ऑटो नहीं, रोज़गार की लड़ाई: पटना में हड़ताल पर क्यों उतरे ऑटो चालक?

पटना में सोमवार की सुबह आम दिनों जैसी भागदौड़ तो दिखी, लेकिन उस भागदौड़ को मंज़िल तक पहुंचाने वाली सबसे जरूरी कड़ी गायब थी—ऑटो और ई-रिक्शा. पटना जंक्शन, डाकबंगला, गांधी मैदान, बोरिंग रोड, पाटलिपुत्र स्टेशन, राजापुर और नेहरू रोड जैसे इलाकों में लोग गाड़ी के इंतज़ार में भटकते दिखे. जिन रास्तों पर हर कुछ मिनट में ऑटो और ई-रिक्शा मिल जाते थे, वहां लोग पैदल चलते, दूसरे साधनों की तलाश करते या महंगे विकल्पों की ओर मजबूर होते नजर आए.

पटना जैसे शहर में ऑटो और ई-रिक्शा सिर्फ परिवहन का साधन नहीं हैं, बल्कि शहर की रोज़मर्रा की जिंदगी की रीढ़ हैं. रेलवे स्टेशन से मोहल्लों तक, कोचिंग हब से घरों तक, अस्पताल से बाजार तक और दफ्तर से कॉलोनियों तक पहुंचने के लिए बड़ी आबादी इन्हीं साधनों पर निर्भर है. इसलिए जब यह व्यवस्था एक दिन के लिए भी रुकती है, तो शहर का बड़ा हिस्सा सीधे प्रभावित होता है.

हड़ताल क्यों हुई?

ऑटो और ई-रिक्शा चालकों की हड़ताल के पीछे कई मांगें हैं. चालकों की मुख्य शिकायत पटना जंक्शन और उससे जुड़े इलाकों में बदली गई यातायात व्यवस्था, स्टैंड की स्थिति, अवैध स्टैंड, सवारी उठाने के नियम और किराया बढ़ोतरी से जुड़ी है. चालक संगठनों का कहना है कि प्रशासन ने ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर जो नए नियम लागू किए हैं, उससे उनकी कमाई और संचालन दोनों प्रभावित हो रहे हैं.

चालक संगठनों की मांग है कि डाकबंगला से पटना जंक्शन तक ऑटो और ई-रिक्शा संचालन को व्यवस्थित किया जाए. स्टेशन गोलंबर से डाकबंगला तक चल रहे कथित अवैध स्टैंड पर कार्रवाई हो और मल्टी-मॉडल हब से जीपीओ गोलंबर तक लगे कथित अनधिकृत ई-रिक्शा स्टैंड को बंद किया जाए. इसके साथ ही सड़क किनारे से सवारी उठाने पर रोक और तय स्टैंड से ही सवारी बैठाने जैसी व्यवस्था को लेकर भी चालकों में नाराज़गी है.

हड़ताल में शामिल ऑटो चालक सुनील बताते हैं कि उनकी मांग सिर्फ किराया बढ़ाने की नहीं है, बल्कि पूरे रूट और स्टैंड की व्यवस्था को लेकर है. वे कहते हैं, “हम लोगों की मांग है कि ऑटो और ई-रिक्शा के लिए तय स्टैंड बनाया जाए. जो अवैध तरीके से सड़क किनारे सवारी उठा रहे हैं, उन पर कार्रवाई हो. अगर नियम बनता है तो वह सब पर बराबर लागू होना चाहिए. ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ लोग नियम मानें और कुछ लोग कहीं से भी सवारी उठा लें.”

चालकों का आरोप है कि नई ट्रैफिक व्यवस्था लागू होने के बाद उनके लिए सवारी लेना मुश्किल हो गया है, जबकि कई जगहों पर बिना किसी नियंत्रण के गाड़ियां अब भी खड़ी हो रही हैं. ऐसे में पंजीकृत और नियमित रूप से चलने वाले चालकों की कमाई प्रभावित हो रही है.

यात्रियों की परेशानी

हड़ताल का सबसे पहला असर उन लोगों पर पड़ा जो सुबह-सुबह अपने काम पर निकलते हैं. पटना में बड़ी संख्या में लोग रोज़ाना ऑटो और ई-रिक्शा से ही ऑफिस, दुकान, कॉलेज, कोचिंग और अस्पताल पहुंचते हैं. सोमवार को ऐसे लोगों को या तो लंबा इंतज़ार करना पड़ा, या फिर पैदल चलना पड़ा. कई लोगों को निजी गाड़ियों, बाइक टैक्सी या अन्य महंगे साधनों का सहारा लेना पड़ा.

पटना जंक्शन जैसे इलाके में समस्या इसलिए भी बड़ी हो जाती है क्योंकि यहां बाहर से आने वाले यात्रियों की संख्या ज्यादा होती है. ट्रेन से उतरने वाला व्यक्ति शहर के हर रास्ते को नहीं जानता. उसके लिए स्टेशन से बाहर निकलते ही पहला सहारा ऑटो या ई-रिक्शा होता है. जब वही नहीं मिला, तो कई यात्री सामान लेकर इधर-उधर भटकते दिखे.

बदले रूट से टूटी कमाई

इस हड़ताल को सिर्फ यात्रियों की परेशानी के तौर पर देखना अधूरा होगा. ऑटो और ई-रिक्शा चालक भी इसी शहर की रोज़ कमाने-खाने वाली आबादी का हिस्सा हैं. ज्यादातर चालक रोज़ की कमाई से घर चलाते हैं. गाड़ी का किराया, लोन की किस्त, ईंधन/CNG का खर्च, मरम्मत, चालान और परिवार का खर्च—इन सबके बीच उनकी कमाई पहले ही सीमित रहती है.

ऑटो चालक पिंटू बताते हैं कि रूट बदलने के बाद उनकी आमदनी पर सीधा असर पड़ा है. उनके मुताबिक, पहले जिस रास्ते पर उन्हें लगातार सवारी मिल जाती थी, अब वहां से गाड़ी चलाना मुश्किल हो गया है. नए रूट और स्टैंड की अस्पष्टता के कारण यात्रियों को भी नहीं पता होता कि ऑटो कहां से मिलेगा और ड्राइवरों को भी खाली गाड़ी लेकर लंबा चक्कर लगाना पड़ता है.

पिंटू कहते हैं, “पहले जंक्शन के आसपास से सवारी आसानी से मिल जाती थी. अब रूट बदलने और स्टैंड को लेकर साफ व्यवस्था नहीं होने से आधा समय खाली घूमने में चला जाता है. रोज की कमाई काफी कम हो गई है. गाड़ी का खर्च, CNG, मेंटेनेंस और घर चलाने का बोझ वही है, लेकिन आमदनी पहले जैसी नहीं रही.”

चालकों का कहना है कि अगर प्रशासन ट्रैफिक सुधारना चाहता है तो चालकों की आमदनी और यात्रियों की सुविधा—दोनों को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनानी होगी. केवल रूट बदल देने से जाम कम हो सकता है, लेकिन अगर उससे ड्राइवर की कमाई टूटे और यात्री को ऑटो न मिले, तो वह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती.

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

पटना में ट्रैफिक सुधार की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता. पटना जंक्शन, डाकबंगला, जीपीओ और गांधी मैदान जैसे इलाकों में जाम, अव्यवस्थित पार्किंग की समस्या पुरानी है. नए ट्रैफिक प्लान और मल्टी-मॉडल हब का उद्देश्य भी इसी अव्यवस्था को कम करना बताया गया था.

लेकिन सवाल यह है कि अगर नई व्यवस्था लागू करने से पहले चालक संगठनों, यात्रियों और स्थानीय लोगों से पर्याप्त संवाद नहीं होता, तो वही व्यवस्था नए विवाद की वजह बन जाती है.

ऐसी स्थिति में केवल चालकों से नियम मानने की उम्मीद करना काफी नहीं है. प्रशासन को भी यह समझना होगा कि शहर की परिवहन व्यवस्था कागज पर नहीं, सड़क पर चलती है. और सड़क पर वही व्यवस्था सफल होती है जिसमें नियम, रोज़गार और आम लोगों की सुविधा—तीनों के बीच संतुलन हो.