ऑनलाइन दवाओं के खिलाफ क्यों भड़के बिहार के दवा दुकानदार?

20 मई को पटना की दवा मंडियों में बंद शटर सिर्फ एक दिन की हड़ताल की तस्वीर नहीं थे, बल्कि छोटे दवा दुकानदारों की उस बेचैनी का संकेत थे जो ऑनलाइन दवा बिक्री और भारी डिस्काउंट के दौर में अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

पटना की गोविंद मित्रा रोड, जिसे बिहार की सबसे बड़ी दवा मंडियों में गिना जाता है, आम दिनों में सुबह से ही भीड़, आवाजाही और कारोबार से भरी रहती है. लेकिन हड़ताल के दिन यहां दुकानों के शटर नीचे थे. अशोक राजपथ, पीएमसीएच के आसपास और शहर के कई इलाकों में भी दवा दुकानों पर बंदी का असर दिखा. बिहार के कई जिलों में भी दवा दुकानदारों ने ऑनलाइन दवा बिक्री और ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म के खिलाफ विरोध दर्ज कराया.

दवा दुकानदारों का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ कारोबार बचाने की नहीं है, बल्कि दवा जैसी संवेदनशील चीज की बिक्री को लेकर स्पष्ट नियम और जवाबदेही तय करने की भी है.

60 रुपये सस्ती दवा, लेकिन देर से मिले तो फायदा क्या?

पटना के दवा दुकानदार मोहम्मद असलम इस पूरे मुद्दे को आम ग्राहक के अनुभव से जोड़कर समझाते हैं. वह कहते हैं,

“लोग हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि यही दवा ऑनलाइन 40 या 60 रुपये सस्ती मिल रही है. लेकिन वह दवा तुरंत नहीं मिलती. कई बार एक दिन बाद मिलती है. अब अगर किसी मरीज को दवा की जरूरत आज है, तो 40 रुपये बचाकर कल दवा मिलने का क्या फायदा? इसका असर हम जैसे छोटे दुकानदारों पर भी पड़ रहा है.”

असलम की बात दवा बाजार के एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है. पहले ग्राहक दवा की उपलब्धता, भरोसे और तुरंत जरूरत के आधार पर दुकान चुनता था. अब वह मोबाइल पर कीमत की तुलना भी करता है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की छूट ने ग्राहक के व्यवहार को बदला है, लेकिन छोटे दुकानदारों का कहना है कि वे इस तरह की भारी छूट के साथ मुकाबला नहीं कर सकते.

उनके मुताबिक, बड़ी कंपनियां भारी डिस्काउंट देकर बाजार पर पकड़ बना सकती हैं, लेकिन मोहल्ले की छोटी दुकान के पास न उतना पूंजी बल है, न उतनी तकनीकी व्यवस्था.

दवा को सामान्य सामान की तरह नहीं देखा जा सकता

ऑनलाइन दवा बिक्री के पक्ष में एक बड़ा तर्क सुविधा का है. बुजुर्ग मरीजों, घर से बाहर न निकल पाने वाले लोगों और लंबे इलाज से गुजर रहे लोगों के लिए घर बैठे दवा मंगाना आसान विकल्प हो सकता है. कई बार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कीमत भी कम दिखती है.

लेकिन दवा दुकानदारों का तर्क है कि दवा कपड़ा, जूता या मोबाइल की तरह सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं है. दवा गलत हाथों में, गलत मात्रा में या गलत पर्चे पर बेची जाए तो उसका सीधा असर मरीज की सेहत पर पड़ सकता है.

इसीलिए हड़ताल में शामिल संगठनों ने ऑनलाइन दवा बिक्री पर सख्त नियम, फर्जी या दोहराए गए प्रिस्क्रिप्शन पर रोक, प्रतिबंधित दवाओं की निगरानी और नकली दवाओं की सप्लाई रोकने जैसी मांगें उठाईं.

दवा कारोबारियों का कहना है कि जब एक स्थानीय दुकानदार दवा बेचता है, तो वह ग्राहक को पहचानता है, पर्चे को देखता है और कई बार गलत दवा या गलत डोज को लेकर सावधान भी करता है. ऑनलाइन व्यवस्था में यह मानवीय निगरानी कमजोर पड़ सकती है.

छोटे दुकानदारों की चिंता: मुकाबला बराबरी का नहीं है

बिहार के छोटे शहरों और कस्बों में दवा दुकानें सिर्फ कारोबार नहीं करतीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली स्थानीय कड़ी भी होती हैं. कई जगह मरीज डॉक्टर के बाद सबसे पहले दवा दुकानदार के पास ही पहुंचता है. गांव-कस्बों में तो कई बार यही दुकानें मरीजों के लिए तत्काल राहत का साधन होती हैं.

लेकिन अब इन्हीं दुकानदारों को डर है कि ऑनलाइन कंपनियों की भारी छूट और तेज डिलीवरी मॉडल धीरे-धीरे उनके ग्राहक आधार को कमजोर कर देगा.

उनका कहना है कि बड़ी कंपनियां शुरुआती दौर में नुकसान उठाकर भी छूट दे सकती हैं, लेकिन छोटा दुकानदार हर दवा पर सीमित मार्जिन में काम करता है. किराया, स्टाफ, बिजली, लाइसेंस और स्टॉक का खर्च उठाने के बाद उसके पास इतनी गुंजाइश नहीं बचती कि वह 30 से 50 प्रतिशत तक की छूट दे सके.

यही वजह है कि यह हड़ताल सिर्फ ऑनलाइन बिक्री के खिलाफ नहीं, बल्कि उस बाजार मॉडल के खिलाफ भी थी जिसमें बड़ी पूंजी छोटे कारोबारियों को धीरे-धीरे बाहर कर सकती है.

सरकार और नियमों पर भी सवाल

ऑनलाइन दवा बिक्री को लेकर विवाद नया नहीं है. केंद्र सरकार ने ई-फार्मेसी को रेगुलेट करने के लिए पहले ड्राफ्ट नियम लाए थे. कोविड के दौरान घर तक दवा पहुंचाने की अनुमति से भी इस क्षेत्र को बढ़ावा मिला. लेकिन दवा दुकानदारों का कहना है कि अस्थायी छूट और अधूरे नियमों के कारण आज बाजार में भ्रम की स्थिति बनी हुई है.

दुकानदारों की मांग है कि सरकार यह स्पष्ट करे कि ऑनलाइन दवा बिक्री किस नियम के तहत होगी, कौन जिम्मेदार होगा, प्रिस्क्रिप्शन की जांच कैसे होगी और नकली या गलत दवा मिलने पर जवाबदेही किसकी होगी.

दूसरी ओर, सरकार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का पक्ष यह रहा है कि डिजिटल माध्यम मरीजों को सुविधा देता है और लाइसेंसधारी फार्मेसियों के जरिए दवा पहुंचाई जाती है. लेकिन छोटे दुकानदारों का सवाल है कि अगर नियम सभी के लिए समान हैं, तो निगरानी और जिम्मेदारी भी समान रूप से लागू होनी चाहिए.

मरीजों के लिए सुविधा और सुरक्षा, दोनों जरूरी

हड़ताल के दिन कई मरीजों को दवा खरीदने में परेशानी भी हुई. अस्पतालों के पास कुछ फार्मेसी, जन औषधि केंद्र और कुछ वैकल्पिक व्यवस्था खुली रही, लेकिन आम लोगों के लिए बंद दुकानों ने यह दिखाया कि दवा सप्लाई चेन में स्थानीय दुकानों की भूमिका अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है.

यह सवाल भी जरूरी है कि अगर छोटी दवा दुकानें धीरे-धीरे बाजार से बाहर होती हैं, तो क्या हर मरीज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर निर्भर रह पाएगा? क्या हर जगह समय पर डिलीवरी होगी? क्या हर बुजुर्ग या गरीब मरीज ऐप से दवा मंगा पाएगा?

बिहार जैसे राज्य में, जहां स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही कई स्तरों पर दबाव में है, दवा की उपलब्धता सिर्फ बाजार का सवाल नहीं रह जाती. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय रोजगार और मरीज की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन जाता है.

असली सवाल ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन नहीं है

इस पूरे विवाद को केवल ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन की लड़ाई मानना आसान होगा, लेकिन मामला इससे ज्यादा जटिल है. तकनीक को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. ऑनलाइन दवा डिलीवरी कई मरीजों के लिए मददगार भी हो सकती है. लेकिन दवा जैसी संवेदनशील वस्तु के लिए बिना स्पष्ट नियमों, जवाबदेही और समान प्रतिस्पर्धा के बाजार खोल देना छोटे दुकानदारों और मरीजों दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है.

बिहार के दवा दुकानदार यही कह रहे हैं कि वे तकनीक के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि ऐसे मॉडल के खिलाफ हैं जिसमें छूट का फायदा कुछ बड़े प्लेटफॉर्म को मिले और जोखिम छोटे दुकानदारों, मरीजों और स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था पर आ जाए.