मनरेगा: नाम बदला, नियत बदली और मज़दूरों की ज़िन्दगी भी

यह पहला मौका है जब नरेगा में काम करने की योग्यता मज़दूरी करने की क्षमता से नहीं, बल्कि डिजिटल पहचान से तय होने लगी है।
मनरेगा: नाम बदला, नियत बदली और मज़दूरों की ज़िन्दगी भी

यह पहला मौका है जब नरेगा में काम करने की योग्यता मज़दूरी करने की क्षमता से नहीं, बल्कि डिजिटल पहचान से तय होने लगी है।

मनरेगा कभी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे ताकतवर सामाजिक गारंटी मानी जाती थी। यह सिर्फ़ एक योजना नहीं थी, बल्कि एक संवैधानिक विचार का विस्तार थी कि अगर बाज़ार और अर्थव्यवस्था किसी नागरिक को काम नहीं दे पा रहे हैं, तो राज्य उसकी ज़िम्मेदारी लेगा। 

यह विचार किसी घोषणापत्र से नहीं, बल्कि संसद से निकला था। कानून बना था, अधिकार तय हुआ था और सरकार को बाध्य किया गया था कि वह ग्रामीण भारत को काम दे। लेकिन आज, जब वही मनरेगा अपने अठारहवें वर्ष में खड़ा है, तो सवाल यह नहीं है कि इसका नाम बदला या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या इसका स्वरूप बदल दिया गया है।

सरकारी रिकॉर्ड आज भी इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 कहते हैं। कानून की किताबों में यही नाम दर्ज है। लेकिन ज़मीन पर खड़ा मज़दूर, पंचायत का रोज़गार सेवक, बैंक की लाइन में खड़ा बुज़ुर्ग, और मोबाइल ऐप से जूझता पंचायत सचिव इन सबकी दुनिया में मनरेगा अब वही नहीं रहा, जो कभी था। यह बदलाव किसी एक अधिसूचना से नहीं आया। यह धीरे-धीरे, चुपचाप, तकनीक और प्रशासन के ज़रिये आया है।

क्या काम का अधिकार ख़त्म करने की कवायद शुरू?

मनरेगा की आत्मा ‘काम का अधिकार’ थी। कानून साफ़ कहता था कि अगर कोई ग्रामीण नागरिक काम की मांग करता है और 15 दिनों के भीतर उसे काम नहीं मिलता, तो सरकार को बेरोज़गारी भत्ता देना होगा। यह प्रावधान किसी दया का नहीं, बल्कि अधिकार का था। लेकिन आज काम की मांग दर्ज करना ही एक तकनीकी परीक्षा बन गया है। कई पंचायतों में मांग तभी दर्ज होती है, जब मज़दूर का आधार, बैंक खाता, मोबाइल नंबर और डिजिटल प्रोफ़ाइल पूरी तरह मेल खाते हों। अधिकार अब काग़ज़ पर नहीं, सर्वर पर टिके हुए हैं।

सबसे बड़ा बदलाव आधार-आधारित भुगतान प्रणाली के ज़रिये आया। सरकार ने इसे पारदर्शिता और भ्रष्टाचार रोकने का उपाय बताया। तर्क दिया गया कि इससे फर्जी जॉब कार्ड खत्म होंगे और पैसा सीधे मज़दूर के खाते में जाएगा। कागज़ पर यह सुधार लगता है, लेकिन ज़मीन पर इसका असर बिल्कुल अलग दिखता है। बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में लाखों मज़दूर ऐसे हैं जिनका आधार बैंक खाते से ठीक से लिंक नहीं है। कहीं नाम की वर्तनी अलग है, कहीं जन्मतिथि मेल नहीं खाती, कहीं NPCI मैपिंग अधूरी है। इन तकनीकी खामियों की सज़ा मज़दूर को मिलती है और काम करने के बाद भी मज़दूरी अटक जाती है।

यह पहला मौका है जब मनरेगा में काम करने की योग्यता मज़दूरी करने की क्षमता से नहीं, बल्कि डिजिटल पहचान से तय होने लगी है। जो मज़दूर सबसे गरीब है, जिसके पास स्मार्टफोन नहीं है, जो बैंक और आधार की प्रक्रियाओं से सबसे दूर है वही मज़दूर सबसे पहले सिस्टम से बाहर हो रहा है। सरकार इसे ‘डिजिटल ट्रांज़िशन’ कहती है, लेकिन मज़दूर इसे ‘काम के बदले सज़ा’ के रूप में अनुभव करता है।

इसके साथ ही काम की निगरानी के लिए मोबाइल ऐप आधारित उपस्थिति प्रणाली लागू की गई। अब मज़दूर की हाज़िरी मोबाइल से फोटो खींचकर अपलोड की जाती है। यह व्यवस्था उन इलाकों में लागू की गई जहां नेटवर्क आज भी भरोसेमंद नहीं है। कई पंचायतों में रोज़गार सेवक के पास ख़ुद का स्मार्टफ़ोन नहीं है, या नेटवर्क इतना कमज़ोर है कि फोटो समय पर अपलोड नहीं हो पाती। नतीजा यह होता है कि काम तो हुआ, लेकिन सिस्टम में दर्ज नहीं हुआ। और जो दर्ज नहीं हुआ, वह भुगतान योग्य नहीं माना जाता।

जॉब कार्ड: फर्जी कार्ड के नाम पर ‘डिजिटल सफ़ाई’

मनरेगा की एक और रीढ़ थी जॉब कार्ड। यह सिर्फ़ एक पहचान पत्र नहीं था, बल्कि काम के अधिकार का दस्तावेज़ था। हाल के वर्षों में ‘डेटा क्लीनिंग’ के नाम पर बड़े पैमाने पर जॉब कार्ड हटाए गए। कहा गया कि डुप्लिकेट कार्ड हटाए जा रहे हैं, फर्जी नाम साफ़ किए जा रहे हैं। लेकिन ज़मीनी रिपोर्टें बताती हैं कि इस प्रक्रिया में कई असली मज़दूर भी बाहर हो गए। जिन लोगों ने कुछ महीनों काम नहीं किया, जिनका पलायन हुआ, या जिनकी डिजिटल प्रोफ़ाइल अधूरी थी उनके कार्ड ‘निष्क्रिय’ घोषित कर दिए गए। यह निर्णय अक्सर बिना ग्राम सभा की सहमति के लिया गया।

सहरसा ज़िले की 32 वर्षीय सीता देवी का मामला इससे भी ज़्यादा गंभीर है। उनके पति दिल्ली में निर्माण मज़दूरी करते हैं। गांव में रहकर बच्चों की देखभाल और काम का सहारा सिर्फ़ मनरेगा था। उन्होंने अप्रैल 2024 में सड़क मरम्मत के काम में भाग लिया। 14 दिन काम किया, लेकिन उन्हें बताया गया कि उनका नाम निष्क्रिय जॉब कार्ड की सूची में डाल दिया गया है क्योंकि उन्होंने पिछले साल लगातार काम नहीं किया था। सीता देवी कहती हैं, “हमने काम नहीं किया क्योंकि गांव में काम नहीं खुला। अब उसी का दंड हमें मिल रहा है।”

यह वही जॉब कार्ड डेलेशन ड्राइव है, जिसे सरकार “डेटा क्लीनिंग” कहती है। आधिकारिक पोर्टल के अनुसार 2022 से 2024 के बीच करोड़ों जॉब कार्ड हटाए गए या निष्क्रिय किए गए। इनमें से कितने वास्तव में फर्जी थे और कितने गरीब इसका कोई सार्वजनिक सामाजिक अंकेक्षण उपलब्ध नहीं है। ग्राम सभा, जो पहले ऐसे फैसलों की जगह हुआ करती थी, अब इस प्रक्रिया से लगभग बाहर है।

मनरेगा का असली लोकतांत्रिक औज़ार सामाजिक अंकेक्षण था। ग्राम सभा में काम का हिसाब रखा जाता था, सवाल पूछे जाते थे, गड़बड़ियों पर जवाबदेही तय होती थी। आज सामाजिक अंकेक्षण एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गया है। तकनीकी शब्दावली और ऐप आधारित रिपोर्टिंग ने सवाल पूछने की जगह सीमित कर दी है। जो गड़बड़ी सिस्टम में दर्ज नहीं होती, वह गड़बड़ी मानी ही नहीं जाती।

फंड रिलीज़ की प्रक्रिया भी बदल गई है। पहले राज्यों को काम की मांग और मज़दूरों की आवश्यकता के आधार पर धन मिलता था। अब यह धन डिजिटल प्रदर्शन से जुड़ गया है कितने प्रतिशत मज़दूर ABPS में कवर हुए, कितनी हाज़िरी ऐप से दर्ज हुई, कितना डेटा ‘साफ़’ है। इसका असर यह हुआ कि कई राज्यों में भुगतान में देरी हुई और पंचायतों ने जोखिम से बचने के लिए नए काम खोलना ही बंद कर दिया। यह कोई लिखित आदेश नहीं था, बल्कि सिस्टम का दबाव था।

आधार नहीं तो मज़दूरों को पैसा नहीं

गया ज़िले के मानपुर प्रखंड के एक छोटे से गांव में रहने वाले 48 वर्षीय रामवृक्ष मांझी पिछले बीस सालों से खेतिहर मज़दूर हैं। सूखे के मौसम में मनरेगा उनके लिए सिर्फ़ काम नहीं, बल्कि साल भर के खाने की योजना हुआ करता था। जनवरी 2025 में उन्होंने पंचायत से काम मांगा। तालाब खुदाई का काम मिला, दस दिन तक उन्होंने रोज़ सुबह सात बजे हाज़िरी दी। काम पूरा हुआ, मस्टर रोल भरा गया, फोटो भी ली गई। लेकिन जब मज़दूरी आई, तो उनके खाते में शून्य दिखा। बैंक जाने पर बताया गया कि आधार सीडिंग में गड़बड़ी है। पंचायत ने कहा, “जब तक आधार ठीक नहीं होगा, भुगतान नहीं आएगा।” रामवृक्ष पूछते हैं “काम करते समय आधार क्यों नहीं मांगा गया?”

रामवृक्ष अकेले नहीं हैं। LibTech India और अन्य संगठनों की फील्ड रिपोर्ट्स बताती हैं कि ABPS अनिवार्य होने के बाद देशभर में लाखों मज़दूर ऐसे हैं जिनका काम तो दर्ज है, लेकिन भुगतान नहीं। सरकारी MIS भी यह स्वीकार करता है कि भुगतान की देरी 2023–24 में कई महीनों तक 50 प्रतिशत से ऊपर रही। बिहार जैसे राज्यों में यह देरी और भी अधिक रही, जहाँ बैंकिंग और आधार सीडिंग की समस्याएं संरचनात्मक हैं।

पश्चिम चंपारण के एक पंचायत रोजगार सेवक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि स्थिति इतनी डरावनी है कि अब पंचायतें काम खोलने से पहले दस बार सोचती हैं। “अगर काम खोला और ABPS में भुगतान अटका, तो मज़दूर हमारे पीछे पड़ेंगे। ऊपर से ऑडिट का डर अलग। इसलिए हम पहले कहते हैं आधार, बैंक, मोबाइल सब ठीक कराओ, तब काम मिलेगा।” वे साफ़ कहते हैं कि यह कोई लिखित आदेश नहीं है, लेकिन सिस्टम ऐसा दबाव बनाता है कि काम न खोलना सुरक्षित विकल्प लगता है।

इन बदलावों के बीच सरकार की भाषा भी बदली है। मनरेगा को अब अक्सर ‘आजिविका’, ‘ग्रामीण अर्थव्यवस्था’, ‘विकसित भारत’ जैसे फ्रेम में रखा जाता है। यह भाषा अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब अधिकार आधारित योजना को मिशन-मोड कार्यक्रम की तरह पेश किया जाता है, तो अधिकार का दावा कमजोर पड़ता है। मिशन पूरे किए जा सकते हैं, अधिकार नहीं। मिशन लक्ष्य आधारित होते हैं, अधिकार मांग आधारित।

यह पूरा बदलाव अचानक नहीं हुआ। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, जिसमें तकनीक को समाधान के रूप में पेश किया गया, लेकिन सामाजिक यथार्थ को नज़रअंदाज़ किया गया। मनरेगा की मूल भावना यह थी कि काम मांगने के लिए मज़दूर को न्यूनतम बाधाओं का सामना करना पड़े। आज स्थिति यह है कि काम मांगने से पहले मज़दूर को अपनी डिजिटल पात्रता साबित करनी पड़ती है।

बिहार जैसे राज्य में इसका असर और गहरा है। यहां पलायन सामान्य है, बैंकिंग ढांचा कमज़ोर है, डिजिटल साक्षरता सीमित है। ऐसे में मनरेगा उन लोगों के लिए बना था, जिनके पास कोई और विकल्प नहीं था। लेकिन वही लोग आज सिस्टम के बाहर खड़े हैं। यह विडंबना नहीं, नीति का परिणाम है।

नाम नहीं बल्कि मनरेगा का चरित्र बदला

मनरेगा का नाम बदला नहीं है, यह सच है। लेकिन इसका चरित्र बदल रहा है। अधिकार आधारित ढांचे से तकनीक आधारित फ़िल्टरिंग की ओर यह बदलाव भारत की सामाजिक नीति में एक गहरा संकेत देता है। सवाल यह नहीं है कि तकनीक हो या न हो। सवाल यह है कि क्या तकनीक अधिकार की जगह ले सकती है।

मनरेगा ने कभी ग्रामीण भारत को यह भरोसा दिया था कि संकट के समय राज्य उसके साथ खड़ा होगा। आज वही भरोसा डिजिटल शर्तों के बीच फँसता दिख रहा है। और जब अधिकार धीरे-धीरे शर्त बन जाए, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि भी खोखली हो जाती है।

यह लेख किसी एक सरकार या एक नीति की आलोचना नहीं है। यह उस दिशा की पड़ताल है, जिसमें भारत की सामाजिक सुरक्षा नीतियां जा रही हैं। अगर मनरेगा जैसे कानून को बिना औपचारिक संशोधन के भीतर से बदला जा सकता है, तो सवाल उठता है कि अधिकारों की सुरक्षा कैसे होगी।

महिलाओं पर इसका असर और गहरा है। NFHS और मनरेगा डेटा दिखाते हैं कि मनरेगा में महिला भागीदारी हमेशा 50 प्रतिशत से ऊपर रही है। लेकिन ABPS और मोबाइल आधारित निगरानी ने महिलाओं को सबसे पहले बाहर किया। स्मार्टफोन तक सीमित पहुंच, बैंक जाने की सामाजिक बाधाएँ और डिजिटल प्रक्रियाओं की जटिलता ने उन्हें फिर से घरेलू निर्भरता में धकेल दिया है।

यह सब तब हो रहा है जब मनरेगा का कानूनी ढांचा आज भी वही है। संसद ने इसे बदला नहीं, लेकिन प्रशासन ने इसके संचालन को इस तरह बदला है कि अधिकार अब तकनीक की शर्तों में बंध गया है। सरकार इसे सुधार कहती है, लेकिन मज़दूर के लिए यह एक नई परीक्षा है जिसमें असफ़ल होने का मतलब भूख है।