21,270 करोड़ का स्वास्थ्य बजट, फिर भी इलाज के बिना मौतें: बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में आखिर टूट कहाँ है?

SRS रिपोर्ट, CAG ऑडिट और सरकारी आंकड़े एक साथ पढ़ें तो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर उभरती है

सीतामढ़ी के एक ग्रामीण परिवार ने पिछले साल अपने बीमार बुजुर्ग सदस्य को पहले स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र, फिर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अंततः जिला अस्पताल तक पहुँचाने की कोशिश की। परिवार का कहना था कि प्राथमिक स्तर पर डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे और विशेषज्ञ चिकित्सक तक पहुँचने में घंटों लग गए। ऐसी घटनाएँ बिहार में अपवाद नहीं हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों से समय पर इलाज न मिलने, रेफरल के चक्कर में मरीजों के भटकने और विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपलब्धता की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं।

यही वजह है कि जब बिहार सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में रिकॉर्ड निवेश की बात करती है, तो सवाल केवल अस्पताल भवनों या बजट का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि क्या यह निवेश मरीज तक पहुँच रहा है?

बिहार सरकार ने 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 21,270 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया है। पिछले दो दशकों में राज्य के स्वास्थ्य बजट में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। नए मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं, जिला अस्पतालों को उन्नत किया जा रहा है, PMCH को देश के सबसे बड़े अस्पताल परिसरों में बदलने की परियोजना पर काम चल रहा है और IGIMS जैसे संस्थानों का विस्तार किया जा रहा है। सरकार के अनुसार यह निवेश बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिश है।

लेकिन इसी तस्वीर के समानांतर कुछ ऐसे आंकड़े मौजूद हैं जो इन दावों के बीच एक कठिन सवाल खड़ा करते हैं।

The Times of India, Down To Earth और अन्य मीडिया संस्थानों द्वारा प्रकाशित SRS (Sample Registration System) रिपोर्ट के विश्लेषणों के अनुसार बिहार में बिना पर्याप्त चिकित्सा सहायता वाली मौतों का अनुपात देश में सबसे अधिक बताया गया है। कई रिपोर्टों में यह आंकड़ा 67.8 प्रतिशत तक दर्ज किया गया है। हालांकि इस लेख के प्रकाशन तक SRS की मूल राज्यवार तालिका स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं थी, इसलिए यह आंकड़ा मीडिया रिपोर्टों के आधार पर उद्धृत किया जा रहा है। लेकिन विभिन्न रिपोर्टों में बिहार को इस श्रेणी में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में रखा गया है।

यहीं से यह कहानी शुरू होती है।

क्योंकि यदि एक राज्य स्वास्थ्य पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रहा हो, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार कर रहा हो और अस्पतालों की संख्या बढ़ा रहा हो, तो फिर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को लेकर इतने गंभीर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

अस्पताल बढ़े, लेकिन क्या इलाज भी बढ़ा?

बिहार में स्वास्थ्य क्षेत्र पर चर्चा अक्सर इमारतों, परियोजनाओं और बजट आवंटन तक सीमित रह जाती है। लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का आकलन केवल अस्पतालों की संख्या से नहीं किया जा सकता। एक अस्पताल तब प्रभावी होता है जब वहाँ पर्याप्त डॉक्टर हों, नर्स हों, लैब टेक्नीशियन हों, दवाएँ उपलब्ध हों और मरीज को समय पर उपचार मिल सके।

यहीं बिहार की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।

2024 में जारी CAG (Comptroller and Auditor General) की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में गंभीर मानव संसाधन संकट की ओर संकेत किया। रिपोर्ट के अनुसार अनेक स्वास्थ्य संस्थानों में आवश्यक पद लंबे समय से रिक्त हैं। कई जिलों में लैब टेक्नीशियनों की उपलब्धता बेहद कम पाई गई। रिपोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली कई संरचनात्मक कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। CAG की टिप्पणियाँ इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे किसी राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के निष्कर्ष हैं।

लेकिन संकट की वास्तविक तस्वीर डॉक्टरों की उपलब्धता से सामने आती है।

बिहार में डॉक्टरों की कमी कितनी गंभीर है?

उपलब्ध अध्ययनों और विश्लेषणों के अनुसार बिहार में लगभग 58,144 डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि राज्य की आबादी के हिसाब से करीब 1,24,919 डॉक्टरों की आवश्यकता है। इसका अर्थ है कि बिहार में लगभग 66,775 डॉक्टरों की कमी है।

डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात भी इसी संकट की पुष्टि करता है। बिहार में एक डॉक्टर पर लगभग 2,148 लोगों का भार है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानक एक डॉक्टर पर 1,000 लोगों का है। कुछ स्वतंत्र विश्लेषण इस अनुपात को 1:2600 तक बताते हैं। आंकड़ों में मामूली अंतर हो सकता है, लेकिन निष्कर्ष एक ही है—बिहार में डॉक्टरों की उपलब्धता आवश्यक स्तर से काफी नीचे है।

हालाँकि कहानी का दूसरा पक्ष भी है। राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में भर्ती अभियान तेज किए हैं। 2025-26 के दौरान 2,619 मेडिकल ऑफिसर पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई, 1,224 नए डॉक्टरों की नियुक्ति की गई और 11,389 स्टाफ नर्स पदों पर भर्ती की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई। लेकिन जब आवश्यकता और उपलब्धता के बीच का अंतर 66 हजार से अधिक डॉक्टरों का हो, तो यह समझना कठिन नहीं कि भर्ती प्रयासों के बावजूद संकट क्यों बना हुआ है।

यही वजह है कि स्वास्थ्य बजट और स्वास्थ्य परिणामों के बीच का अंतर अब बिहार की सबसे बड़ी सार्वजनिक नीति चुनौती बनता जा रहा है।

ग्रामीण बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन पटना, गया या मुजफ्फरपुर के बड़े अस्पतालों से नहीं किया जा सकता। राज्य की लगभग 89 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि PMCH कितना बड़ा हो रहा है, बल्कि यह है कि अररिया, कटिहार, बांका, जमुई, पश्चिम चंपारण या किशनगंज के किसी गांव में रहने वाले व्यक्ति को बीमारी के समय डॉक्टर मिलता है या नहीं।

यहीं तस्वीर सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई देती है।

Rural Health Statistics पर आधारित एक अध्ययन के अनुसार बिहार में डॉक्टरों की कमी लगभग 32.7 प्रतिशत है, जबकि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी 87.3 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। इसका अर्थ है कि जिन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और फिजिशियन होने चाहिए, वहाँ बड़ी संख्या में पद खाली हैं। स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना उसकी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएँ होती हैं। यदि मरीज को पहली सीढ़ी पर ही गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल जाए, तो जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों पर दबाव काफी कम हो सकता है।

लेकिन बिहार में अक्सर इसका उल्टा होता है। कई मामलों में मरीज को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, वहाँ से जिला अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई घंटे और कभी-कभी कई दिन निकल जाते हैं। गंभीर बीमारियों, दुर्घटनाओं और प्रसव संबंधी जटिलताओं में यही देरी जानलेवा साबित हो सकती है।

यही कारण है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता को केवल बजट आवंटन से नहीं मापा जा सकता। असली सवाल यह है कि जब किसी मरीज को डॉक्टर की जरूरत हो, तब डॉक्टर उपलब्ध है या नहीं।

जब बीमारी इलाज से पहले गरीबी बन जाती है

बिहार के स्वास्थ्य संकट का दूसरा बड़ा पहलू आर्थिक है। स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता (affordability) एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यदि सरकारी व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी, तो लोग निजी अस्पतालों की ओर जाएंगे। और जब लोग निजी अस्पतालों की ओर जाएंगे, तो बीमारी का बोझ केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी असर डालेगा।

उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार बिहार में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 54.3 प्रतिशत हिस्सा लोगों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। इसे स्वास्थ्य अर्थशास्त्र की भाषा में Out-of-Pocket Expenditure (OOPE) कहा जाता है। तुलना करें तो राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात लगभग 39 प्रतिशत के आसपास है। यानी बिहार में इलाज का आर्थिक बोझ राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।

इसका अर्थ समझना जरूरी है।

यदि किसी गरीब परिवार का सदस्य गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तो उसे केवल बीमारी से नहीं लड़ना पड़ता। उसे अस्पताल का खर्च, दवाइयों का खर्च, जांच का खर्च और कई बार यात्रा का खर्च भी उठाना पड़ता है। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ बड़ी आबादी अब भी सीमित आय पर निर्भर है, बीमारी अक्सर आर्थिक संकट में बदल जाती है।

बिहार हेल्थ डोजियर के आंकड़े इस संकट को और स्पष्ट करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च लगभग 5,390 रुपये है। लेकिन निजी अस्पताल में यही खर्च बढ़कर 18,189 रुपये तक पहुँच जाता है। शहरी क्षेत्रों में निजी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च 26,217 रुपये दर्ज किया गया है। यानी निजी अस्पताल में इलाज का खर्च सरकारी अस्पताल की तुलना में तीन से पाँच गुना अधिक हो सकता है।

फिर भी बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों का सहारा लेते हैं। क्यों? क्योंकि कई बार उनके पास दूसरा विकल्प नहीं होता।

जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं मिलता, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में विशेषज्ञ नहीं होता और जिला अस्पताल में लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है, तब मरीज निजी अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है। यह हमेशा पसंद का निर्णय नहीं होता, बल्कि अक्सर मजबूरी का निर्णय होता है।

बिहार के लोग सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक क्यों नहीं पहुँच रहे?

यदि राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों का उपयोग अपेक्षित स्तर पर क्यों नहीं बढ़ रहा?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक हालिया अध्ययन ने एक दिलचस्प विरोधाभास सामने रखा है। बिहार देश की कुल आबादी का लगभग 9.3 प्रतिशत हिस्सा रखता है, लेकिन Health and Wellness Centres (HWCs) में होने वाले कुल फुटफॉल में उसकी हिस्सेदारी केवल 2.4 प्रतिशत है।

यह अंतर सामान्य नहीं है। यदि आबादी 9 प्रतिशत से अधिक है और उपयोग केवल 2.4 प्रतिशत, तो इसका अर्थ है कि करोड़ों लोग या तो इन सेवाओं तक पहुँच नहीं रहे हैं, या उन्हें इनसे अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है।

CAG रिपोर्ट इस तस्वीर को और स्पष्ट करती है। मार्च 2022 तक बिहार में 7,974 Health and Wellness Centres विकसित किए जाने थे, लेकिन केवल 4,129 केंद्र ही कार्यरत पाए गए। यानी लक्ष्य का लगभग आधा हिस्सा ही पूरा हो पाया था।

यह केवल निर्माण कार्य की धीमी गति का मामला नहीं है। यह सेवा वितरण की क्षमता का सवाल भी है। यदि स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं लेकिन पर्याप्त मानव संसाधन, दवाएँ या सेवाएँ उपलब्ध नहीं हैं, तो उनका प्रभाव सीमित रह जाता है।

यहीं बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है—इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और सेवा वितरण की वास्तविक क्षमता एक ही गति से नहीं बढ़ी है।

PMCH और IGIMS पर इतना दबाव क्यों?

यदि प्राथमिक और जिला स्तर की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम कर रही होती, तो राज्य के कुछ चुनिंदा अस्पतालों पर इतना अधिक दबाव दिखाई नहीं देता।

PMCH, NMCH, DMCH और IGIMS आज केवल अपने शहरों के अस्पताल नहीं रह गए हैं। वे पूरे बिहार के लिए अंतिम उम्मीद के केंद्र बन गए हैं। PMCH में हर साल लाखों मरीज पहुँचते हैं। IGIMS का विस्तार 1,700 बेड से बढ़ाकर 3,400 बेड तक करने की योजना भी इसी बढ़ते दबाव को दर्शाती है।

लेकिन इन परियोजनाओं को केवल उपलब्धि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इनसे एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है। यदि जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभावी हैं, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर मरीज पटना और मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की ओर क्यों जा रहे हैं?क्या बिहार का स्वास्थ्य मॉडल धीरे-धीरे ऐसा मॉडल बन गया है जिसमें प्राथमिक स्तर कमजोर है और पूरा बोझ कुछ बड़े संस्थानों पर आकर टिक जाता है?

यदि ऐसा है, तो अस्पतालों का विस्तार समाधान का केवल एक हिस्सा है। असली समाधान प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने में छिपा है।

सरकार का पक्ष: क्या तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक है?

इस पूरी बहस में एक तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की आलोचना जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह स्वीकार करना भी है कि पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश और विस्तार हुआ है।

राज्य सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 2026-27 में 21,270 करोड़ रुपये से अधिक का बजट रखा है। 10 नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणा की गई है। PMCH को देश के सबसे बड़े अस्पताल परिसरों में बदलने की परियोजना पर काम चल रहा है। IGIMS का विस्तार किया जा रहा है। जिला अस्पतालों को मजबूत करने और स्वास्थ्य ढाँचे को उन्नत करने के लिए कई योजनाएँ लागू की जा रही हैं। राज्य स्वास्थ्य समिति के माध्यम से डॉक्टरों और नर्सों की भर्ती प्रक्रिया भी लगातार चलाई जा रही है।

सरकार का तर्क है कि बिहार को जो स्वास्थ्य व्यवस्था विरासत में मिली थी, वह दशकों से निवेश की कमी और मानव संसाधन संकट से जूझ रही थी। ऐसे में सुधार एक दिन या एक बजट में नहीं हो सकते। मेडिकल कॉलेज बनाना, डॉक्टर तैयार करना, विशेषज्ञों की नियुक्ति करना और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना एक लंबी प्रक्रिया है।

यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

वास्तव में, बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राज्य ने स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाया है। लेकिन यही वह जगह है जहाँ दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या निवेश का लाभ मरीज तक पहुँच रहा है?

क्योंकि लोकतांत्रिक शासन में सफलता का मूल्यांकन केवल खर्च से नहीं, बल्कि परिणाम से होता है।

SDG-3 स्कोर और बिहार की स्थिति

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में तीसरा लक्ष्य “Good Health and Well-being” यानी बेहतर स्वास्थ्य और कल्याण है। CAG रिपोर्ट के अनुसार इस सूचकांक पर बिहार का स्कोर 66 दर्ज किया गया है।

पहली नजर में यह संख्या बहुत खराब नहीं लग सकती। लेकिन जब इसे बिहार की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य को अभी लंबा रास्ता तय करना है। मातृ मृत्यु दर, शिशु स्वास्थ्य, पोषण, विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और ग्रामीण स्वास्थ्य ढाँचे की मजबूती जैसे क्षेत्रों में अब भी गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं।

यानी स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रगति हुई है, लेकिन यह प्रगति अभी उस स्तर तक नहीं पहुँची है जहाँ राज्य अपने नागरिकों को समान और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने का दावा कर सके।

अब बहस बजट से आगे बढ़नी चाहिए

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की कहानी विरोधाभासों की कहानी है। एक तरफ रिकॉर्ड स्वास्थ्य बजट है, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार है, अस्पतालों के नए भवन हैं और स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ता निवेश है। दूसरी तरफ डॉक्टरों की कमी, विशेषज्ञ चिकित्सकों की रिक्तियाँ, निजी अस्पतालों पर निर्भरता, ऊँचा Out-of-Pocket Expenditure और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं।