30 फीट नीचे मौत: पटना के मेनहोल में दम घुटने से हुई मजदूर की मौत सिर्फ

30 फीट गहरे मेनहोल में हुई मजदूर की मौत ने एक बार फिर भारत में सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

30 फीट गहरे मेनहोल में हुई मजदूर की मौत ने एक बार फिर भारत में सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पटना के पॉश इलाके एसकेपुरी में स्थित एन कॉलेज के पास सोमवार की रात एक 30 फीट गहरे मेनहोल में जो हुआ, वह किसी एक मजदूर की मौत की खबर भर नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो एक तरफ स्मार्ट सिटी, अमृत योजना, नमामि गंगे और आधुनिक सीवरेज नेटवर्क पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ सीवर की सफाई के लिए आज भी इंसानों को मौत के कुएं में उतार रहा है।

खबरों के मुताबिक पश्चिम बंगाल के मालदा निवासी मजदूर मोहम्मद सद्दाम सीवरेज लाइन की सफाई के लिए मेनहोल में उतरे थे। कुछ ही मिनटों में जहरीली गैस के प्रभाव से वे बेहोश हो गए। उन्हें बचाने के लिए उनका भाई रमजान नीचे उतरा, लेकिन वह भी गैस की चपेट में आ गया। लगभग ढाई घंटे तक दोनों भाई मेनहोल में फंसे रहे। बाद में रेस्क्यू कर उन्हें बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक सद्दाम की मौत हो चुकी थी और रमजान गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचा दिए गए।

हजारों करोड़ रूपए खर्च करने के बाद भी नहीं रुक रही सीवेज मजदूर की मौत का सिलसिला

यह घटना उस बिहार की राजधानी में हुई है जहां पिछले एक दशक में सीवरेज और ड्रेनेज परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। बिहार अर्बन डेवलपमेंट एजेंसी (BUDA) और बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम (BUIDCo) के आंकड़े बताते हैं कि केवल पटना में सीवरेज नेटवर्क विस्तार, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर पर 6,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं संचालित हो चुकी हैं या निर्माणाधीन हैं। सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं, तब भी एक मजदूर को बिना सुरक्षा उपकरण के 30 फीट गहरे मेनहोल में क्यों उतरना पड़ रहा है?

दरअसल, भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतें कोई नई बात नहीं हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 1993 से लेकर मार्च 2025 तक देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 1,300 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई है। केवल 2019 से 2024 के बीच ही 450 से ज्यादा मजदूरों की मौत ऐसे हादसों में हुई। विशेषज्ञों और सफाई कर्मचारी आंदोलन जैसे संगठनों का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि बड़ी संख्या में मामलों को औपचारिक रूप से दर्ज ही नहीं किया जाता। कई बार मौतों को सामान्य दुर्घटना बताकर फाइल बंद कर दी जाती है।

इन मौतों का सबसे बड़ा कारण सीवर के अंदर बनने वाली जहरीली गैसें हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार सीवर और मेनहोल के भीतर मिथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें जमा हो जाती हैं। इनमें हाइड्रोजन सल्फाइड सबसे खतरनाक मानी जाती है। अमेरिकी Occupational Safety and Health Administration (OSHA) के अनुसार इसकी उच्च मात्रा कुछ ही सेकंड में किसी व्यक्ति को बेहोश कर सकती है और कुछ मिनटों में उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

यही वजह है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में सीवर में किसी व्यक्ति को उतारने से पहले गैस डिटेक्शन, ऑक्सीजन मॉनिटरिंग और वेंटिलेशन अनिवार्य है। भारत में भी नियम यही कहते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर अलग होती है।

लापरवाही या मजदूर के जान की परवाह ही नहीं?

पटना की घटना में सामने आई प्रारंभिक जानकारी बताती है कि मजदूरों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए थे। ऑक्सीजन सपोर्ट, गैस डिटेक्टर और रेस्क्यू सिस्टम की अनुपस्थिति की चर्चा स्थानीय स्तर पर हो रही है। यदि यह सही है तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है। भारत में 2013 का “मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम” स्पष्ट रूप से कहता है कि बिना सुरक्षा उपकरण के किसी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में उतारना अपराध है। इसके बावजूद हर वर्ष ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर कई बार कड़ी टिप्पणी कर चुका है। अक्टूबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि ”सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतें रोकी जा सकने वाली मौतें हैं।” अदालत ने इन्हें केवल दुर्घटना मानने से इनकार करते हुए कहा कि राज्य और संबंधित एजेंसियां इन मौतों के लिए जवाबदेह हैं। अदालत ने मृतकों के परिजनों को कम से कम 30 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था। लेकिन अदालत के आदेश और जमीन की वास्तविकता के बीच की दूरी आज भी उतनी ही बड़ी है जितनी इस मेनहोल की गहराई थी जिसमें सद्दाम और रमजान उतरे थे।

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि आखिर ऐसी परिस्थितियों में काम करने वाले मजदूर कौन हैं? राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग और विभिन्न सामाजिक अध्ययनों से पता चलता है कि सीवर सफाई से जुड़े अधिकांश श्रमिक आर्थिक रूप से बेहद कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। इनमें बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की होती है। पटना की इस घटना में मृतक मजदूर पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का रहने वाला था। बेहतर रोजगार की तलाश में बिहार आया था। वह किसी स्थायी सरकारी नौकरी में नहीं था। वह एक ठेका एजेंसी के लिए काम कर रहा था। भारत के शहरी विकास मॉडल का एक बड़ा हिस्सा ऐसे ही अस्थायी और कम वेतन वाले श्रमिकों पर टिका हुआ है जिनकी सुरक्षा अक्सर लागत कम करने की दौड़ में सबसे पहले गायब हो जाती है।

हर साल हजारों मजदूर सुरक्षा उपकरणों की कमी से जान गंवाते हैं

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कार्यस्थल दुर्घटनाओं में हर साल हजारों मजदूर अपनी जान गंवाते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का अनुमान है कि भारत में हर वर्ष लगभग 48,000 से अधिक लोग कार्यस्थल संबंधी दुर्घटनाओं के कारण मरते हैं। इनमें निर्माण कार्य, खनन, औद्योगिक इकाइयों और सीवर सफाई से जुड़े श्रमिक सबसे अधिक जोखिम में होते हैं। फिर भी सुरक्षा को अक्सर खर्च समझा जाता है, निवेश नहीं।

पटना की घटना में संबंधित एजेंसी पर 2.1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह कार्रवाई निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि जुर्माना और जवाबदेही दो अलग चीजें हैं। यदि किसी एजेंसी की लापरवाही से एक व्यक्ति की जान चली गई है तो केवल आर्थिक दंड पर्याप्त नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी होना चाहिए कि सुरक्षा मानकों का पालन क्यों नहीं हुआ? जिम्मेदार अधिकारियों ने निगरानी क्यों नहीं की? क्या कार्यस्थल सुरक्षा ऑडिट किया गया था? क्या मजदूरों को प्रशिक्षण दिया गया था? क्या गैस की जांच की गई थी? इन सवालों के जवाब के बिना कोई भी जांच अधूरी रहेगी।

इस घटना का एक और पहलू है जिस पर कम चर्चा होती है। भारत सरकार ने 2022 में NAMASTE (National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem) योजना शुरू की थी। इस योजना का उद्देश्य सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को पूरी तरह मशीनीकृत बनाना है। सरकार का दावा है कि हजारों सफाई कर्मियों की पहचान कर उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराई जा रही हैं। लेकिन यदि 2026 में भी राजधानी पटना में मजदूरों को जहरीली गैसों से भरे मेनहोल में उतरना पड़ रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये योजनाएं जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी साबित हुई हैं।

मजदूरों की मौत से क्या हमें कोई फर्क पड़ता है?

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसी घटनाओं का एक पैटर्न बन चुका है। कोई मजदूर सीवर में उतरता है। जहरीली गैस से बेहोश हो जाता है। उसे बचाने के लिए दूसरा मजदूर उतरता है। वह भी फंस जाता है। फिर कुछ घंटों बाद मौत की खबर आती है। मीडिया में चर्चा होती है। जांच बैठती है। मुआवजे की घोषणा होती है। और कुछ महीनों बाद किसी दूसरे शहर में वही कहानी दोहराई जाती है। मानो हमने इन मौतों को सामान्य मान लिया हो।

लेकिन एक परिवार के लिए यह कभी सामान्य नहीं होता। सद्दाम की मौत के साथ शायद उसके घर की आय का सबसे बड़ा स्रोत खत्म हो गया। उसके परिवार के भविष्य पर अनिश्चितता का साया पड़ गया। उसके बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और आने वाले वर्षों की जिंदगी अब एक ऐसे हादसे से प्रभावित होगी जिसे रोका जा सकता था। यही इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है।

पटना के एन कॉलेज के पास बने उस मेनहोल में केवल एक मजदूर नहीं मरा है। वहां हमारी विकास नीतियों की प्राथमिकताएं भी उजागर हुई हैं। हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं के बीच एक ऑक्सीजन सिलेंडर, एक गैस डिटेक्टर और कुछ सुरक्षा उपकरण मजदूरों तक नहीं पहुंच पाए। विकास की चमकदार रिपोर्टों और सरकारी प्रस्तुतियों के पीछे छिपा यह अंधेरा सवाल पूछता है कि आखिर किसके लिए विकास हो रहा है?

जब तक सीवर की सफाई पूरी तरह मशीनीकृत नहीं होती, जब तक ठेका एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं होती, जब तक मजदूर की जान को परियोजना की लागत से अधिक महत्वपूर्ण नहीं माना जाता, तब तक ऐसे मेनहोल सिर्फ गंदगी साफ करने के गड्ढे नहीं रहेंगे। वे भारत के शहरी विकास मॉडल की उन खामियों के प्रतीक बने रहेंगे जहां सबसे नीचे खड़ा आदमी आज भी सबसे ज्यादा जोखिम उठाता है।

और शायद यही इस घटना का सबसे बड़ा सच है—सद्दाम की मौत किसी जहरीली गैस ने नहीं की। उसकी मौत उस व्यवस्था ने की जिसने उसे बिना पर्याप्त सुरक्षा के 30 फीट नीचे उतरने दिया।