खरीफ सीजन के लिए 37,400 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया था, जिसे बाद में घटाकर 18.89 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया। इसके बावजूद उपलब्धि लगभग 19.95 प्रतिशत तक ही सीमित रही।
हर साल की तरह इस बार भी बिहार के लिए 2026-27 का सालाना एग्रीकल्चर क्रेडिट प्लान तैयार किया गया। आंकड़ा बड़ा है—3.80 लाख करोड़ रुपये। कागज़ पर यह लक्ष्य राज्य के कृषि क्षेत्र को मजबूत करने, किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने का संकेत देता है। लेकिन जब इस लक्ष्य को पिछले वर्षों के प्रदर्शन और जमीनी हकीकत के साथ रखा जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है।
यह कहानी सिर्फ एक लक्ष्य की नहीं है, बल्कि उस अंतर की है जो हर साल “घोषणा” और “वास्तविक वितरण” के बीच बना रहता है।
लक्ष्य बड़ा, उपलब्धि छोटी: आंकड़ों का सीधा सच
2025-26 के एग्रीकल्चर क्रेडिट प्लान में बिहार के लिए 1 लाख 12 हजार करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन दिसंबर तक, यानी वित्तीय वर्ष के लगभग नौ महीने गुजर जाने के बाद, सिर्फ 31,126 करोड़ रुपये का ही कर्ज वितरित किया जा सका। यह कुल लक्ष्य का लगभग 27.79 प्रतिशत है।
अगर इसे और विस्तार से देखें, तो स्थिति और स्पष्ट होती है। खरीफ सीजन के लिए 37,400 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया था, जिसे बाद में घटाकर 18.89 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया। इसके बावजूद उपलब्धि लगभग 19.95 प्रतिशत तक ही सीमित रही। रबी सीजन में 6 हजार करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले 4.33 हजार करोड़ रुपये का वितरण हुआ। डेयरी, पोल्ट्री और फिशरीज जैसे क्षेत्रों में भी लक्ष्य और उपलब्धि के बीच अंतर बना रहा। यह सिर्फ एक साल की कहानी नहीं है, बल्कि एक लगातार दोहराया जाने वाला पैटर्न है, जहां लक्ष्य ऊंचा रखा जाता है लेकिन वितरण उसी अनुपात में नहीं बढ़ता।
समस्या कहां है: बैंकिंग सिस्टम या नीति निर्माण?
जब हर साल लक्ष्य पूरा नहीं होता, तो सवाल सिर्फ “क्यों” का नहीं, बल्कि “कहां” का होता है। पहली नजर बैंकिंग सिस्टम पर जाती है, क्योंकि एग्रीकल्चर क्रेडिट का बड़ा हिस्सा बैंकों के जरिए ही वितरित होता है। लेकिन बैंक किसानों को कर्ज देने में अक्सर सतर्क रहते हैं। इसके पीछे नॉन-परफॉर्मिंग एसेट का डर, दस्तावेज़ी प्रक्रिया की जटिलता और छोटे किसानों की कमजोर क्रेडिट हिस्ट्री जैसे कारण होते हैं।
बिहार की स्थिति इस समस्या को और जटिल बनाती है। यहां अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं। उनके पास जमीन के स्पष्ट कागजात नहीं होते, आय अस्थिर होती है और बैंकिंग सिस्टम से उनका संपर्क भी सीमित रहता है। ऐसे में बैंक जोखिम कम करने के लिए बड़े किसानों या एग्री-बिजनेस को प्राथमिकता देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जो क्रेडिट प्लान किसानों के नाम पर बनता है, उसका बड़ा हिस्सा उन तक पहुंच ही नहीं पाता, जिनके लिए वह बनाया गया होता है।
महिला किसान: फोकस या प्रतीक?
2026-27 के क्रेडिट प्लान में महिला किसानों को विशेष फोकस में रखा गया है। यह कदम पहली नजर में सकारात्मक लगता है, क्योंकि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग है।
बिहार में बड़ी संख्या में महिलाएं खेती से जुड़ी हैं, लेकिन जमीन उनके नाम पर नहीं होती। वे खेत में काम करती हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से “किसान” नहीं मानी जातीं। ऐसे में बैंकिंग सिस्टम उन्हें सीधे कर्ज देने की स्थिति में नहीं होता। यह स्थिति एक विरोधाभास पैदा करती है—नीति में महिला किसान मौजूद हैं, लेकिन सिस्टम में उनकी पहचान नहीं है। जब तक भूमि स्वामित्व, पहचान और बैंकिंग के बीच यह अंतर बना रहेगा, तब तक महिला किसानों पर फोकस सिर्फ कागज़ी पहल बन कर रह जाएगा।
सेक्टर आधारित क्रेडिट: डेयरी, पोल्ट्री और फिशरीज की सीमाएं
क्रेडिट प्लान में कृषि के साथ-साथ डेयरी, पोल्ट्री और फिशरीज जैसे सेक्टरों को भी शामिल किया गया है, ताकि किसानों की आय के वैकल्पिक स्रोत विकसित किए जा सकें। लेकिन इन क्षेत्रों में भी लक्ष्य और उपलब्धि के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
डेयरी क्षेत्र में उपलब्धि लगभग 4.81 प्रतिशत तक सीमित रही, पोल्ट्री में यह करीब 2.71 प्रतिशत और फिशरीज में लगभग 3.61 प्रतिशत रही। ये आंकड़े बताते हैं कि जिन सेक्टरों को भविष्य के रूप में देखा जा रहा है, वहां भी क्रेडिट का प्रवाह बहुत सीमित है। इसका मतलब यह है कि सिर्फ नए सेक्टर जोड़ देने से समस्या हल नहीं होती। जब तक क्रेडिट वितरण की प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी, तब तक ये सेक्टर भी उसी ढांचे में फंस कर रह जाएंगे जिसमें पारंपरिक कृषि पहले से जूझ रही है।
क्रेडिट प्लान बनाम क्रेडिट एक्सेस
सरकार हर साल एक क्रेडिट प्लान बनाती है, जिसमें यह तय किया जाता है कि किस सेक्टर को कितना कर्ज दिया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया “सप्लाई साइड” पर आधारित होती है, यानी बैंक कितनी राशि वितरित करेंगे। लेकिन दूसरी तरफ “डिमांड साइड” भी है, यानी किसान वास्तव में कितना कर्ज लेना चाहते हैं और ले सकते हैं।
इन दोनों के बीच एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। किसान अक्सर बैंक से कर्ज लेने से बचते हैं, क्योंकि प्रक्रिया जटिल होती है, समय अधिक लगता है और गारंटी या दस्तावेज़ की जरूरत होती है। इसके बजाय वे अनौपचारिक स्रोतों, जैसे साहूकारों, का सहारा लेते हैं, जहां ब्याज अधिक होता है लेकिन प्रक्रिया सरल होती है। इस स्थिति में क्रेडिट प्लान तो बनता है, लेकिन वास्तविक क्रेडिट एक्सेस सीमित रह जाता है।
नीति और क्रियान्वयन के बीच दूरी
बिहार सरकार के लिए एग्रीकल्चर क्रेडिट प्लान एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। जब यह प्लान जमीन पर उतरता है, तो कई स्तरों पर अटक जाता है।
बैंक स्तर पर कर्ज स्वीकृति में देरी होती है, जिला स्तर पर समन्वय की कमी रहती है, किसानों तक सही जानकारी नहीं पहुंच पाती और निगरानी तंत्र कमजोर होता है। इन सभी कारणों से लक्ष्य कागज़ तक सीमित रह जाता है और वितरण अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता। यह अंतर सिर्फ प्रशासनिक नहीं है, बल्कि संरचनात्मक भी है।
“फोकस पेपर” की भूमिका: दिशा या औपचारिकता?
नाबार्ड द्वारा जारी “स्टेट फोकस पेपर” एग्रीकल्चर क्रेडिट प्लान का आधार होता है। इसमें विभिन्न सेक्टरों की संभावनाओं और निवेश की जरूरतों का विश्लेषण किया जाता है। सिद्धांत रूप में यह दस्तावेज़ नीति और क्रियान्वयन के बीच पुल का काम कर सकता है।
लेकिन व्यवहार में यह अक्सर एक औपचारिक प्रक्रिया बन कर रह जाता है। इसमें दिए गए सुझाव और विश्लेषण जमीन पर लागू नहीं हो पाते, जिससे इसका प्रभाव सीमित हो जाता है। जब तक इस दस्तावेज़ को नीति निर्माण के साथ-साथ क्रियान्वयन में भी सक्रिय रूप से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इसकी उपयोगिता अधूरी ही रहेगी।
बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था: संरचनात्मक चुनौतियां
एग्रीकल्चर क्रेडिट प्लान को समझने के लिए बिहार की कृषि संरचना को समझना जरूरी है। यहां अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, सिंचाई व्यवस्था असमान है, बाजार तक पहुंच सीमित है और प्राकृतिक जोखिम, जैसे बाढ़ और सूखा, अधिक हैं।
इन परिस्थितियों में केवल कर्ज देना पर्याप्त नहीं है। जब तक किसान को बाजार, तकनीक और जोखिम प्रबंधन का समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक वह कर्ज लेने से भी हिचकेगा। कर्ज तभी उपयोगी होता है, जब वह उत्पादन और आय में बदल सके।
लक्ष्य क्यों बढ़ते हैं?
हर साल एग्रीकल्चर क्रेडिट का लक्ष्य बढ़ाया जाता है। इसका एक कारण यह है कि सरकार कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने का संकेत देना चाहती है। बड़ा लक्ष्य यह दर्शाता है कि कृषि प्राथमिकता में है। लेकिन जब लगातार लक्ष्य पूरे नहीं होते, तो यह प्रक्रिया एक औपचारिकता में बदलने लगती है। आंकड़े बढ़ते हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित रहता है। इस स्थिति में लक्ष्य और वास्तविकता के बीच का अंतर और स्पष्ट हो जाता है।
इस समस्या का समाधान सिर्फ लक्ष्य बढ़ाने में नहीं, बल्कि सिस्टम को मजबूत करने में है। किसानों की पहचान और दस्तावेज़ीकरण को बेहतर करना होगा, ताकि वे बैंकिंग प्रणाली में शामिल हो सकें। कर्ज देने की प्रक्रिया को सरल बनाना होगा, ताकि किसान बिना जटिलताओं के कर्ज ले सकें।
इसके साथ ही, बैंकिंग सिस्टम को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अधिक लचीला बनाना होगा। क्रेडिट को बाजार, तकनीक और जोखिम प्रबंधन से जोड़ना होगा, ताकि कर्ज वास्तविक आर्थिक गतिविधि में बदल सके और किसानों की आय में वृद्धि हो। 3.80 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है। लेकिन पिछले अनुभव यह बताते हैं कि लक्ष्य और उपलब्धि के बीच का अंतर अभी भी बना हुआ है। सवाल यह नहीं है कि लक्ष्य कितना बड़ा है, बल्कि यह है कि क्या इस बार सिस्टम में ऐसा बदलाव होगा, जिससे यह कर्ज वास्तव में किसानों तक पहुंचे। क्योंकि जब तक कर्ज एक आंकड़ा बना रहेगा, तब तक कृषि में वास्तविक बदलाव संभव नहीं होगा।





