विकास रुका, चुनाव दौड़ा: क्यों बिहार अपना ‘निर्माण’ कम कर रहा है?

बिहार में विकास की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे पर खर्च घटाया है, जबकि सब्सिडी पर व्यय बढ़ा है। क्या इसकी कीमत बिहार के युवा व मजदूर चुका रहे हैं?

बिहार में विकास की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे पर खर्च घटाया है, जबकि सब्सिडी पर व्यय बढ़ा है। क्या इसकी कीमत बिहार के युवा व मजदूर चुका रहे हैं?

पटना के कंकड़बाग की एक गली में रहने वाले 28 वर्षीय राजमिस्त्री मुकेश कुमार पिछले दो महीनों से काम की तलाश में हैं। सुबह सात बजे वे मजदूर चौक पर खड़े हो जाते हैं। कभी कोई ठेकेदार आता है, कभी नहीं। जिस शहर में कुछ साल पहले हर तरफ सड़कें खोदी जा रही थीं, पुल बन रहे थे, नाले और सीवरेज लाइनें बिछाई जा रही थीं, वहां अब निर्माण स्थलों की संख्या कम हो गई है। मुकेश कहते हैं, “पहले सड़क का काम चलता था, पुल का काम चलता था, नाला बनता था। अब कई-कई दिन चौक पर खड़े रह जाते हैं। घर में लोग पूछते हैं काम मिला कि नहीं, लेकिन काम कहां है?” मुकेश को शायद यह नहीं मालूम कि उनके हाथों से छिनता काम सिर्फ बाजार की मंदी का परिणाम नहीं है। इसके पीछे सरकार की प्राथमिकताओं में आया एक बड़ा बदलाव भी है।

जब बिहार में सड़क निर्माण पर खर्च घटने की बात होती है, तो इसे केवल इंजीनियरिंग या लोक निर्माण विभाग का मामला समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। बिहार जैसे राज्य में सड़कें विकास की बुनियादी शर्त हैं। राज्य सरकार के आर्थिक आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में बिहार की प्रति व्यक्ति आय लगभग 69,321 रुपये रही, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। कई अध्ययनों ने यह दिखाया है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय लंबे समय से राष्ट्रीय औसत के एक-तिहाई के आसपास बनी हुई है।

यही वह संदर्भ है जिसमें सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे पर होने वाले निवेश को देखना चाहिए। बिहार अभी उस स्थिति में नहीं है जहां वह विकास के इंजन को धीमा कर सके। राज्य की अर्थव्यवस्था में उद्योग क्षेत्र की हिस्सेदारी अभी भी सीमित है, जबकि सेवा क्षेत्र और कृषि पर निर्भरता अधिक है। निवेश आकर्षित करने के लिए बेहतर कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक्स और परिवहन नेटवर्क की आवश्यकता लगातार रेखांकित की जाती रही है।

महालेखाकार के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में सरकार ने पूंजीगत निवेश के लक्ष्य का लगभग 125.43 प्रतिशत उपयोग किया था, लेकिन 2025-26 में यह घटकर लगभग 87.14 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर बुनियादी ढांचे पर खर्च की हिस्सेदारी भी कम हुई। रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में आधारभूत संरचना पर लगभग 38,322 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, जबकि 2025-26 में यह घटकर 36,576 करोड़ रुपये रह गया। इसी अवधि में सब्सिडी पर खर्च में लगभग 64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह बदलाव केवल बजटीय पुनर्संतुलन नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं में परिवर्तन का संकेत देता है।

इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि बिहार का आर्थिक इतिहास बताता है कि सड़क निर्माण ने राज्य के कई हिस्सों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2005 के बाद ग्रामीण सड़कों और पुलों के विस्तार से शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच बेहतर हुई। जिन गांवों तक पहले बरसात के मौसम में पहुंचना मुश्किल था, वहां सालभर संपर्क संभव हुआ। सड़क निर्माण ने केवल यात्रा आसान नहीं की, बल्कि स्थानीय बाजारों, कृषि व्यापार और निर्माण क्षेत्र में भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ाईं।

विकास बनाम वितरण की राजनीति

लोकतंत्र में कल्याणकारी योजनाएं आवश्यक हैं। बिहार जैसे राज्य में तो और भी अधिक। लेकिन सवाल यह है कि क्या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार विकास निवेश की कीमत पर होना चाहिए? चुनावी वर्षों में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारतीय राजनीति में लंबे समय से यह प्रवृत्ति देखी गई है कि चुनाव के करीब आते ही सरकारें ऐसे खर्चों को प्राथमिकता देती हैं जिनका लाभ मतदाता तुरंत महसूस कर सके। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, अनुदान और सब्सिडी योजनाओं का प्रभाव तत्काल दिखता है। इसके विपरीत सड़क, पुल, सिंचाई या औद्योगिक परियोजनाओं का राजनीतिक लाभ वर्षों बाद सामने आता है। लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो पूंजीगत व्यय का प्रभाव कहीं अधिक स्थायी होता है।

यदि सरकार किसी परिवार को आर्थिक सहायता देती है, तो वह राहत प्रदान करती है। लेकिन यदि वही सरकार सड़क बनाती है, तो वह रोजगार पैदा करती है, व्यापार बढ़ाती है, निवेश आकर्षित करती है और भविष्य की आर्थिक गतिविधियों के लिए आधार तैयार करती है। यही कारण है कि अर्थशास्त्री पूंजीगत व्यय को विकास का इंजन मानते हैं।

सबसे बड़ा असर रोजगार पर

बिहार में निर्माण क्षेत्र केवल ईंट, सीमेंट और लोहे का कारोबार नहीं है। यह लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत है। सरकारी सड़क परियोजनाओं से लेकर पुल और भवन निर्माण तक, हर परियोजना अपने साथ मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों, छोटे ठेकेदारों और स्थानीय व्यवसायों की पूरी श्रृंखला को जोड़ती है।

पटना के एक छोटे ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “पिछले दो साल में जो छोटे सड़क और भवन निर्माण के टेंडर निकलते थे, उनकी संख्या कम हुई है। बड़े ठेकेदार किसी तरह संभाल लेते हैं, लेकिन छोटे लोगों के लिए काम लगातार कम हो रहा है।”

जब पूंजीगत व्यय घटता है, तो उसका पहला असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ता है। यही कारण है कि कंकड़बाग के मुकेश कुमार की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस व्यापक आर्थिक बदलाव का संकेत है जो सरकारी आंकड़ों में दिखाई दे रहा है। जब विकास परियोजनाएं धीमी पड़ती हैं, तो रोजगार के अवसर भी सीमित होने लगते हैं। और बिहार जैसे राज्य में, जहां रोजगार पहले से ही सबसे बड़ी चुनौती है, यह स्थिति और गंभीर हो जाती है।

आखिर सवाल क्या है?

सवाल यह नहीं है कि गरीबों को सहायता मिलनी चाहिए या नहीं। सवाल यह भी नहीं है कि सरकार को सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चलानी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या बिहार अपने भविष्य में पर्याप्त निवेश कर रहा है?

आज भी बिहार का प्रति व्यक्ति आय स्तर राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है। राज्य की आर्थिक वृद्धि दर कई वर्षों तक राष्ट्रीय औसत से कम रही है। लाखों युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। ऐसे में यदि विकास की गति धीमी पड़ती है, तो यह केवल एक वित्तीय निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के अवसरों से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। हालांकि सरकार का तर्क है कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार समय की आवश्यकता है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि कमजोर वर्गों को राहत देना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है और विकास परियोजनाएं पूरी तरह बंद नहीं की गई हैं।

महालेखाकार की रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सिर्फ यह नहीं बताती कि पैसा कहां खर्च हुआ। वह यह भी बताती है कि सरकार ने किसे प्राथमिकता दी। और बिहार जैसे राज्य में, जहां विकास अभी भी अधूरा एजेंडा है, प्राथमिकताओं का यह बदलाव केवल बजट की कहानी नहीं, बल्कि भविष्य की कहानी भी है।