गेहूं खरीद का घटता लक्ष्य: बिहार में उत्पादन नहीं, भरोसा कम हो रहा है

गेहूं खरीद का घटता लक्ष्य: बिहार में उत्पादन नहीं, भरोसा कम हो रहा है

बिहार में 1 अप्रैल से सरकारी गेहूं खरीद की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। लेकिन इस बार जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है, वह खरीद की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसका लक्ष्य है। वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने गेहूं खरीद का लक्ष्य घटाकर 1.82 लाख मीट्रिक टन कर दिया है। यह आंकड़ा अपने आप में सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उस दिशा की ओर इशारा करता है, जहां बिहार की कृषि नीति धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।

पिछले साल यही लक्ष्य 2 लाख मीट्रिक टन था। यानी एक साल के भीतर ही लगभग 18 हजार मीट्रिक टन की कमी कर दी गई। इससे पहले भी 2024-25 में लक्ष्य और उपलब्धि के बीच बड़ा अंतर देखा गया था, जब 0.18 लाख मीट्रिक टन की खरीद ही हो सकी थी। यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या सिर्फ लक्ष्य तय करने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है, जो किसान और सरकार के बीच कमजोर होता जा रहा है।

लक्ष्य क्यों घटाया गया: आंकड़ों के पीछे की रणनीति

सरकार द्वारा लक्ष्य घटाने को एक व्यावहारिक कदम के रूप में देखा जा सकता है। जब पिछले वर्षों में तय किए गए लक्ष्य पूरे नहीं हो पाए, तो इस बार लक्ष्य को “वास्तविकता के करीब” लाने की कोशिश की गई है। लेकिन यह निर्णय एक गहरे सवाल को जन्म देता है—क्या सरकार ने अपनी नीति को जमीनी हकीकत के अनुसार बदला है, या फिर यह सिर्फ असफलता को स्वीकार करने का तरीका है?

अगर पिछले वर्षों के आंकड़ों को देखा जाए, तो यह साफ होता है कि बिहार में सरकारी खरीद प्रणाली किसानों के लिए आकर्षक विकल्प नहीं बन पाई है। किसान या तो निजी व्यापारियों को बेचते हैं या स्थानीय बाजार में अपनी फसल निकाल देते हैं। सरकारी खरीद केंद्रों तक उनकी पहुंच सीमित रहती है।

इस स्थिति में लक्ष्य घटाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसके साथ समझौता करने जैसा लगता है।

MSP और बाजार के बीच फंसा किसान

केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जो पिछले साल से 160 रुपये अधिक है। कागज़ पर यह वृद्धि किसानों के लिए राहत की तरह दिखती है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग है। बिहार में अधिकांश किसान MSP पर अपनी फसल बेच ही नहीं पाते। इसके पीछे कई कारण हैं—खरीद केंद्रों की कमी, पंजीकरण की जटिल प्रक्रिया, भुगतान में देरी और स्थानीय स्तर पर बिचौलियों का प्रभाव।

किसान के सामने एक सीधी गणित होती है। अगर वह सरकारी केंद्र पर जाएगा, तो उसे प्रक्रिया पूरी करनी होगी, इंतजार करना होगा और भुगतान का भरोसा रखना होगा। वहीं, स्थानीय व्यापारी उसे तुरंत नकद या कम समय में भुगतान दे देता है, भले ही कीमत MSP से कम हो। इसलिए MSP का बढ़ना तभी मायने रखता है, जब वह किसानों तक वास्तव में पहुंचे।

इस बार गेहूं खरीद के लिए 21 जनवरी से ही ऑनलाइन पंजीकरण शुरू कर दिया गया था। किसानों को dbtagriculture.bihar.gov.in पोर्टल पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन कराना है, जिसके बाद ही वे अपनी फसल सरकारी केंद्रों पर बेच सकते हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए लाई गई है। लेकिन बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट की पहुंच अभी भी सीमित है।

कई किसानों के लिए यह ऑनलाइन प्रक्रिया खुद में एक बाधा बन जाती है। उन्हें या तो साइबर कैफे जाना पड़ता है, या किसी एजेंट की मदद लेनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में समय और पैसा दोनों खर्च होता है। यानी जो सिस्टम सुविधा देने के लिए बनाया गया है, वह कई मामलों में नई जटिलता पैदा कर रहा है।

खरीद की समय सीमा और किसान की मजबूरी

सरकार ने गेहूं खरीद की अंतिम तिथि 15 जून तय की है। यानी किसानों के पास लगभग ढाई महीने का समय होगा अपनी फसल बेचने के लिए। लेकिन यह समय सीमा भी कई बार किसानों के लिए समस्या बन जाती है। कटाई के तुरंत बाद किसानों को पैसे की जरूरत होती है—कर्ज चुकाने के लिए, अगली फसल की तैयारी के लिए या घरेलू खर्च के लिए। अगर सरकारी खरीद केंद्रों पर देरी होती है, या प्रक्रिया लंबी होती है, तो किसान इंतजार नहीं कर पाता। वह अपनी फसल जल्दी बेचने के लिए मजबूर होता है, चाहे उसे कम कीमत ही क्यों न मिले।

इस स्थिति में समय सीमा का निर्धारण तभी प्रभावी होता है, जब पूरी प्रक्रिया तेज और भरोसेमंद हो।

एजेंसियों की भूमिका: PACS और व्यापार मंडल

बिहार में गेहूं खरीद की जिम्मेदारी प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसाइटी (PACS), व्यापार मंडल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से होती है। ये संस्थाएं किसानों और सरकार के बीच पुल का काम करती हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठते रहे हैं। कई जगहों पर PACS सक्रिय नहीं हैं, या उनकी क्षमता सीमित है। व्यापार मंडलों में पारदर्शिता की कमी की शिकायतें सामने आती हैं।

अगर यही संस्थाएं खरीद प्रक्रिया का आधार हैं, तो उनकी क्षमता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। वरना पूरा सिस्टम कागज़ पर ही चलता रहेगा।

उत्पादन बनाम खरीद: बिहार की संरचनात्मक समस्या

बिहार में गेहूं का उत्पादन लगातार हो रहा है, लेकिन सरकारी खरीद उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही है। इसका मतलब यह है कि उत्पादन और खरीद के बीच एक संरचनात्मक अंतर मौजूद है। यह अंतर सिर्फ नीतिगत नहीं है, बल्कि बाजार संरचना से भी जुड़ा है। बिहार में कृषि बाजार काफी हद तक निजी व्यापारियों पर निर्भर है। सरकारी हस्तक्षेप सीमित है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों के बीच हमेशा तालमेल नहीं होता। केंद्र MSP तय करता है, लेकिन खरीद की जिम्मेदारी राज्य और उसकी एजेंसियों पर होती है। अगर राज्य स्तर पर खरीद की व्यवस्था मजबूत नहीं है, तो MSP का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता।बिहार में यही स्थिति दिखाई देती है—जहां MSP घोषित होता है, लेकिन उसकी पहुंच सीमित रहती है।

गेहूं खरीद के लक्ष्य को घटाना एक संकेत हो सकता है कि सरकार अब “यथार्थवादी” लक्ष्य तय करना चाहती है। लेकिन यह भी संभव है कि यह धीरे-धीरे सरकारी खरीद से पीछे हटने की प्रक्रिया का हिस्सा हो। अगर ऐसा है, तो इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा। क्योंकि सरकारी खरीद एक तरह की सुरक्षा होती है, जो बाजार के उतार-चढ़ाव से किसानों को बचाती है। अगर यह सुरक्षा कमजोर होती है, तो किसान पूरी तरह बाजार के भरोसे रह जाएगा।

भरोसे का संकट

इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा पहलू है—भरोसा। किसान को यह भरोसा होना चाहिए कि अगर वह सरकारी सिस्टम में जाएगा, तो उसे सही कीमत, समय पर भुगतान और बिना जटिलता के सेवा मिलेगी। लेकिन जब बार-बार लक्ष्य पूरे नहीं होते, प्रक्रियाएं जटिल होती हैं और भुगतान में देरी होती है, तो यह भरोसा कमजोर होता जाता है। और जब भरोसा खत्म होता है, तो कोई भी नीति जमीन पर असर नहीं डाल पाती।

1.82 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य अपने आप में छोटा या बड़ा नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या यह लक्ष्य पूरा होगा? और अगर होगा, तो क्या यह किसानों के लिए वास्तव में लाभकारी होगा? क्योंकि बिहार में समस्या सिर्फ उत्पादन की नहीं है। समस्या यह है कि किसान अपनी उपज को सही कीमत पर, सही समय पर और सही तरीके से बेच नहीं पा रहा। जब तक यह समस्या हल नहीं होती, तब तक हर साल लक्ष्य बदलेगा, आंकड़े बदलेंगे, लेकिन किसान की स्थिति वही रहेगी। और तब यह सवाल बार-बार उठेगा—क्या सरकार खरीद रही है, या सिर्फ लक्ष्य तय कर रही है?