बिहार 112 सेवा: ‘देशभक्त’ सरकार के ख़िलाफ़ क्यों हुए पूर्व सैनिक?

बिहार में 112 की आपात सेवा ने नागरिकों को तात्कालिक मदद पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है. लेकिन जिसे जनता ‘सेवा’ समझती है, वही आज अपने हक के लिए सड़क पर खड़ा है.

पिछले कुछ दिनों से पटना में पूर्व सैनिकों की एक बड़ी संख्या जो 112 सेवा में चालक के रूप में तैनात हैं  धरने और मार्च कर रही है. उनकी मांगें साफ़-साफ़ हैं: नियमितीकरण, वेतन-सुधार, बीमा व मुआवजा और काम के दौरान होने वाले जोखिमों के लिये सुरक्षा.

सेना से सिटी-ड्यूटी तक 

बिहार में अपने हक और मांगो को लेकर पूर्व सैनिक चालक संग ने धरना दिया. चंदन कुमार जो इस संघ के अध्यक्ष है उन्होंने हमें बातचीत में विस्तार से बताया कि बिहार में 112 सेवा में नियुक्ति का अधिकांश काम DGR/ AWPO (Army Welfare Placement Organisation) के माध्यम से हुआ. भर्ती अभियान की शुरुआत अप्रैल 2022 से हुई और तीन साढ़े तीन साल के भीतर हजारों पूर्व सैनिकों को चालक के रूप में लगाया गया.

चंदन के अनुसार “हम सब पूर्व सैनिक हैं किसी का 17 साल का अनुभव, किसी का 24 साल ड्राइविंग लाइन के एक्सपर्ट. भर्ती में ड्राइविंग टेस्ट, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन जैसी प्रक्रियाएं पूरी की गयीं और फिर नियुक्ति हुई.”

यह व्यवस्था कई राज्यों में प्रयोग की जाने वाली रिटायर्ड सैनिकों की प्लेसमेंट प्रक्रिया से मिलती-जुलती है सेना में अनुशासन और अनुभव लेकर आए इन व्यक्तियों को नागरिक सुरक्षा और आपात सेवाओं में लगाया जाता है.

वादे और हकीकत 

भर्ती के समय कई वादे भी किए गए थे: मासिक वेतन ₹25,000, सालाना 10% इन्क्रीमेंट, साप्ताहिक अवकाश और सालाना 20 दिन की छुट्टी. लेकिन पूर्व सैनिकों का  कहना है कि ज्यादातर वादे पूरे नहीं हुए. चंदन कहते हैं, “3.5 साल हो गए, सिर्फ़ ₹750 वृद्धि मिली; न तो साप्ताहिक छुट्टी मिलती है, न ही नियमित कानूनी दर्जा.”

112 के एक चालक सुनील ने हमें यह बाते की नियम के अनुसार एक गाड़ी पर 3 चालाक होने चाहिए ताकि सभी लोग 8 घंटे से ज्यादा काम न करें लेकिन ऐसा है नहीं  कई जिलों में एक वाहन पर मात्र 2 चालकों की ड्यूटी होने के कारण उन्हें 12–12 घंटे या उससे अधिक लगातार काम करना पड़ता है — परिणामस्वरूप थकान,स्वास्थ्य संबंधी समस्या और पारिवारिक परेशानियां बढ़ रही हैं. और ऐसे में छुट्टी लेने पर बाकी चालकों के ऊपर भी काफी दबाव आता है.

जोखिम की नहीं है कोई कीमत 

संघ द्वारा उठाया गया सबसे संवेदनशील मुद्दा यह है कि ड्यूटी के दौरान कम से कम 15 पूर्व सैनिकों की मौतें हुई हैं और कई कर्मियों के साथ काफी गंभीर दुर्घटना भी हुई है परन्तु उनकी पारिवारिक सहायता या मुआवजा का कोई सरकार की तरफ से औपचारिक प्रावधान नहीं.

जो 15 लोग पिछले कुछ सालो में शहीद हुए है उनके घर वालों के लिये सरकार ने कुछ नहीं किया था  चंदन ने बात करते हुए हमें बताया की कहा कि “शहीदों के  परिवार की आर्थिक हालत में सहयोग करने के लिये  संगठन के लोगो ने खुद आपस में चंदा करके परिवारों के लिये फंड इकट्ठा किए गए और इसे फंड से मदद पहुंचाई, क्योंकि सरकार कुछ नहीं कर रही”.

उन्होंने सवाल उठाया: “अन्य सरकारी कर्मियों को इंश्योरेंस और मुआवजा मिलता है; हमारे साथ ऐसा क्यों नहीं?” यह क्षति केवल परिवारों का निजी दुःख नहीं रह जाती; यह उन लोगों की हिम्मत और भरोसे की परीक्षा है जो युद्ध भूमि से लौटकर फिर देश की नागरिक सेवा में जूझ रहे हैं.

डाकबंगला चौराहे पर बैठे कुछ चालकों ने हमें बताया की  कई बार प्रशासन को आवेदन और प्रतिनिधित्व दिया गया, पर संतावना के अलावा कुछ हासिल नहीं है यदि संघ की मांग पर कोई ठोस कार्रवाई शुक्रवार तक नहीं हुई तो शनिवार से 112 सेवाओं का व्यापक बहिष्कार और चक्का जाम जैसा कदम उठाया जा सकता है जो इमरजेंसी प्रतिक्रिया में बड़े व्यवधान का कारण बनेगा. वह कहते हैं, “हम प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं; हम शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे हैं, पर अब समय सीमित है.”

क्या है पूर्व सैनिकों की मांग?

इस धरने में पूर्व सैनिक चालक संघ की मांगो में प्रमुख हैं:

  • अनुबंध से नियमितीकरण — राज्य कर्मी का दर्जा और उससे जुड़ी सुविधाएं
  • वेतनमान में सुधार और वादे के अनुरूप बढ़ोतरी 
  • साप्ताहिक अवकाश और सालाना छुट्टियों का पालन.
  • ड्यूटी के दौरान मृत्यु या गंभीर चोट पर माननीय मुआवजा और बीमा कवरेज.
  • नियुक्ति पत्र, पहचान पत्र व स्थानांतरण नीति में पारदर्शिता.

पूर्व सैनिक, जिन्होंने देश की रक्षा में सेवा दी, अब नागरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मदद कर रहे हैं पर उनकी सेवा की कीमत पर समाज और प्रशासन का कर्ज़ चुकता होना चाहिए. ये लोग सिर्फ़ ड्राइवर नहीं; वे आपात स्थिति में पहली कड़ी हैं जो मानव जीवन बचाने में निर्णायक होते हैं.

इसलिए सरकार के पास अब दो रास्ते हैं: या तो त्वरित, पारदर्शी और संवेदनशील नीतिगत कदम उठाए जाए नियमन, बीमा, मुआवजा और वेतन संरचना के रूप में या फिर आगे की नौबत ऐसे आंदोलन और व्यापक कार्य बहिष्कार तक पहुँच सकती है, जिसका खामियाजा आम जनता भुगतेगी.