अगर पानी में फैक्ट्री से कोई केमिकल आ रहा है तो ज़रूर प्रभाव पड़ता है और उसके लिए एक पूरी जांच होनी चाहिए। ये देखना ज़रूरी है कि फैक्ट्री से कौन सा केमिकल युक्त पानी आ रहा है।
बिहार एक ऐसा राज्य है जिसे हम कृषि प्रधान कहते हैं। जहां आज भी लाखों परिवार की अर्थव्यवस्था खेत से शुरू होकर खेत में ही ख़त्म हो जाती है। जहां किसान सिर्फ़ अनाज नहीं उगाते बल्कि उसी से अपने पूरे साल की जीविका, बच्चों की पढ़ाई और बुज़ुर्गों की दवाई का इंतज़ाम करते हैं। लेकिन बिहार कृषि संकट से गुज़र रहा है। खेतों में कभी बोरिंग की कमी, कभी बेमौसम बारिश और कभी समय पर यूरिया नहीं मिलने की वजह से किसानों को लगातार आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
राजधानी पटना के बिहटा में भी किसानों को खेती में समस्या आ रही है। बिहटा के आसपास जब सरकार इंडस्ट्रियल एरिया की शुरूआत हुई, तो उम्मीद थी कि रोज़गार मिलेगा और आर्थिक तरक्की होगी। लेकिन हुआ एकदम उलट, अब फैक्ट्री से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी से फ़सल बर्बाद हो रही है।
क्या है पूरा मामला
बिहटा में कटेश्वर पंचायत के अंतर्गत मदोही गांव में किसानों की फ़सल में आसपास की लगी हुई फैक्ट्री से निकलने वाला दूषित पानी आ रहा है, जो उनकी फ़सल को बर्बाद कर रहा है। यहां आस-पास के गांव वालों की मुख्य जीविका का स्रोत कृषि ही है। लेकिन फैक्ट्री से निकलने वाले इस पानी ने उनको बड़ी अजीब दुविधा में डाल दिया है। किसान अलग परेशान है कि वह क्या करें।
इस मामले पर जब हमने वहां के किसान निराला से बात की तो उन्होंने कहा “पानी में धान गिरा हुआ है। फैक्ट्री का केमिकल वाला पानी सीधे खेत में आ रहा है। धान पक गया है और ऐसे में जब पानी भरा है तो उसमें धान की कटाई कैसे होगी? और अगर पानी सुखेगा नहीं तो फिर गेहूं की बुवाई कैसे होगी?” स्थानीय किसान की इस आवाज़ में गुस्सा भी था और हताशा भी। क्योंकि उनकी ना तो फैक्ट्री प्रबंधन सुन रहा है और ना ही सरकार सुन रही है।

किसानों से बातचीत के दौरान ये भी बात चला कि उन्होंने फैक्ट्री लगाने के लिए अपनी ज़मीन भी दी है। किसानों ने अपनी ज़मीन रोज़गार बढ़ने की उम्मीद में दी थी। किसान सुभाष ने हमें बताया कि उन्होंने लगभग साढ़े चार बीघा ज़मीन फैक्ट्री में दी। लेकिन ना तो उनको ज़मीन के बदले फैक्ट्री में जो रोज़गार का वादा था वह मिला और बाकी की ज़मीन की खेती केमिकल युक्त पानी से बर्बाद हो रही है।
हमसे बात करते हुए उन्होंने बताया कि मेरा लगभग 15 कट्ठा का खेत है जिसमें हर कट्ठा में लगभग बारह हज़ार रूपए का लागत फ़सल के लिए लगा है। लेकिन जैसे हालात में फ़सल डूबी हुई है उसे ₹1 की आमदनी नहीं होने वाली है।
कृषि वैज्ञानिक का क्या कहना है?
इस मामले पर जब हमने कृषि वैज्ञानिकों से बात की तो उन्होंने हमें बताया कि धान की फ़सल को पानी से कोई ख़ास नुकसान नहीं होता है जब तक की उसके बाली का हिस्सा यानी फ़सल का ऊपरी हिस्सा ऊपर की ओर खड़ा हो। लेकिन अगर पानी में फैक्ट्री से कोई केमिकल आ रहा है तो उसे ज़रूर प्रभाव पड़ता है और उसके लिए एक पूरी जांच होनी चाहिए। ये देखना ज़रूरी है कि फैक्ट्री से कौन सा केमिकल युक्त पानी आ रहा है।
दूसरी बात यह की धान की फ़सल बिहार जैसे राज्यों में जहां मुख्य तौर छोटे और मध्यम स्तर के किसान हैं वह लोग फ़सलो की कटाई हार्वेस्टर से नहीं करते बल्कि हाथों से करते हैं। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब खेत में पानी लगा रहेगा तो जो वह धान काटेंगे उन्हें फिर उसी धान को वहीं जमीन में पानी में छोड़ना होगा। इससे धान के सड़ने की संभावना बढ़ जाती है और अगर धान सड़ा नहीं तो धान की बालियों में नमी की मात्रा बढ़ जाती है। अगर कोई उसको मंडी में भी बेचे जाएगा तो उसका दाम काफ़ी कम होगा। कुल मिलाकर किसने की आमदनी भी इससे प्रभावित होती है.

जिला कृषि पदाधिकारी को नहीं है मामले की जानकारी
गांव के पास में ही बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (BIADA) का ऑफ़िस है। यह बिहार सरकार का एक विभाग है जो राज्य में औद्योगिक विकास के लिए काम करता है। लेकिन जब स्थानीय किसान उनके पास अपनी समस्याओं को लेकर गए तो उन्होंने इस पर कोई सुनवाई भी नहीं की।
जब इस मामने पर हमने पटना के जिला कृषि जिला कृषि पदाधिकारी श्री प्रवीण कुमार से बात की उन्होंने हमें बताया कि अभी तक उनके कार्यलय से किसानों ने संपर्क यहीं किया है। उन्हें हमारे माध्यम से मामले की जानकारी है जिसकी वो जांच करेंगे।





