दिव्यांग व्यक्तियों को लेकर कई सरकारी योजनाएं, धरातल पर सब हवाहवाई

स्कूल और कॉलेज को दिव्यांग छात्रों के अनुकूल ना बनाए जाने के कारण आज भी सैकड़ों दिव्यांग छात्र अशिक्षा और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं. इसका कारण बहुत ही सामान्य है. आज भी शैक्षणिक परिसरों को दिव्यांगों के अनुकूल नहीं बना सकी है.

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दिव्यांग व्यक्तियों को लेकर कई योजनायें, धरातल पर सब हवाहवाई

दिव्यांग व्यक्तियों को लेकर कई सरकारी योजनाएं

दिव्यांगजनों को रोजगार और शिक्षा में समान अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से आरपीडब्लूडी (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) एक्ट 2016 बनाया गया था. इस एक्ट के तहत सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दिव्यांगों के लिए सीटें आरक्षित की गयीं थी. इस एक्ट के आने से पहले सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों को 3% आरक्षण दिया जाता था लेकिन बाद में उसे बढ़ा कर 4% कर दिया गया.

वहीं शिक्षण संस्थानों में भी दिव्यांगजनों के लिए 5% आरक्षण का प्रावधान किया गया. हालांकि शैक्षणिक संस्थानों में भी अधिनियम केवल कागजों पर पूरे किए जा रहे हैं क्योंकि असलियत में दिव्यांग छात्र कागजी भागदौड़ से परेशान हैं.

कागजी प्रक्रिया ने छुड़वाई पढ़ाई

विक्रम के रहने वाले कृष्णा कुमार सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं और हाथो के सहारे चलते हैं. शारीरिक तौर पर 50% विकलांग कृष्णा इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई किये हुए हैं. फिलहाल, पंचायत सचिव के तौर पर कार्यरत कृष्णा को उच्च स्तर तक की शिक्षा पूरा नहीं कर पाने का मलाल है.

कृष्णा बताते हैं साल 2013 में उन्होंने सोशियोलॉजी विषय में ग्रेजुएशन करने के लिए नामांकन करवाया था. स्नातक प्रथम वर्ष की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन में पास करने के बाद कृष्णा ने सेकंड ईयर की भी परीक्षा दी, लेकिन सेकंड ईयर का रिजल्ट पेंडिंग में चले जाने के कारण कृष्णा आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके.

डेमोक्रेटिक चरखा से बात करते हुए कृष्णा कुमार कहते हैं “मेरा सेकंड ईयर का रिजल्ट पेंडिंग में चला गया था. लेकिन कॉलेज में बात करने पर कहा गया जब थर्ड ईयर का रिजल्ट आएगा तो सेकंड ईयर का रिजल्ट भी क्लियर हो जायेगा. लेकिन जब थर्ड ईयर का रिजल्ट आया तो उसमें मेरा रिजल्ट फिर से रोक दिया गया.”

कृष्णा बताते हैं कि कई बार मगध विश्वविद्यालय और कॉलेज का चक्कर काटकर वे हार गए. आखिर में हारकर उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी. कृष्णा कहते हैं “जितनी बार भी विश्वविद्यालय गया अगली तारीख देकर टाल दिया गया. हारकर मैंने जाना छोड़ दिया और तब से पढ़ाई भी छूट गयी.” 

दिव्यांगों को प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने में काफी बाधाएं आती है. छात्र अगर स्कूली शिक्षा के बाद विश्वविद्यालय पहुंच भी जाएं तो वहां मौजूद शिथिल प्रक्रिया उनकी राह मे बाधा बन जाती हैं.

बिहार नेत्रहीन परिषद के अध्यक्ष डॉ नवल किशोर शर्मा कहते हैं कि “बिहार में पिछले 10 सालों से कॉलेज जाने वाले दिव्यांग छात्रों की छात्रवृत्ति बिहार सरकार ने बंद कर दिया है. केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति दी जा रही है अगर कोई दिव्यांग छात्र इन जातियों में नहीं आता है तो क्या उन्हें आर्थिक मदद का लाभ नहीं मिलेगा?”

वहीं नवल किशोर शर्मा बताते हैं राज्य में दृष्टिबाधित छात्रों के लिए पुस्तकालयों की कमी है. छात्र जाकर भी विभिन्न तरह की पुस्तकें नहीं पढ़ पाते हैं. वहीं ब्लाइंड बच्चों के लिखने के लिए आने वाला ब्रेल पेपर भी यहां अन्य राज्यों के मुकाबले काफी महंगा मिलता है, जिसे सामान्य छात्र नहीं खरीद सकते हैं.

समावेशी शिक्षण का कैसे मिलेगा लाभ?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तहत जहां सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षा उपलब्ध कराए जाने की बात कही गई है, वहीं इसका एक अवयव स्कूलों को सामान्य और दिव्यांग छात्रों के अनुकूल बनाए जाने की बात कहता है.

समावेशी शिक्षा के तहत दिव्यांग छात्रों को सामान्य विद्यालय में नामांकन दिए जाने का प्रावधान किया गया है. दिव्यांग छात्र किसी तरह सामान्य विद्यालयों में नामांकन तो ले लेते हैं लेकिन वहां उन्हें पढ़ाने के लिए विशेष शिक्षक ही मौजूद नहीं होते है. सामान्य शिक्षक जिन्हें विशेष छात्रों को पढ़ाने का प्रशिक्षण नहीं है जैसे-तैसे दिव्यांग बच्चों को पढ़ाते हैं.

साल 2022 कि यू-डाइस रिपोर्ट के अनुसार राज्य भर में नेत्रहीन, श्रवण बाधित और मानसिक तौर पर दिव्यांग छात्र-छात्राओं की संख्या 1,22,887 है, जिन्हें पढ़ाने के लिए राज्य भर में मात्र 850 विशेष शिक्षक ही मौजूद हैं. इसका कारण राज्य में साल 2012 से विशेष शिक्षकों की नियुक्ति ना होना.

जबकि साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गाइडलाइन के अनुसार एक से पांचवी कक्षा तक की कक्षा में 10 दिव्यांग बच्चों पर एक शिक्षक होना अनिवार्य है. वहीं छठी से 12वीं तक की कक्षा में 15 दिव्यांग बच्चों पर एक शिक्षक होना अनिवार्य है. लेकिन बिहार में मात्र 2,343 स्कूल ही ऐसे है जहां इस मानक के अनुसार विशेष शिक्षकों की नियुक्ति की गयी है. शेष स्कूलों मे दिव्यांग छात्रों की पढ़ाई अप्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा ही कराई जाती है.

वहीं विशेष शिक्षा परियोजना परिषद के आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच सालों में लगभग पचास हजार दिव्यांग बच्चों का नामांकन राज्य के स्कूलों में हुआ है. 

दिव्यांगों के विकास में कई स्तर पर बाधाएं

दिव्यांगजनों को समाज में आगे बढ़ने के लिए कई तरह की बाधाओं को पार करना पड़ता है. सरकार की दिव्यांगजनों के लिए चलाई जाने वाली समावेशी शिक्षा योजना, सुगम्य भारत योजना, आर्थिक सहयोग योजना और इन जैसी कई योजनाओं का लाभ निचले स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है.

  • पहली बाधा स्कूलों की है- राज्य में दिव्यांग छात्रों के लिए प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा पाना काफी मुश्किल है. राजधानी पटना में दृष्टि बाधित छात्रों के लिए केवल एक स्कूल मौजूद हैं. वहीं छात्राओं के लिए एक भी स्कूल सरकार द्वारा नहीं बनवाया गया है.



  • सुगम्य संसाधनों की कमी- दूसरी बाधा साधनों की है. अगर कोई दिव्यांग छात्र किसी तरह स्कूल में नामांकन ले भी लेता है तो उसे रोजाना के आवागमन में काफी परेशानियां उठानी पड़ती हैं. क्योंकि यात्रा करने के लिए या तो उन्हें अपने निजी वाहनों का उपयोग करना होगा या फिर किसी परिजन का सहयोग लेना पड़ेगा. जिसका कारण सार्वजनिक स्थानों और शहर में एक स्थान से दुसरे स्थान तक पहुंचने के लिए चलने वाले सार्वजनिक वाहन आज भी दिव्यांगों के अनुकूल नहीं हैं. 



  • पेंशन और छात्रवृति की योजना हुई बंद- राज्य सरकार द्वारा दिव्यांग छात्रों को मिलने वाली योजनाओं को लगभग 10 सालों पहले बंद कर दिया गया है. समाज कल्याण विभाग द्वारा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक छात्रों को ही छात्रवृत्ति दिया जा रहा है. वहीं राज्य सरकार द्वारा मिलने वाली पेंशन राशि भी अन्य राज्यों के मुकाबले कम है. बिहार में विकलांग पेंशन योजना के अन्तर्गत 1000 रुपए दिए जाते हैं. जबकि दिल्ली और तमिलनाडु जैसे राज्यों में 2000 से 2500 रुपए दिए जाते हैं.

जातिगत जनगणना में नहीं हुई दिव्यांगों की अलग से गणना

बिहार सरकार राज्य में जातिगत जनगणना कराकर अपनी पीठ थपथपा रही है. सरकार ने खुद को शाबाशी देते हुए इसे पिछड़े और गरीबों के लिए नई नीतियां बनाने में सहायक बताया था. जातिगत जनगणना शुरू होने से पहले ही दिव्यांगजनों के अधिकारों के लिए काम करने वाली विभिन्न संस्थाओं ने अलग दिव्यांग जनगणना किए जाने की मांग की थी, लेकिन जनगणना के दौरान दिव्यांगों की गणना अलग से नहीं की गई.

साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में दिव्यांग व्यक्तियों की संख्या 2.68 करोड़ है. वहीं बिहार में दिव्यांगो की संख्या 23,31,009 है. हालांकि मौजूदा आंकड़े इससे अधिक हैं क्योंकि ये आंकड़े 13 साल पुराने हैं. वहीं बिहार दिव्यांग अधिकार मंच से जुड़े लोगों का दावा है कि बिहार में दिव्यांगों की आबादी लगभग 10% है.

बिहार नेत्रहीन परिषद के महासचिव डॉ नवल किशोर शर्मा कहते हैं “सरकार अगर सच में दिव्यांगों को आगे बढ़ाना चाहती तो दिव्यांगों को जाति से अलग करके देखती. अभी वर्तमान में जो आरक्षण दिया जा रहा है उसका सही लाभ दिव्यांगों तक नहीं पहुंच पा रहा है. क्योंकि सरकार के पास सटीक आंकड़े नहीं हैं. सरकार अगर चाहती तो उसी लागत में दिव्यांगों के नए आंकड़े प्राप्त कर सकती थी."

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