दक्षिण भारत में इलाज का खर्च ₹1,357, जबकि बिहार में ₹10,553

रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों का औसत इलाज खर्च मात्र 1,357 रुपये है, जबकि बिहार में यही खर्च बढ़कर 10,553 रुपये तक पहुंच जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों का औसत इलाज खर्च मात्र 1,357 रुपये है, जबकि बिहार में यही खर्च बढ़कर 10,553 रुपये तक पहुंच जाता है।

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) के मेडिसिन वार्ड के बाहर बैठी सुनीता देवी बार-बार अपने मोबाइल की स्क्रीन देख रही थीं। फोन करने के लिए अब शायद कोई बचा नहीं था। पिछले चार दिनों में उन्होंने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और गांव के जान-पहचान वाले लगभग हर व्यक्ति से मदद मांगी थी। उनके पति का इलाज सरकारी अस्पताल में चल रहा था। गांव से निकलते समय उन्हें भरोसा था कि सरकारी अस्पताल में भर्ती होने के बाद कम-से-कम इलाज का खर्च तो नहीं लगेगा। लेकिन अस्पताल में भर्ती होने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें समझ में आ गया कि सरकारी अस्पताल में इलाज और मुफ्त इलाज, दोनों एक ही बात नहीं हैं।

पहले खून की कुछ जांच बाहर से करानी पड़ीं। फिर डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लिखीं जो अस्पताल में उपलब्ध नहीं थीं। अगले दिन एक और पर्ची हाथ में थमा दी गई। चार दिन के भीतर उनके पास मौजूद लगभग पंद्रह हजार रुपये खत्म हो चुके थे। अब इलाज चल रहा था, लेकिन परिवार कर्ज़ में डूबने लगा था।

सुनीता देवी की कहानी बिहार के लाखों परिवारों की कहानी है। यह कहानी किसी एक अस्पताल की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जिसके बारे में आम लोगों को बताया जाता है कि यहां गरीबों का इलाज मुफ्त होता है। लेकिन जब मरीज अस्पताल से बाहर निकलता है, तो उसके हाथ में दवाइयों का बिल, जांच की रसीदें और कई बार कर्ज़ की नई किस्तें होती हैं।

दक्षिण भारत में इलाज का खर्चा 1357 रूपए, जबकि बिहार में 10,553 रूपए

हाल ही में सामने आए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के आंकड़ों ने इस सच्चाई को और स्पष्ट कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों का औसत इलाज खर्च मात्र 1,357 रुपये है, जबकि बिहार में यही खर्च बढ़कर 10,553 रुपये तक पहुंच जाता है। यह आंकड़ा केवल खर्च का अंतर नहीं दिखाता, बल्कि यह बताता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच कितनी बड़ी खाई मौजूद है।

सोचने वाली बात यह है कि बिहार जैसे गरीब राज्य में, जहां बड़ी आबादी आज भी सीमित आय पर निर्भर है, वहां सरकारी अस्पताल में इलाज का खर्च देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में इतना अधिक क्यों है? आखिर ऐसा क्या है जो मरीजों को अस्पताल के भीतर भी अपनी जेब ढीली करने पर मजबूर करता है?

इस सवाल का जवाब अस्पतालों की चमचमाती इमारतों में नहीं, बल्कि वार्डों, दवा काउंटरों और जांच केंद्रों के बीच छिपा हुआ है।

बिहार के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में मरीज को सबसे पहले जिस समस्या का सामना करना पड़ता है, वह है दवाइयों की अनुपलब्धता। अस्पताल में डॉक्टर मौजूद हो सकता है, बेड भी मिल सकता है, लेकिन जब डॉक्टर दवा लिखता है तो अक्सर मरीज को बताया जाता है कि यह दवा अस्पताल में उपलब्ध नहीं है। मरीज या उसके परिजन अस्पताल परिसर के बाहर स्थित मेडिकल दुकानों की ओर दौड़ पड़ते हैं। कई बार एक ही बीमारी के इलाज में हजारों रुपये केवल दवाओं पर खर्च हो जाते हैं।

दूसरी बड़ी समस्या जांच सुविधाओं की है। सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड मशीन है, लेकिन तकनीशियन नहीं। कहीं मशीन खराब है तो कहीं महीनों से रखरखाव नहीं हुआ है। नतीजा यह होता है कि मरीजों को निजी जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है। गरीब आदमी जो सरकारी अस्पताल में पैसे बचाने आता है, वह जांच केंद्रों और मेडिकल दुकानों के बीच चक्कर लगाने लगता है।

अस्पतालों में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों से बातचीत करने पर अक्सर एक वाक्य सुनने को मिलता है—“सरकारी अस्पताल में डॉक्टर तो मुफ्त देखते हैं, बाकी सब बाहर से कराना पड़ता है।” यही वह वाक्य है जो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना को बयान करता है।

दरअसल, स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा अक्सर डॉक्टरों की संख्या या अस्पतालों की संख्या तक सीमित रह जाती है। लेकिन एक मरीज के लिए इलाज केवल डॉक्टर से मिलने का नाम नहीं है। इलाज का मतलब है दवा, जांच, ऑपरेशन, देखभाल और समय पर उपलब्ध सुविधाएं। अगर इनमें से हर चीज के लिए मरीज को बाहर जाना पड़े, तो अस्पताल का मुफ्त होना केवल एक औपचारिक दावा बनकर रह जाता है।

समस्या नयी नहीं, लेकिन अभी भी समाधान से दूर

बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियां नई नहीं हैं। राज्य लंबे समय से डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल कर्मचारियों की कमी से जूझता रहा है। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी कठिन है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की संख्या आवश्यकता से कम है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी अलग समस्या है। ऐसे में मरीज अक्सर जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की ओर भागते हैं, जहां पहले से ही अत्यधिक भीड़ होती है।

भीड़ बढ़ती है तो व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है। व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है तो मरीजों को सेवाएं समय पर नहीं मिलतीं। और जब सेवाएं समय पर नहीं मिलतीं, तो निजी विकल्प सामने आने लगते हैं। यही वह चक्र है जिसमें गरीब मरीज फंस जाता है।

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं का संकट केवल संसाधनों की कमी का संकट नहीं है। यह जवाबदेही का संकट भी है। यदि किसी अस्पताल में लगातार दवाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? यदि जांच मशीन महीनों से खराब पड़ी है, तो जवाबदेह कौन है? यदि मरीजों को बार-बार बाहर भेजा जा रहा है, तो इसकी निगरानी कौन कर रहा है?

इन सवालों के जवाब अक्सर फाइलों में खो जाते हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों की स्थिति इसलिए बेहतर नहीं है कि वहां लोग कम बीमार पड़ते हैं। वहां फर्क यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को लंबे समय तक प्राथमिकता दी गई। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता बेहतर की गई। जांच सुविधाओं का विस्तार किया गया। जिला स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं को खर्च नहीं, निवेश माना गया।

बिहार में भी पिछले वर्षों में स्वास्थ्य ढांचे पर खर्च बढ़ा है। नए अस्पताल बने हैं, मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ी है और कई योजनाएं शुरू हुई हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन निवेशों का असर उस गरीब मरीज तक पहुंच रहा है जो अस्पताल के बाहर बैठकर पैसे जुटाने की कोशिश कर रहा है?

क्योंकि किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का आकलन भवनों की संख्या से नहीं, बल्कि मरीज की जेब पर पड़ने वाले बोझ से किया जाना चाहिए।

मुफ्त इलाज सामाजिक न्याय का सवाल

आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने निश्चित रूप से कई परिवारों को राहत दी है। लाखों लोगों का इलाज इस योजना के तहत हुआ है। लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी बड़ी संख्या में ऐसे खर्च हैं जो मरीजों को अपनी जेब से करने पड़ते हैं। परिवहन, जांच, दवाइयां और कई अन्य खर्च गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते रहते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन लंबे समय से चेतावनी देता रहा है कि स्वास्थ्य पर अत्यधिक निजी खर्च परिवारों को गरीबी की ओर धकेल सकता है। बिहार में यह खतरा केवल सैद्धांतिक नहीं है। यह रोज़ाना हजारों परिवारों की जिंदगी में दिखाई देता है। कोई किसान इलाज के लिए जमीन गिरवी रखता है। कोई मजदूर साहूकार से कर्ज़ लेता है। कोई महिला अपने गहने बेच देती है। बीमारी खत्म हो जाती है, लेकिन उसका आर्थिक असर वर्षों तक बना रहता है।

यही वजह है कि स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों का सवाल नहीं है। यह सामाजिक न्याय का सवाल है। यह उस राज्य की प्राथमिकताओं का सवाल है जो अपने नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन देने का दावा करता है।

आज बिहार के सरकारी अस्पतालों के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा रहता है—”मुफ्त इलाज उपलब्ध है।” लेकिन जब एक गरीब परिवार अस्पताल से लौटते समय कर्ज़दार बन जाता है, तो यह नारा एक कटु व्यंग्य जैसा लगता है।

सरकारी अस्पताल का उद्देश्य गरीब को आर्थिक संकट से बचाना था। लेकिन अगर वही अस्पताल किसी परिवार को कर्ज़, चिंता और असुरक्षा की ओर धकेल दे, तो हमें केवल आंकड़ों पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने की जरूरत है।

क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि बिहार में सरकारी अस्पतालों में इलाज का खर्च 10,553 रुपये क्यों है। असली सवाल यह है कि एक गरीब आदमी आखिर किस भरोसे अस्पताल का दरवाजा खटखटाए, जब इलाज के बाद बीमारी तो चली जाए, लेकिन कर्ज़ उसकी जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन जाए।