान तापमान और वर्षा की प्रवृत्ति में बदलाव के चलते ना सिर्फ कृषि प्रभावित होगी बल्कि इसका खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा. इस रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के कृषि क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने की गुंजाइश कम है. ये क्षेत्र जलवायु परिवर्तन प्रति बहुत संवेदनशील हैं.

किसान

अमेरिकी जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र का कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बहुत संवेदनशील हैं. जिसके कारण इन क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाए जाने की संभावना कम है.

हालांकि, जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (GCCPI)-2023, की वैश्विक रिपोर्ट में भारत को सातवां स्थान मिला है. वैश्विक संस्था ‘जर्मनवाच’ द्वारा जारी इस रिपोर्ट में 63 देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं. ये सारे राष्ट्र सामूहिक रूप से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन का 90% से अधिक उत्सर्जित करते हैं.

जलवायु परिवर्तन का आय पर प्रभाव उन क्षेत्रों पर अधिक होगा जहां खेती वर्षा पर आश्रित है. इन क्षेत्रों में 60% कृषि भूमि क्षेत्र है और देश के 60% किसान भी यहीं रहते हैं. सर्वेक्षण के अनुसार, ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि कृषि से प्राप्त होने वाली आय किस दिशा में जाएगी क्योंकि एक तरफ मौसम के मार से उत्पादन कम होगा और दूसरी तरफ आपूर्ति में कमी से स्थानीय स्तर पर कीमतें बढ़ेंगी.

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में तापमान वृद्धि और वर्षा की असामनता का फसलों और किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, जिस साल तापमान 1 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा, खरीफ सीजन के दौरान किसान की आय में 6.2% की गिरावट होगी. वहीं वर्षा वाले जिलों में रबी के दौरान आय में 6% की गिरावट होगी. इसी तरह, जिस साल बारिश औसत से 100 मिलीमीटर कम होगी, तब खरीफ के दौरान किसान की आय में 15 फीसदी और रबी सीजन के दौरान 7 फीसदी की गिरावट आएगी.

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि जलवायु परिवर्तन से किसानों की आय औसतन 15 से 18% कम होगी. बारिश वाले क्षेत्रों में यह नुकसान 20 से 25% के बीच रहेगा. ऐसे में किसानों की आय दोगुना करने का सरकार का इरादा शायद ही कभी पूरा हो पाए.

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