5वें फ़ूड सेफ्टी इंडेक्स (food safety index) में केरल (63 अंक) को पहला और पंजाब (57.5 अंक) को दूसरा स्थान मिला है. जबकि तमिलनाडु (56.5 अंक) इस वर्ष पहले से तीसरे स्थान पर पहुंच गया है. जबकि पिछले वर्ष जारी हुए फ़ूड सेफ्टी रैंक में केरल को छठा और पंजाब को 11वां रैंक मिला था. लेकिन इस वर्ष इन दोनों राज्यों ने अपनी ‘खाद्य सुरक्षा जांच’ को पुख्ता किया और अपने रैंक में सुधार किया.

वहीं इस इंडेक्स में मध्य प्रदेश (56 अंक) को चौथा और उत्तरप्रदेश (52.5 अंक) को पांचवा स्थान मिला है.
सूचकांक (index) निर्धारण के लिए सभी राज्यों को तीन समूहों में बांटा गया था. पहले समूह में बड़े राज्यों को रखा गया है जिसमें 20 राज्य है. दूसरा समूह छोटे राज्यों का है जिसमें 8 राज्य हैं और तीसरा समूह केंद्रशासित प्रदेशों का है.
बड़े राज्यों के समूह में ही बिहार शामिल है. 20 राज्यों के इस समूह में बिहार नीचे से दूसरे स्थान पर है. बिहार को रैंकिंग इंडेक्स में 100 में से 20.5 अंक मिले हैं. वहीं झारखंड को 20 अंक मिले हैं.
खाद्य प्रबंधन और गुणवत्ता में बिहार पिछड़ा
अपने खराब खाद्य प्रबंधन और खाद्य गुणवत्ता जांच के कारण बिहार लगातार इस इंडेक्स में निचले पायदान पर रहा है. इस वर्ष बिहार को काफ़ी कम अंक मिले हैं.
- मानव संसाधन और संस्थागत डेटा के 18 अंकों में से 3 अंक
- नियमों के पालन के लिए 28 में से 8 अंक
- खाद्य परीक्षण के लिए व्याप्त संसाधन के 17 में से 5 अंक
- प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण के 8 में से 3.5 अंक
- उपभोक्ता सशक्तिकरण के 19 में से मात्र 1 अंक
इस इंडेक्स में एक मापदंड खाद्य सुरक्षा सूचकांक (SFSI) में सुधार लाने के लिए किये गये प्रयासों का भी है. जिसमें 20 राज्यों में से 14 राज्य को शून्य अंक दिया गया है. बिहार भी उन्हीं राज्यों में शामिल है.
मानव संसाधन और संस्थागत डेटा में अंको का निर्धारण राज्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध अधिकारियों की संख्या और उनकी कार्यशैली पर निर्भर करता है. लेकिन केवल 3 अंक मिलना यह दर्शाता है कि राज्य में इसकी भारी कमी है.

फ़ूड सेफ्टी कमिश्नर का पद फ़िलहाल ख़ाली
फ़ूड सेफ्टी इंडेक्स में बिहार की रैंकिंग अच्छी क्यों नहीं हो पा रही है, इसकी जानकारी के लिए डेमोक्रेटिक चरखा ने फ़ूड सेफ्टी कमिश्नर से संपर्क करने का प्रयास किया. लेकिन उनके ऑफिस से बताया गया कि
उनका 5-6 दिन पहले ही दूसरे विभाग में ट्रांसफर हो चुका है. अभी इस पद का प्रभार किसी को नहीं दिया गया है. इसलिए हम आपको कोई जानकारी नहीं दे सकते हैं.
प्रभाकर सालों से बिहार में खाद्य सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे हैं. ‘राइट टू फ़ूड’ नाम के जनअभियान से जुड़े प्रभाकर बताते हैं
अगर बिहार को फूड सिक्योरिटी में सुधार लाना है तो तीन काम करने होंगें. सबसे पहला- राशन उठाव और वितरण का मैकेनिज्म पंचायत लेवल पर करना होगा. अभी लोकल लेवल से अनाज खरीदने के बाद स्टेट उसे एफसीआई (FCI) को भेजती है. फिर वापस स्टेट, एफसीआई से वही अनाज मांगती है. जहां से वापस पीडीएस के माध्यम से उस अनाज को लाभुकों तक पहुंचाया जाता है. इस उल्टे चेन को बदलना होगा. क्योंकि इस चेन में अनाज का लीकेज और बर्बादी बहुत होता है. हमारी पुरानी मांग है की हर पंचायत में गोदाम बनाया जाए और उस गोदाम को डायरेक्ट पीडीएस (PDS) से जोड़ा जाए.
PDS में मिलना वाला अनाज मवेशियों के खाने लायेक होता है
भोजन के अधिकार के तहत 2013 में लागू किया गया राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम दुनिया का सबसे बेहतर खाद्य आधारित सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 80 करोड़ आबादी इस योजना का लाभ ले रही है. लेकिन क्या इन 80 करोड़ लोगों को गुणवत्तापूर्ण अनाज मिल रहा है.
बिहार में पीडीएस के तहत राशन कार्ड की संख्या 17,907,319 है जिसके द्वारा कुल 87,172,572 लोगों को राशन दिया जा रहा है. इसमें शहरी लाभार्थियों की संख्या 14,86,687 और ग्रामीण लाभार्थियों की संख्या 1,64,13,824 है.
प्रभाकर लाभुकों के चयन पर सवाल उठाते हुए डेमोक्रेटिक चरखा को आगे बताते हैं
सबसे ज़रूरी बदलाव जो राज्य और केंद्र दोनों को करने होंगे वो है, लाभुकों का चयन. क्योंकि पीडीएस में अभी भी 2011 की जनगणना के आधार पर लाभुकों का चयन किया जा रहा है. 13 साल बाद जनसंख्या में हुए बदलाव को जोड़ा नहीं गया है. अगर हमारे यहां 85% लोगों को पीडीएस का लाभ देना है, तो वह 2011 की जनगणना के हिसाब से है. ऐसे में बहुत सारे ज़रूरतमंद लोग छूट जा रहे हैं. वहीं पुराने डाटा में भी जब लाभुकों का चयन किया जा रहा था तो उसमें सही लोगों का चयन नहीं किया गया है.
बिहार में नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट में एक प्रावधान है सेल्फ इन्क्लुज़न (self inclusion). यानि कुछ ख़ास जरूरतमंद लोगों को बिना किसी सर्वे के लाभुकों की सूची में शामिल करना है. जैसे एससी, एसटी, बेघर, दिव्यांग और ट्रांसजेंडर लोगों को डायरेक्ट इस सूची में शामिल करने का प्रावधान है. इस प्रावधान को बिहार में अभी तक लागू नहीं किया गया है. जिसके कारण सबसे ज्यादा जिन लोगों को इसकी आवश्यकता है वही छंट जाते हैं.

फूड सेफ्टी जांच दुरुस्त नहीं होने से पीडीएस में अनियमितता
बिहार के बेगूसराय जिले के ऐजनी गांव में पीडीएस में अनियमितता के कारण लोगों को काफ़ी परेशानी उठाना पड़ा है. एजनी की रहने वाली शांति देवी राशन वितरण में हो रही गड़बड़ी से परेशान होकर सरकार से सवाल करती हैं
सरकार अनाज खाने के लिए देती है या फेंकने के लिए. चावल का दाना टूटा और सड़ा रहता है जिसको केवल माल-जाल (मवेशी) ही खा सकता है. सब जगह उसना चावल दिया गया जबकि हमारे यहां अरवा चावल दिया गया है. वो भी टूटा हुआ.
इसी गांव की रहने वाली सुनीता देवी कहती हैं
डीलर अनाज तो देता है लेकिन कोटा से कम और सड़ा हुआ. जो अनाज दिया जाता है उसमें भी पांच किलो अनाज कम दिया जाता है. ये बात पूरा गांव जानता है. विरोध करने पर कहता है कम ही देंगे. मेरी दुकान पर जो मजदूर काम करता है उसको वेतन कहां से देंगे. ऊपर से ही आदेश है और डांटकर कहता है जहां जाना है जाइए.
प्रभाकर कहते हैं
पीडीएस में गड़बड़ी रोकने के लिए पंचायत लेवल पर ही मज़बूत शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) का निर्माण करना होगा. जहां तय समय सीमा के अंदर लाभुकों की शिकायतों को दूर किया जा सकेगा. ये दो बदलाव राज्य में करने होंगे.
यह कोई पहली घटना नहीं है जहां डीलर द्वारा कम और गुणवत्ता विहीन अनाज बांटा जा रहा है. बिहार में समय-समय पर करोड़ों रुपए के राशन घोटाले, उपभोक्ताओं के साथ डीलरों के दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आती रहती हैं. राशन वितरण प्रणाली में कालाबाजारी की सबसे बड़ी वजह है, जमाखोरी. कई बार अनाज की गुणवत्ता इतनी खराब होती है जिसे खाया नहीं जा सकता है. डेमोक्रेटिक चरखा लगातार पीडीएस में हो रही गड़बड़ी को लेकर रिपोर्ट बनाते रहा है.
अगर बिहार को अपने खाद्य सुरक्षा योजना या खाद्य सुरक्षा इंडेक्स रैंकिंग में सुधार लाना है तो सबसे पहले यहां पीडीएस, समेकित बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) और एमडीएम में मौजूद कमियों को दूर करना होगा. जबतक इन योजनाओं में मौजूद कमियां दूर नहीं होंगी तबतक फूड सिक्योरिटी की बात नहीं की जा सकती.
दूषित भोजन खाने से बीमार होने का ख़तरा, सबसे ज़्यादा 5 साल से कम उम्र के बच्चों पर
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण (step) उत्पादन से लेकर कटाई, प्रसंस्करण, भंडारण, वितरण, तैयारी और उपभोग तक भोजन सुरक्षित रहे. क्योंकि सुरक्षित और स्वच्छ भोजन अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है.
वातावरण में मौजूद संक्रामक या विषाक्त बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या रासायनिक पदार्थ हमारे शरीर में दूषित भोजन या पानी के माध्यम से ही पहुंचती है. जिसके कारण ही खाद्यजनित बीमारियां होती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में हर साल 10 में से एक व्यक्ति, दूषित भोजन खाने से बीमार पड़ता है.
उसमें भी दूषित भोजन का शिकार सबसे ज़्यादा बुजुर्ग व्यक्ति, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे और निम्न आय वर्ग की आबादी होती है. असुरक्षित भोजन लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है. डब्लूएचओ (WHO) के रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 4.20 लाख लोग हर साल दूषित भोजन खाने से मर जाते हैं.
वहीं दूषित खाने की वजह से होने वाली बीमारियों का 40%, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों बच्चों को होता है. जिसके कारण हर साल 1.25 लाख बच्चों की मौत हो जाती है.





