आने वाले समय में बेसहारा बुजुर्ग की आबादी शायद हमारे देश में बढ़ने वाली है. क्योंकि आगे बढ़ने की होड़ में आज की युवा पीढ़ी, बुजुर्गों को बेसहारा छोड़ने में जरा भी नहीं हिचक रही है. ‘बुजुर्ग’ मां-बाप जिन्हें बुढ़ापें में सबसे ज़्यादा अपने बच्चों के सहारे की ज़रूरत होती है, वैसी अवस्था में ही बच्चे उन्हें अकेला छोड़ देते हैं.
80 वर्षीय निजामुद्दीन स्टेशन रोड के फूटपाथ पर सिलाई का काम करते हैं. उम्र के इस पड़ाव में भी काम करने को मजबूर निजामुद्दीन आर्थिक परेशानियों का हवाला देते हुए बताते हैं, “उम्र चाहे कितनी हो जाए, जीने के लिए पैसा तो चाहिए. रोज़ाना के खर्चे पूरे करने हैं तो काम तो करना ही पड़ेगा.”

पटना के खाजेकलां में निजामुद्दीन अपनी पत्नी के साथ रहते हैं. उनके दो बेटे हैं, दोनों बेटे अपने परिवार के साथ दिल्ली और पंजाब में रहते हैं. ऐसे में यह प्रश्न उठता है, कि क्या उनके बच्चे उनकी देखभाल नहीं करते? निजामुद्दीन झिझकते हुए इस बात से इंकार करते हैं और कहते हैं.
बेटे का अपना परिवार है लेकिन मैं उसपर बोझ नहीं बनना चाहता. जब तक शरीर साथ दे रहा है काम करता रहूंगा.
निजामुद्दीन बताते हैं
अब आंखो से उतना साफ़ नहीं दिखता, इसलिए सिलाई तो बहुत कम कर पाता हूं. अब सिलाई के साथ रस्सियां बेचने का काम करता हूं.
बचपन एक ऐसी अवस्था है, जब एक बच्चे को मां-बाप के प्यार और सहारे की ज़रूरत होती है. ठीक वैसे ही मां-बाप को उनके ढलते उम्र में बच्चों के प्यार और देखभाल की ज़रूरत होती है. ढलते उम्र में अगर बुजुर्गों को उनके बच्चों का साथ और सहारा नहीं मिलता है, तब वे खुद को मायूस और असहाय महसूस करते हैं. ये मायूसी कभी-कभी इतनी बढ़ जाती है कि वो अपनी जान तक दे देते हैं.
हालांकि कई बुजुर्ग उम्र के इस पड़ाव में हालातों से समझौता करने के बजाए मेहनत करना निश्चित करते हैं. बच्चों के आगे हाथ फैलाने के बजाए ख़ुद की मेहनत के साथ गरिमापूर्ण जीवन जीने का संकल्प करना इनके लिए आसान तो नहीं है. लेकिन खुद के बच्चों की निर्ममता और बेरुख़ी के कारण लाचार वृद्धजन काम करने को विवश हैं.
बच्चे नहीं बन रहे बुजुर्गों का सहारा
बरबीघा के रहने वाले 80 वर्षीय कैलाश महतो रिक्शा चालक हैं. नयाचक से रोज़ाना हनुमान नगर रिक्शा चलाने आने वाले कैलाश रोज़ाना के 200-300 रूपए ही कमा पाते हैं. इतने कम पैसे में गुज़ारा करना कैलाश के लिए मुश्किल भरा होता है.
कैलाश कहते हैं
जिस दिन बाजार अच्छा रहता है उस दिन तो कमाई ठीक-ठाक हो जाती है. लेकिन आम दिनों में 200 रूपए होना भी मुश्किल है. वो तो राशन कार्ड बना हुआ है तो भात-रोटी खा ले रहे हैं.

बच्चों का जिक्र होने पर कैलाश कहते हैं
तीन-तीन बेटा है लेकिन सब अपने दुनिया में मस्त है. हम दोनों प्राणी (पति-पत्नी) का सुध लेने का समय नहीं है उन लोगों के पास. जिस दिन मर जाएंगे उस दिन आकर जला दे वही बहुत है.
वृद्धावस्था में ना केवल शरीर बल्कि मानसिक स्थिति भी दुर्बल हो जाती है. ऐसे में प्रत्येक बुज़ुर्ग को किसी न किसी तरह की सहायता की आवश्यकता होती है. बुढ़ापे में व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की ज़रूरत होती है. वो चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे बात करें, उनसे सलाह लें, उनकी बातों को महत्व दें.
बुढ़ापे में अकेले रहने वाले बुजुर्ग डिप्रेशन का हो रहे शिकार
लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में अब संयुक्त परिवार का सिद्धांत खत्म होता जा रहा है. जिसके कारण बुज़ुर्ग अब परिवार में बोझ समझे जाने लगे हैं. परिवार में रहने के बाद भी उनसे कोई राय नहीं ली जाती है. उनके पसंद नापसंद पर बात नहीं की जाती है. जिसके कारण वो अपनी भावनाएं किसी के साथ साझा नहीं कर पाते हैं, और अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं. परिवार में अपनी अहमियत ना समझे जाने के कारण वे हताश एवं उपेक्षित जीवन जीने को विवश हो रहे हैं.
उपेक्षा के कारण वृद्धजन अवसाद का शिकार हो जाते हैं. एक सर्वे के मुताबिक 30 से 50 फीसदी बुजुर्गों में ऐसे लक्षण मौजूद थे जो उन्हें अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार बनाते हैं.
बुढ़ापे में अवसाद का शिकार हो रहे बुजुर्गों के लिए मनोवैज्ञानिक डॉ. समिधा पांडे कहती हैं
माता-पिता अक्सर ये भूल जाते हैं कि वो माता-पिता के आलावा एक इंसान या पति-पत्नी भी हैं. माता-पिता होना हमारे ऊपर हावी हो जाता है. जब बच्चे पढ़ने या नौकरी करने चले जाते हैं तो उनके लिए आसान नहीं होता है. वो ये अपना नहीं पाते हैं कि उनकी अपनी भी एक जिंदगी है. इस तरह की स्थिति को एम्प्टीनेस सिंड्रोम (Emptiness syndrome) कहते हैं.
बुढ़ापे में अवसाद से बचाव के लिए डॉ समिधा कहती हैं
माता-पिता को शुरुआत से ही अपने लिए भी समय निकालना चाहिए. ताकि जब बच्चे बड़े हो जाए या अपनी फैमिली को ज़्यादा समय देने लगें तो माता पिता इससे दुखी ना हों. माता पिता को डीटैच्मेंट (अलग होने) का गुण अपनाना होगा. ताकि जब बच्चे उनसे दूर हो तब भी वो मानसिक रूप से मजबूत रहें.
बच्चों द्वारा ठुकराए गये इन लाचार बुजुर्गों की मदद करने में सरकार की योजनायें भी नाकाफ़ी साबित हो रही है. एनएसएपी भारत सरकार की एक केन्द्रीय प्रायोजित योजना है. जो सामाजिक पेंशन के रूप में वृद्ध, विधवा और विकलांग व्यक्ति को वित्तीय सहायता प्रदान करता है.
वृद्धा पेंशन कार्ड नहीं बनने से निराश बेसहारा बुज़ुर्ग
बंका घाट के रहने वाले उपेन्द्र राम (70 वर्ष) डाकबंगला चौराहे पर रिक्शा चलाते हैं. अपनी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए घर से दूर पटना में रिक्शा चलाते हैं. सरकारी किसी भी पेंशन योजना का लाभ नहीं मिलने की बात कहते हुए उपेन्द्र राम कहते हैं.

पेंशन कार्ड बनाने के नाम पर 500 रुपया लिया था. उसके बाद भी कार्ड बनाकर नहीं दिया. कितना बार मुखिया जी से भी कहे कि बनवा दीजिए लेकिन नहीं बना. बाल बच्चा अगर सेवा करता तो इस उम्र में बाहर कमाने थोड़े आते.
उपेन्द्र राम की ही तरह कैलाश महतो का भी पेंशन कार्ड नहीं बना है. अगर इन दोनों बुजुर्गों को सरकार द्वारा चलाई जा रही- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना या मुख्यमंत्री पेंशन योजना का लाभ मिल पाता तो शायद उनकी थोड़ी मदद हो पाती.
क्या है पेंशन योजना?
इंदिरा गांधी वृद्धा पेंशन कार्ड बीपीएल परिवार के उन बुजुर्गों को दिया जाता है जिनकी उम्र 60 वर्ष हो चुकी है. इसके तहत वृद्धजन को हर महीने 400 रूपए आर्थिक सहायता के रूप में दिए जाते है. जिसमें आधी राशि केंद्र और आधी राज्य के द्वारा वहन की जाती है. वहीं 80 वर्ष का होने पर 500 रूपए की राशि दी जाती है जिसमें पूरी राशि केंद्र द्वारा वहन की जाती है.
वहीं मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना का लाभ सभी वर्ग के उन बुजुर्गों को दिया जाता है जिनकी उम्र 60 वर्ष हो. 60 से 79 वर्ष के बुजुर्गों को 400 रूपए और 80 वर्ष के बुजुर्गों को 500 रूपए दिए जाते हैं.
इस योजना की शुरुआत वर्ष 2019-20 में की गयी थी. जिसके लिए राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2022-23 में सभी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए 544646.34 लाख का आवंटन किया गया था.
जिसमें से जनवरी 2023 तक 92.03 लाख पेंशनधारियों को 370585.75 लाख रूपए का भुगतान किया गया था.
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 43,73,047 बुजुर्गों को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAMS) का लाभ दिया जा रहा है. जिसमें 22,10,220 महिला और 21,61,810 पुरुष शामिल हैं.
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (IGNWPS) के तहत बिहार में 6,36,630 महिलाओं को विधवा पेंशन का लाभ दिया जा रहा है.

समाज में बढ़ रहा बुजुर्गों के साथ अपराध
साल 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में बजुर्गों की संख्या 77 लाख 07 हजार के करीब है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है. जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की संख्या 89% यानी लगभग 68 लाख बुजुर्ग हैं.
वहीं देश की कुल आबादी में बुजुर्गों की संख्या 8.4% थी. जो 2036 तक बढ़कर 15% तक होने का अनुमान है. बिहार में भी बुजुर्गों की आबादी 2036 तक 10.9% से अधिक होने की संभावना है. ऐसे में उनके साथ दुर्व्यवहार की संख्या में भी तेजी से इज़ाफा होने की संभावना है.
एनसीआरबी (NCRB) 2021 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में बुजुर्गों के साथ अपराध के 1.9% मामले दर्ज हुए थे. जबकि पुरे देश में 25.1% बुजुर्गों के साथ अपराध के मामले दर्ज हुए थे.
हालांकि साल 2021 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के अनुरोध पर इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस द्वारा देश के सभी राज्यों में रहने वाले बुजुर्गों के जरूरतों और अवसरों का आकलन किया गया है.
गुणवत्ता सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार देश स्तर पर बुजुर्गों का ख्याल रखने के मामले में बिहार उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश से बेहतर है. बुजुर्गों को गुणवत्ता पूर्ण जीवन प्रदान करने के मामले में बिहार देश के तीन शीर्ष राज्यों में शामिल है. बिहार को इसमें 51.82 अंक मिला है. जबकि शीर्ष के राज्य राजस्थान को 54.61 अंक मिला है. वहीं 5 मिलियन से कम बुजुर्गों वाले राज्य में हिमाचल प्रदेश (61.04) शीर्ष पर रहा है.
बेसहारा बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ाना आने वाले समय की ज़रूरत
आने वाले दिनों में वृद्धों की बढ़ती संख्या के मद्देनज़र आज सरकार को हर जिले में वृद्धाश्रम खोलने की ज़रूरत महसूस हो रही है. यहां यह बात सोचने पर मज़बूर करती है कि क्या हमारे माता-पिता की ज़िम्मेवारी सरकार की है?
बिहार में बेसहारा बुजुर्गों को आश्रय देने के लिए बिहार सरकार ने ‘मुख्यमंत्री वृद्धजन आश्रय स्थल’ बनाने का निर्णय लिया है. इस योजना के तहत राज्य के सभी जिलों में दो-दो वृद्धाश्रम खुलने हैं. जिसका संचालन निजी एजेंसी की जगह राज्य सरकार खुद करेगी. राज्य के सभी 38 जिलों व 101 अनुमंडलों में 6950 बेड वाले 139 वृद्धाश्रम स्थापित करने की स्वीकृति कैबिनेट से मिली है. पहले चरण में 76 का लक्ष्य रखा गया है. दूसरे चरण में शेष 63 वृद्धाश्रमों का निर्माण किया जाएगा.
फिलहाल राज्य में ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण नियमावली 2012’ के तहत पांच जिलों- पटना, पूर्णिया, रोहतास, भागलपुर, पश्चिम चंपारण में एक-एक वृद्धाश्रम चलाया जा रहा है. इन वृद्धाश्रमों का संचालन गैर सरकारी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है.
मुख्यमंत्री सात निश्चय के तहत ओल्ड एज होम का निर्माण
समाज कल्याण विभाग के सामाजिक सुरक्षा निदेशालय में असिस्टेंट डायरेक्टर हरी शंकर सिंह बताते हैं “वृद्धाश्रम ‘सहारा’ के तहत तीन जगहों पटना, गया और पूर्णिया में 100 बेड के और तीन जगहों पर 50 बेड के वृद्धाश्रम का संचालन हो रहा है. वहीं मुख्यमंत्री सात निश्चय-2 के तहत ‘मुख्यमंत्री वृद्धजन आश्रय स्थल’ का निर्माण किया जाना है जिसका संचालन नगर आवास एवं विकास विभाग कर रहा है.”
वृद्धाश्रम में बुजुर्गों को रखने से पहले किन बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है. इसपर हरी शंकर बताते हैं “बीपीएल समुदाय से आने वाले बुजुर्ग व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति जिनका कोई नहीं हो और आर्थिक रूप से बिल्कुल कमज़ोर हों उनकों वृद्धाश्रम में रखा जाता है. जिला स्तर पर स्क्रीनिंग कमिटी होती है जो जानकारी मिलने पर, सबसे पहले उनका रेसक्यू- पुलिस, सोशल वेलफेयर या एनजीओ के माध्यम से करवाती है. फिर काउंसिलिंग के माध्यम से उनकी मदद की जाती है.”
अगर किसी व्यक्ति को लाचार बुजुर्ग व्यक्ति की जानकारी देनी है, तो वह पैन इंडिया टॉल फ्री नंबर 14567, पुलिस स्टेशन या डिस्ट्रिक्ट कंट्रोल रूम में जानकारी दे सकता है.
हालांकि इन वृद्धाश्रमों में जगह मिलना इतना आसान नहीं होता है. घर से निकाले जाने के बाद कई बुजुर्गों को सड़क पर भीख मांगकर गुजारा करना पड़ता हैं. खाने के लिए भोजन और सर पर छत मिलना सभी बेसहारा बुजुर्गों को नसीब नहीं है. क्योंकि वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की रहने की संख्या सीमित होती है.

लोक-लाज के कारण दुर्व्यवहार पर चुप रहते हैं बुजुर्ग
बुजुर्गों को अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार के खिलाफ़ कानूनी मदद लेने का अधिकार है. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण कानून 2007 (MWPSC) है, जो विशेष रूप से संतानों द्वारा सताए जा रहे बुजुर्गों के लिए है.
हरी शंकर कहते हैं “सीनियर सिटिजन एंड पैरेंट्स मेंटेनेंस एक्ट 2007 है जिसके लिए राज्य सरकार ने नियम 2012 बना रखा है. जिला में एडीएसएस इसके नोडल पदाधिकारी होते हैं जिनके पास आवेदन देना होता है. आवेदन देने के 60 दिनों के अंदर हियरिंग होती है जिसमें तय किया जाता है कि मेंटेनेंस देना है या नहीं.”
इस कानून के तहत बच्चों, रिश्तेदारों के लिए माता-पिता, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल करना, उनके स्वास्थ्य, उनके रहने-खाने जैसी बुनियादी ज़रूरतों की व्यवस्था करना अनिवार्य है.
इस कानून की खास बात ये है कि अगर बुजुर्ग अपनी संपत्ति बच्चों या रिश्तेदार के नाम ट्रांसफर कर चुके हैं और वो अब उनकी देखभाल नहीं कर रहे हैं तो संपत्ति का ट्रांसफर भी रद्द हो सकता है. यानी वह संपत्ति फिर से बुजुर्ग के नाम हो जाएगी. इसके बाद वह चाहे तो अपने बेटे-बेटियों को अपनी संपत्ति से बेदखल भी कर सकते हैं.
इसके अलावा, वैसे माता-पिता जो अपनी आय या संपत्ति के जरिए अपनी देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं और उनके बच्चे या रिश्तेदार उनका ध्यान नहीं रख रहे हैं तो वे भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं. जिसके बाद उन्हें हर महीने 10 हज़ार रुपये तक का गुजारा-भत्ता मिल सकता है. यही नहीं, भरण-पोषण के आदेश का एक महीने के भीतर पालन करना अनिवार्य है.
हालांकि लोक-लाज के कारण बुजुर्ग अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ़ घर से बाहर किसी से बात नहीं करते हैं. ऐसे में बच्चों की नैतिक ज़िम्मेवारी है की वो अपने माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखें.





