World Music Day: कला बचाने की बात लेकिन बिहार कलाकारों के लिए ठेंगा?

बिहार के अलग-अलग भागों में सरकार द्वारा कई लोक महोत्सवों का आयोजन किया जाता है. लोक-महोत्सव का मूल उद्देश्य स्थानीय कला-संस्कृति और कलाकारों को मंच देना है. लेकिन कलाकारों का आरोप है कि सरकार इसमें भी बाहरी कलाकारों को मौका देती है.

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संगीत कलाकार

बिहार के संगीत कलाकार

अभी आप सभी लोग पंचायत वेब सीरीज़ 'हिन्द के सितारा' गाने को सोशल मीडिया पर काफ़ी सुन रहे होंगे. कई रील्स भी देखी होगी. उस गाने से बिहार के लोकसंगीत पर काफ़ी चर्चा हो रही है. लेकिन उसके बाद भी बिहार के लोक संगीतकार की स्थिति बेहतर क्यों नहीं है? गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी फ़िल्मों में भी बिहार के लोककलाकारों ने अपनी प्रतिभा का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया था. 'ओ वुमनिया' से लेकर 'तार-बिजली से पतले हमारे पिया' जैसे पॉप कल्चर के बिहारी लोकगायकों गाने भी काफ़ी मशहूर हुए हैं.

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हालांकि ये सभी मौके कभी-कभार के होते हैं. हमेशा काम मिलना, ख़ास तौर से उनके लिए जो पॉप कल्चर संगीत से नहीं जुड़े हैं, मुश्किल है. अब यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह कलाकारों को उचित अवसर और सहायता उपलब्ध कराए ताकि उनकी कला और जीविका दोनों जीवित रह सके.

कई लोकभाषाओं का गढ़ है बिहार

बिहार में मगही, भोजपुरी और मैथिली सहित कई भाषाओं में लोकगीत गाए जाते रहे हैं. बिहार में कलाकार और सामान्य लोग विभिन्न तरह के लोकगीत, जैसे- मौसम के अनुसार नचारी, फाग, चैता, पुरबी, लागानी, कजरी, बिरहा और बसंत जैसे लोकगीत. वहीं शादी-ब्याह में संस्कार से जुड़े गीत, जन्मोत्सव पर सोहर, और अन्य उत्सवों पर जटासरी, झूमर, जैसे गीत गाए गाते हैं.

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लेकिन सरकारी उदासीनता (government policies) ने राज्य में संगीत कला से जुड़े कलाकारों (Bihar's music artists) को निराश किया हैं. उन्हें सरकारी तंत्र से सहयोग और श्रोताओं से स्नेह की अपेक्षा हैं. 

कलाकार नहीं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर चाहिए

कुछ सालों पहले संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से सम्मानित कलाकार ब्रजकिशोर दुबे जी ने आत्महत्या की थी. उन्हें अवार्ड मिलने के बाद एक दो प्रोग्राम मिले थे लेकिन उसके बाद सरकार उन्हें भूल गई. उन्हें लंबे समय से सरकार द्वारा आयोजित महोत्सवों में भी स्टेज प्रोग्राम नहीं दिया जा रहा था.

साल 2017-18 में बिहार सरकार द्वारा श्वेत प्रीति को विंध्यवासिनी देवी पुरस्कार मिला था. 25 सालों से संगीत के क्षेत्र में सक्रिय श्वेत प्रीति सरकार की उदासीनता से काफ़ी नाराज़ हैं. उनका ये मानना है कि “सरकार कुछ ही सालों में यह भूल जाती हैं कि आप अवार्डी हैं. वह भी केवल उन कलाकारों को तवज्जों देती है जो मीडिया द्वारा हाईलाइट हो चुके हैं. जबकि यह ज़रूरी नहीं है कि हर आर्टिस्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़ा हो. हमारी उम्र के वैसे कलाकार जो टेक्निकल तौर पर थोड़ा भी पीछे हैं उन्हें अपना करियर बनाने में काफी समस्या आ रही है. हमलोग किसी तरह स्कूल-कॉलेज और एनजीओ से जुड़कर अपना काम चलाते हैं.” 

गायिका श्वेत प्रीति

बिहार के अलग-अलग भागों में सरकार द्वारा कई लोक महोत्सवों का आयोजन किया जाता है. लोक-महोत्सव का मूल उद्देश्य स्थानीय कला संस्कृति और कलाकारों को मंच देना है. लेकिन कलाकारों का आरोप हैं कि सरकार इसमें भी बाहरी कलाकारों को मौका देती है.

श्वेत प्रीति आगे बताती हैं “सोनपुर मेला महीनों तक चलने वाला महोत्सव हैं. इसमें होने वाले प्रोग्राम की लंबी लिस्ट होती है. लेकिन उसमें भी उन कलाकारों को बुलाया जाता है जिन्हें पहले ही मंच मिल चुका है जिनकी अपनी पहचान बनी हुई है.”

स्थानीय कलाकारों के लिए नियम होने बाद भी सिर्फ़ हताशा

साल 2022 में बिहार सरकार ने लोक महोत्सव के दौरान राज्य के बाहर के कलाकारों पर 90 प्रतिशत तक राशि खर्च करने की नीति को खत्म करने के आदेश दिए थे. सरकार ने जिला मुख्यालयों को आदेश दिया था कि महोत्सव के लिए जिलों को मिलने वाले आवंटन का कम से कम 60 प्रतिशत जिला व स्थानीय कलाकारों पर खर्च किया जाए.

क्षेत्रीय कलाकारों को आने वाली परेशानियों को उठाते हुए श्वेत कहती हैं “बिहार के लगभग महोत्सव अब जिला प्रशासन को दे दिया गया है, जिसके कारण अब क्षेत्रीय कलाकारों को जिला तक अपनी पहुंच बनानी होगी. उन्हें जिला का चक्कर लगाना होगा. वहां आवेदन देना होगा. अगर आपकी पहुंच है तो आपको प्रोग्राम मिल सकता है वर्ना नहीं.”

क्या है सरकार की योजना?

संगीत से जुड़े कलाकारों के लिए राज्य सरकार प्रत्येक जिले में संगीत कार्यक्रमों का आयोजन करवाती है. बिहार सरकार तीन कार्यक्रम शुक्रगुलजार, शनिबहार एवं विशेष शुक्रगुलजार का आयोजन करती है. पहले तो यह कार्यक्रम केवल राजधानी पटना में ही आयोजित किए जाते थे लेकिन 2022 से इसे प्रत्येक जिले में आयोजित करवाए जाने के निर्देश दिए गये हैं.

शुक्रगुलजार कार्यक्रम प्रत्येक माह के दूसरे शुक्रवार को संचालित होता है. इसमें स्थापित कलाकारों या उनके समूह द्वारा प्रस्तुती दी जाती है. वहीं शनिबहार कार्यक्रम प्रत्येक माह के चौथे शनिवार को नवोदित कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है.

इसके अतिरिक्त विशेष शुक्रगुलजार कार्यक्रम प्रत्येक माह के पहले अथवा तीसरे शुक्रवार को राज्य के बाहर के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है.

इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए सालों भर आवेदन दिए जाते हैं.

"शादी-पार्टी और ऑर्केस्ट्रा में काम करना मजबूरी"

गायिका और संगीत शिक्षिका रश्मि इन कार्यक्रमों को नाकाफ़ी बताती हैं. रश्मि कहती हैं “दूरदर्शन और आकशवाणी द्वारा संचालित इन कार्यक्रमों से कलाकारों को कितना फ़ायदा हो सकता हैं. संगीत में करियर के बहुत विकल्प हैं. लेकिन बिहार में कलाकार केवल शादी-पार्टी, स्टेज शो और आर्केस्ट्रा में काम करके अपना घर चलाते हैं. युवा कलाकार कैफे-रेस्टोरेंट में शो करते हैं. इसके अलावा उनके पास कोई साधन नहीं है.”

संगीत के कलाकार

अभी हाल ही में बिहार सरकार ने बीपीएससी के माध्यम से संगीत शिक्षकों की नियुक्ति की है. हालांकि यह नियुक्ति भी लंबे समय बाद हुई है.

कलाकारों की आर्थिक सहायता के लिए कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ‘कलाकार कल्याण कोष’ का संचालन करती है. इसके तहत सहायता के लिए आवेदन पर निर्णय संबंधी बैठक प्रत्येक माह की जाती है. इसके तहत कलाकारों को चिकित्सीय सहायता, प्रदर्शन कला के क्षेत्र में सहायता, उच्च शिक्षा और शोध के लिए आर्थिक मदद दिया जाता है.

अनुदान की कोई एक निश्चित राशि निर्धारित नहीं की गई है. इसका निर्णय अनुदान समिति द्वारा किया जाता है. वहीं नए कलाकार जो तंगी की स्थिति से गुज़र रहे हैं और जिनकी मासिक आय पांच हजार रूपए से कम है. उनको चिकित्सीय सहायता के अतिरिक्त वाद्य यंत्र एवं कला सामग्री खरीदने हेतू पांच हजार की अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने की योजना है.

वैसे कलाकार अनुदान के पात्र नहीं होते हैं जिनकी आय तीस हजार रुपए मासिक से ज्यादा है. हालांकि इसका लाभ अबतक कितने कलाकारों को मिला है इसका कोई आंकड़ा वेबसाइट पर मौजूद नहीं है. साथ ही हर साल राष्ट्रपति सम्मान और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार या राज्य सरकार द्वारा सम्मानित कलाकारों की सूची भी राज्य सरकार के वेबसाइट पर मौजूद नहीं है.

म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट के लिए नहीं है स्कोप

राज्य में संगीत के क्षेत्र में रूचि रखने वाले छात्र इसमें डिप्लोमा, स्नातक से लेकर पीजी तक कि डिग्री हासिल कर सकते हैं. इसके लिए राज्य में निजी, सरकारी और अर्ध सरकारी मिलाकर 77 कॉलेज मौजूद हैं. लेकिन अधिकांश में वोकल यानी गायन की शिक्षा दी जाती है. इंस्ट्रूमेंट (वादन) की शिक्षा के लिए एक या दो कॉलेज ही मौजूद हैं. वह भी केवल तबला के लिए.

श्वेत प्रीति कहती हैं “म्यूजिक का मतलब केवल गायन तो नहीं है, वादन भी है. लेकिन यहां केवल गायन में ही तैयारी करवाई जाती है. वादन में बहुत हुआ तो केवल तबला की शिक्षा दी जाती है. तबला के अलावा एक दो-जगह बांसुरी और एक जेडी विमेंस कॉलेज में सरोद की शिक्षा दी जाती है.”

21 जून को विश्व संगीत दिवस (World Music Day) मनाया जाता है. भारत भी इसे सेलिब्रेट करता है. ऐसे में लोक संस्कृतियों और धुनों से सजे इस देश में क्षेत्रीय कला और कलाकार को जीवित रखने में सरकार को मजबूत कदम उठाने होंगे. छात्रों के सीखने की बेहतर व्यवस्था के साथ ही क्षेत्रीय और जिला स्तर पर संचालित योजनाओं की समीक्षा करनी होंगी. क्या योजनाओं का उचित क्रियान्वयन किया जा रहा है? उसका समुचित लाभ कलाकारों को मिल रहा है. तभी संगीत की मधुरता जीवित रह सकती है.

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