बिहार में शिक्षक क्यों कर रहे हैं जनगणना कार्य का विरोध?

बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षक पहले से ही बच्चों की पढ़ाई, परीक्षा, मिड-डे मील, उपस्थिति, पोर्टल अपडेट और विभागीय कागजी कामों के बीच उलझे रहते हैं. अब इसी बीच शिक्षकों को जनगणना से जुड़े अतिरिक्त कार्यों की जिम्मेदारी दी जा रही है. सरकार और प्रशासन की नजर में यह एक अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन शिक्षकों के लिए यह सवाल अब उनके पेशे, समय, मानसिक थकान और बच्चों की पढ़ाई से जुड़ गया है.

शिक्षकों का कहना है कि वे सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए सरकारी कार्य से उन्हें आपत्ति नहीं है. आपत्ति इस बात से है कि स्कूल की पूरी जिम्मेदारी निभाने के बाद उनसे एक और बड़ा काम करने की उम्मीद की जा रही है, वह भी सीमित मानदेय और भारी दबाव के साथ.

6 घंटे स्कूल में ऊर्जा लगाने के बाद गणना कैसे करें?

बेगूसराय के एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर डेमोक्रेटिक चरखा से बातचीत में बताया कि आदेश के अनुसार शिक्षकों को दोपहर 12:30 बजे तक विद्यालय में रहकर बच्चों को पढ़ाना है और उसके बाद गणना से जुड़े कार्य देखने हैं.

वे कहते हैं,
“एक शिक्षक सुबह से स्कूल में बच्चों को पढ़ाता है, कॉपी देखता है, क्लास संभालता है, मिड-डे मील और बाकी काम भी देखता है. 6 घंटे से ज्यादा स्कूल में पूरी ऊर्जा लगाने के बाद फिर घर-घर जाकर गणना का काम करना कितना व्यावहारिक है? सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि शिक्षक भी इंसान हैं.”

उनके मुताबिक, यह सिर्फ समय का सवाल नहीं है, बल्कि काम की गुणवत्ता का भी सवाल है. अगर शिक्षक स्कूल में थका हुआ पहुंचेगा या गणना के दबाव में रहेगा, तो उसका असर सीधे बच्चों की पढ़ाई पर पड़ेगा.

पढ़ाई प्रभावित होने का डर

बिहार के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके पास निजी स्कूल या ट्यूशन का विकल्प नहीं होता. ऐसे बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का मुख्य सहारा है. अगर शिक्षक पढ़ाने के बजाय लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाएंगे, तो सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं बच्चों का होगा.

शिक्षकों का कहना है कि पहले से ही कई बार उन्हें चुनाव, सर्वे, पोर्टल अपडेट, प्रशिक्षण और अन्य प्रशासनिक कामों में लगाया जाता है. ऐसे में जनगणना जैसे बड़े काम को स्कूल के बाद करवाना शिक्षक और छात्र दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

एक शिक्षक बताते हैं, “सरकारी स्कूलों के बच्चों को सबसे ज्यादा शिक्षक की जरूरत होती है. लेकिन अगर शिक्षक का ध्यान पढ़ाई से हटाकर हर बार किसी न किसी सरकारी काम में लगा दिया जाएगा, तो फिर स्कूलों की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?”

₹9000 मानदेय पर भी सवाल

गणना कार्य के बदले शिक्षकों को लगभग ₹9000 अतिरिक्त दिए जाने की बात कही जा रही है. लेकिन कई शिक्षकों का कहना है कि यह राशि काम के बोझ के हिसाब से बहुत कम है.

शिक्षकों के अनुसार, गणना का काम सिर्फ एक फॉर्म भरने जैसा नहीं होता. इसमें घर-घर जाना, परिवार से जानकारी लेना, बार-बार सत्यापन करना, गलती होने पर सुधार करना और कई बार लोगों के सवालों या नाराजगी का सामना भी करना पड़ता है.

एक शिक्षक ने कहा, “अगर काम इतना ही हल्का है तो फिर इसे स्कूल के बाद क्यों कराया जा रहा है? और अगर काम गंभीर है तो फिर उसका मानदेय, सुरक्षा और समय भी उसी हिसाब से होना चाहिए.”

शिक्षकों का तर्क है कि यह काम कई दिनों तक चल सकता है. इसमें आने-जाने का खर्च, समय, मोबाइल-इंटरनेट, दस्तावेज़ और मानसिक दबाव सब शामिल है. ऐसे में ₹9000 की राशि उन्हें पर्याप्त नहीं लगती.

सुरक्षा और जवाबदेही का सवाल

गणना या सर्वे जैसे कार्यों में शिक्षकों को घर-घर जाना पड़ता है. कई बार वे ऐसे इलाकों में भी जाते हैं जहां लोगों को सरकारी प्रक्रिया को लेकर संदेह या नाराजगी रहती है. देश के दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की ड्यूटी को लेकर शिक्षकों और BLO कर्मियों ने ड्यूटी आवर, सुरक्षा और स्पष्ट आदेश को लेकर सवाल उठाए हैं.

बिहार के शिक्षकों का भी कहना है कि अगर उन्हें स्कूल के बाद क्षेत्र में भेजा जा रहा है, तो उनकी सुरक्षा, यात्रा और जवाबदेही को लेकर स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए. कई शिक्षक ग्रामीण इलाकों में काम करते हैं, जहां शाम के बाद घर-घर जाना आसान नहीं होता.

महिला शिक्षकों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है. उन्हें स्कूल के बाद दूर के क्षेत्रों में जाकर गणना कार्य करना पड़े, तो सुरक्षा और परिवार दोनों स्तर पर दबाव बढ़ेगा.

शिक्षक या बहुउद्देशीय सरकारी कर्मचारी?

शिक्षकों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार उन्हें शिक्षक मानती है या हर सरकारी काम के लिए उपलब्ध कर्मचारी?

बिहार में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की बात लगातार होती है. स्कूलों में उपस्थिति, पढ़ाई की गुणवत्ता, परीक्षा परिणाम और निरीक्षण पर जोर दिया जा रहा है. लेकिन उसी समय शिक्षकों को अलग-अलग गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाना एक विरोधाभास पैदा करता है.

एक तरफ सरकार कहती है कि शिक्षक स्कूल में रहें और बच्चों को पढ़ाएं. दूसरी तरफ वही शिक्षक स्कूल के बाद गणना, सर्वे और अन्य कार्यों में लगाए जाते हैं. ऐसे में शिक्षक दो मोर्चों पर दबाव झेलता है स्कूल में पढ़ाई की जिम्मेदारी और स्कूल के बाहर प्रशासनिक काम की जवाबदेही.

बच्चों का नुकसान कौन देखेगा?

बिहार के सरकारी स्कूलों में पहले से ही सीखने की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में अगर शिक्षक मानसिक रूप से थके हुए या समय के दबाव में रहेंगे, तो इसका असर कक्षा में दिखेगा.

बच्चों के लिए शिक्षक सिर्फ पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता. वह अनुशासन, प्रेरणा और सीखने का माहौल बनाता है. लेकिन जब शिक्षक खुद तनाव में होगा, तो वह बच्चों को कितना समय और ऊर्जा दे पाएगा.?

यही वजह है कि कई शिक्षक संगठन इस काम के विरोध में हैं. उनका कहना है कि जनगणना जैसा काम जरूरी है, लेकिन इसके लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए. शिक्षक को लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाना शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करता है.

सरकार की मजबूरी और शिक्षकों की परेशानी

सरकार के लिए जनगणना या गणना कार्य बड़ा प्रशासनिक अभियान होता है. इसके लिए पढ़े-लिखे, स्थानीय और भरोसेमंद कर्मचारियों की जरूरत होती है. शिक्षक इस काम के लिए प्रशासन को सबसे उपयुक्त लगते हैं क्योंकि वे गांव और मोहल्ले के स्तर पर लोगों से जुड़े होते हैं.

लेकिन शिक्षकों का कहना है कि उपयुक्त होने का मतलब यह नहीं कि हर जिम्मेदारी उन्हीं पर डाल दी जाए. अगर सरकार को शिक्षकों से यह काम लेना है, तो समय, मानदेय, सुरक्षा और स्कूल की पढ़ाई पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखकर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए.

समाधान क्या हो सकता है?

शिक्षकों का कहना है कि वे सरकारी काम से भाग नहीं रहे, लेकिन व्यवस्था व्यावहारिक होनी चाहिए. अगर गणना का काम करवाना है तो स्कूल समय, छुट्टी, मानदेय और सुरक्षा को लेकर स्पष्ट आदेश जारी हो. सिर्फ मौखिक या दबाव आधारित व्यवस्था से भ्रम और नाराजगी दोनों बढ़ेंगे.

बिहार के शिक्षक आज इसी सवाल के साथ खड़े हैं. उनका कहना है कि वे सरकार के कर्मचारी जरूर हैं, लेकिन सबसे पहले वे शिक्षक हैं. और अगर शिक्षक को पढ़ाने से ज्यादा दूसरे कामों में लगाया जाएगा, तो नुकसान सिर्फ शिक्षक का नहीं, आने वाली पीढ़ी का होगा.