खान ग्लोबल स्टडीज आग कांड: कब फायर सेफ्टी को लेकर सजग होंगे संस्थान

खान ग्लोबल स्टडीज की घटना में किसी की जान नहीं गई। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था आग लगने से पहले जागती है, या फिर हर बार पहली चिंगारी का इंतज़ार करती है?

खान ग्लोबल स्टडीज की घटना में किसी की जान नहीं गई। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था आग लगने से पहले जागती है, या फिर हर बार पहली चिंगारी का इंतज़ार करती है?

पटना के मुसल्लहपुर हाट में गुरुवार शाम कुछ मिनटों के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के ग्राउंड फ्लोर पर बिजली के तारों के ज्वाइंट में शॉर्ट सर्किट हुआ और देखते ही देखते धुआँ पूरे परिसर में फैलने लगा। क्लास चल रही थी। सैकड़ों छात्र-छात्राएँ एक साथ बाहर निकलने लगे। संस्थान के कर्मचारियों ने फायर एक्सटिंग्विशर की मदद से शुरुआती आग पर काबू पाने की कोशिश की, जिसके बाद दमकल की टीम मौके पर पहुँची और स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित कर लिया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी छात्र या कर्मचारी की जान नहीं गई। सवाल यह नहीं कि इस बार क्या बच गया, बल्कि यह है कि अगली बार भी क्या किस्मत इतनी ही मेहरबान होगी?

इस घटना को केवल एक शॉर्ट सर्किट मान लेना आसान है। हर शहर में कभी न कभी बिजली के तारों में आग लग जाती है। लेकिन यह घटना ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले मुजफ्फरपुर के एक निजी अस्पताल में आग लगने से कई लोगों की मौत हो चुकी थी। उस हादसे के बाद बिहार सरकार ने अस्पतालों में व्यापक फायर ऑडिट के निर्देश दिए। फिर होटलों का निरीक्षण शुरू हुआ। इसके बाद कोचिंग संस्थानों की बारी आई। खान ग्लोबल स्टडीज़ का निरीक्षण भी इसी अभियान का हिस्सा था। निरीक्षण में फायर अलार्म सिस्टम, फायर पंप, ओवरहेड वाटर टैंक की क्षमता और अन्य अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमियाँ मिलने की बात सामने आई और संस्थान को नोटिस जारी किया गया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कमियाँ थीं या नहीं। सवाल यह है कि क्या इन कमियों का पता किसी हादसे से पहले भी लगाया जा सकता था? और यदि लगाया गया था, तो उनके अनुपालन की निगरानी किस स्तर पर हुई?

पिछले कुछ वर्षों के समाचारों को देखें तो एक पैटर्न बार-बार दिखाई देता है। किसी अस्पताल में आग लगती है, तो अस्पतालों का फायर ऑडिट शुरू हो जाता है। किसी होटल में हादसा होता है, तो होटलों की जांच का अभियान चल पड़ता है। किसी व्यावसायिक इमारत में आग लगती है, तो संबंधित श्रेणी की इमारतों का निरीक्षण शुरू हो जाता है। और कुछ सप्ताह बाद यह पूरी प्रक्रिया धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।

आंकड़े क्यों छुपा रही है सरकार?

इस रिपोर्ट पर काम करते हुए एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया। हमने यह जानने की कोशिश की कि पटना में कुल कितने कोचिंग संस्थानों के पास वैध फायर एनओसी है, पिछले पाँच वर्षों में कितने संस्थानों का फायर ऑडिट हुआ, कितनों को नोटिस जारी किए गए, कितनों ने निर्धारित समय के भीतर कमियाँ दूर कीं और कितने संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की गई। लेकिन इन सवालों का समेकित और सार्वजनिक डेटा उपलब्ध नहीं मिला। यह कहना गलत होगा कि सरकार के पास यह जानकारी नहीं है। लेकिन यह जानकारी आम नागरिकों के लिए व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं है। यही पारदर्शिता का सबसे बड़ा सवाल है। जब हजारों छात्र रोज़ किसी इमारत में पढ़ने जाते हैं, तो क्या उनके अभिभावकों को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह भवन फायर सेफ्टी मानकों का पालन करता है या नहीं?

कानून मौजूद हैं, लेकिन क्या उनका पालन भी हो रहा है?

अगर बिहार में फायर सेफ्टी को लेकर केवल नियमों की कमी होती, तो समस्या को समझना आसान होता। लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। राज्य में Bihar Fire Service Act, 2014 लागू है, जिसके तहत सार्वजनिक और व्यावसायिक भवनों के लिए अग्नि सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी बिहार फायर सर्विस को दी गई है। इसके बाद Bihar Fire Service Rules, 2021 और संशोधित नियमों के जरिए Fire No Objection Certificate (Fire NOC), फायर ऑडिट, निरीक्षण और सुरक्षा मानकों के अनुपालन की प्रक्रिया को और स्पष्ट किया गया।

राज्य सरकार ने Fire NOC और Fire Audit के लिए ऑनलाइन पोर्टल भी विकसित किए हैं, जहाँ आवेदन से लेकर निरीक्षण और स्वीकृति तक की प्रक्रिया डिजिटल रूप से संचालित की जाती है। यानी कागज़ों पर देखें तो बिहार के पास एक ऐसा कानूनी ढाँचा मौजूद है जो किसी भी सार्वजनिक भवन में आग लगने की आशंका को कम करने के लिए पर्याप्त दिखाई देता है।

लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है। यदि कानून मौजूद हैं, नियम मौजूद हैं और निरीक्षण की व्यवस्था भी मौजूद है, तो फिर हर बड़े हादसे के बाद ही व्यापक फायर ऑडिट अभियान क्यों शुरू होते हैं? मुजफ्फरपुर के अस्पताल में आग लगने के बाद अस्पतालों का निरीक्षण शुरू हुआ। उसके बाद होटलों की बारी आई। फिर कोचिंग संस्थानों की जांच शुरू हुई।

दरअसल, फायर सेफ्टी केवल तकनीकी विषय नहीं है। यह सार्वजनिक जवाबदेही का विषय भी है। यदि निरीक्षण होते हैं, तो उनकी रिपोर्ट कितनी सार्वजनिक है? यदि कमियाँ मिलती हैं, तो उनके अनुपालन की निगरानी कैसे होती है? और यदि किसी संस्थान ने निर्धारित समय के भीतर सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया, तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब जितने स्पष्ट होंगे, जनता का भरोसा भी उतना ही मजबूत होगा। लेकिन जब निरीक्षण की प्रक्रिया दिखाई देती है और उसके परिणाम नहीं, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या बिहार का सबसे बड़ा कोचिंग हब वास्तव में सुरक्षित है?

पटना का मुसल्लहपुर हाट केवल एक बाजार नहीं है। पिछले डेढ़ दशक में यह बिहार के सबसे बड़े प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों में बदल चुका है। बीपीएससी, एसएससी, रेलवे, बैंकिंग, यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों छात्र हर दिन इस इलाके में आते हैं। आसपास की गलियों में दर्जनों कोचिंग संस्थान, छात्रावास, पुस्तक दुकानें, पीजी, कैफेटेरिया और छोटी-बड़ी व्यावसायिक इमारतें हैं। सुबह से देर रात तक यह इलाका छात्रों से भरा रहता है। यही वजह है कि यहाँ किसी भी सुरक्षा चूक का असर केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हजारों लोगों की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि मुसल्लहपुर हाट की अधिकांश इमारतें मूल रूप से कोचिंग संस्थानों के लिए निर्मित नहीं थीं। इनमें से कई भवन पहले व्यावसायिक या आवासीय उपयोग के लिए बनाए गए थे और बाद में बढ़ती मांग के साथ उन्हें कोचिंग सेंटरों में परिवर्तित कर दिया गया। समय के साथ कमरों को क्लासरूम में बदला गया, मंजिलें बढ़ाई गईं और प्रतिदिन आने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ती गई। लेकिन क्या इन भवनों की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था भी उसी गति से विकसित हुई? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर केवल किसी भवन के बाहर लगे फायर एक्सटिंग्विशर को देखकर नहीं दिया जा सकता।

National Building Code (NBC) और अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी ऐसे भवन में जहाँ बड़ी संख्या में लोग एक साथ मौजूद रहते हैं, केवल अग्निशमन यंत्र पर्याप्त नहीं होते। सुरक्षित और स्पष्ट आपातकालीन निकास, धुआँ पहचानने वाली प्रणाली, कार्यशील फायर अलार्म, पर्याप्त जल भंडारण, फायर पंप, निर्बाध सीढ़ियाँ, विद्युत प्रणाली का नियमित निरीक्षण और समय-समय पर मॉक ड्रिल जैसी व्यवस्थाएँ भी उतनी ही आवश्यक हैं। इनमें से किसी एक कड़ी की विफलता आपातकाल के समय पूरे सुरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकती है।

क्या केवल आलोचना से पूरी तस्वीर समझी जा सकती है?

इस पूरी बहस में सरकार का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि बिहार सरकार ने फायर सेफ्टी को लेकर कोई कदम नहीं उठाए हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने Fire NOC और Fire Audit की प्रक्रिया को ऑनलाइन किया है। फायर सर्विस से जुड़े नियमों को अद्यतन किया गया है। हाल के अस्पताल हादसे के बाद राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों के व्यापक फायर ऑडिट के निर्देश दिए। इसके बाद होटलों, कोचिंग संस्थानों और अन्य सार्वजनिक भवनों का निरीक्षण अभियान भी चलाया गया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के मामले में भी निरीक्षण के दौरान कमियाँ मिलने पर नोटिस जारी किया गया और निर्धारित समय के भीतर उन्हें दूर करने का निर्देश दिया गया। यह दर्शाता है कि प्रशासन कार्रवाई कर रहा है।

लेकिन यहीं एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा होता है। किसी भी नियामक व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि उसने कितने निरीक्षण किए या कितने नोटिस जारी किए। असली मूल्यांकन इस बात से होता है कि उन निरीक्षणों का परिणाम क्या निकला। कितने संस्थानों ने सुरक्षा संबंधी कमियाँ समय पर दूर कीं? कितनों का दोबारा निरीक्षण हुआ? कितनों के खिलाफ कार्रवाई की गई? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इन प्रयासों से भविष्य में दुर्घटनाओं का जोखिम वास्तव में कम हुआ? जब तक इन सवालों के स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक किसी भी निरीक्षण अभियान की प्रभावशीलता का स्वतंत्र आकलन करना कठिन रहेगा।

पटना के मुसल्लहपुर हाट में इस बार आग कुछ ही मिनटों में बुझ गई। छात्र सुरक्षित बाहर निकल आए। यह राहत की बात है। लेकिन किसी भी व्यवस्था का मूल्यांकन उस दिन से नहीं होता जब सब कुछ ठीक रहा। उसका मूल्यांकन उस तैयारी से होता है जो उस दिन से पहले की गई थी।

खान ग्लोबल स्टडीज़ की घटना में किसी की जान नहीं गई। लेकिन अगर इस घटना के बाद भी बहस केवल शॉर्ट सर्किट तक सीमित रह गई, तो शायद हमने उस सबसे महत्वपूर्ण सवाल को फिर अनदेखा कर दिया होगा, जो हर बड़े हादसे के बाद हमारे सामने खड़ा होता है—क्या हमारी व्यवस्था आग लगने से पहले जागती है, या फिर हर बार पहली चिंगारी का इंतज़ार करती है?