90 दिन काम की शर्त: गिग वर्कर्स के लिए सुरक्षा या परीक्षा?

90 दिन काम की शर्त: गिग वर्कर्स के लिए सुरक्षा या परीक्षा?

सुबह के पांच बजे हैं। पटना के मीठापुर इलाके में एक किराए के कमरे में रवि कुमार (बदला हुआ नाम) का फोन कंपन करता है। यह अलार्म नहीं है, यह ऐप का नोटिफिकेशन है और अब रवि का काम शुरू हो चुका है। रवि उठते हैं, बिना चाय के, बिना अख़बार के, सीधे फ़ोन खोलते हैं। 

स्क्रीन पर ‘Go Online’ लिखा है। यही उनकी नौकरी का नियुक्ति पत्र है, यही हाज़िरी रजिस्टर, यही बॉस। पिछले चार साल से यही क्रम है। कभी फूड डिलीवरी, कभी ग्रॉसरी, कभी दवा। शहर बदलता रहा, ऐप बदलते रहे, लेकिन अनिश्चितता स्थायी हो गई। और अब सरकार कह रही है कि इस अनिश्चित दुनिया में भी एक शर्त पूरी करनी होगी कि साल में 90 दिन काम। तभी बीमा मिलेगा, तभी पेंशन की बात होगी, तभी सामाजिक सुरक्षा की कतार में नाम आएगा।

रवि की दुनिया में ‘काम’ कोई स्थिर इकाई नहीं है। वह रोज़ उपलब्ध रहते हैं, लेकिन रोज़ काम मिलना उनके हाथ में नहीं। पिछले साल वे 312 दिन ऑनलाइन रहे। उनके फोन में स्क्रीनशॉट हैं। लंबी-लंबी शिफ़्टें, इंतज़ार, बीच-बीच में ऑर्डर। पर उन्हें यह नहीं पता कि इनमें से कितने दिन ‘काम के दिन’ माने जाएंगे। 

कई दिन ऐसे थे जब वे सुबह से शाम तक ऑनलाइन रहे, पर ऑर्डर नहीं मिला। कई दिन ऐसे थे जब ऐप ने अचानक अकाउंट सस्पेंड कर दिया। कभी ‘लो एक्सेप्टेंस रेट’, कभी ‘क्वालिटी इश्यू’  न कोई सुनवाई, न कोई अपील। जब सरकार कहती है कि 90 दिन काम करने पर सुरक्षा मिलेगी, तो वह यह मान लेती है कि काम मज़दूर के नियंत्रण में है। जबकि गिग वर्क की असलियत यह है कि काम का नियंत्रण एल्गोरिदम के पास है, मज़दूर के पास नहीं।

नए नियम गिग वर्कर्स के लिए कितने फ़ायदेमंद?

केंद्र सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए नए ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं। इनमें कहा गया है कि किसी एक एग्रीगेटर के साथ 90 दिन या कई एग्रीगेटर्स के साथ मिलाकर 120 दिन काम करने पर सामाजिक सुरक्षा के लाभ मिलेंगे। काग़ज़ पर यह ऐतिहासिक सुधार लगता है, क्योंकि पहली बार राज्य यह मान रहा है कि ऐप-आधारित काम भी श्रम है। 

लेकिन काग़ज़ और ज़मीन के बीच का फ़ासला यहीं से खुलता है। जिस सेक्टर के लिए यह नियम बना है, उसकी बुनियादी संरचना ही अस्थिरता पर टिकी है। यहां न तो काम की गारंटी है, न आय की स्थिरता, न भविष्य की स्पष्टता। ऐसे में सुरक्षा को भी शर्तों में बांध देना, अस्थिरता को वैध बनाता है।

रवि अकेले नहीं हैं। पटना में ही 41 साल के शकील अहमद (बदला हुआ नाम) अपनी बाइक पर दिन भर शहर नापते हैं। शकील पहले दिल्ली के एक फैक्ट्री में काम करते थे। लॉकडाउन के बाद फैक्ट्री बंद हुई, गिग वर्क शुरू हुआ। कैब ड्राइविंग से लेकर फूड डिलीवरी तक, जो मिला किया। शकील बताते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी समस्या काम की नहीं, काम की निरंतरता की है। 

“तीन हफ्ते काम अच्छा चलता है, फिर इंसेंटिव बदल जाता है। कभी ऐप कहता है आज ज़ोन में डिमांड कम है।” पिछले साल एक सड़क हादसे में शकील के पैर में फ्रैक्चर हुआ। दो महीने काम नहीं कर पाए। अब जब सरकार 90 दिन की शर्त रखती है, तो शकील पूछते हैं, “बीमार होना मेरी गलती थी क्या? एक्सीडेंट होने पर सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, लेकिन यहां तो सुरक्षा पाने के लिए पहले सुरक्षित रहना ज़रूरी है।”

अगर कोई व्यक्ति रोज़ 9-10 घंटे काम के लिए उपलब्ध है, लेकिन सिस्टम उसे काम नहीं देता, तो क्या उसकी मेहनत कम हो जाती है? और अगर वह बीमार पड़ जाए, दुर्घटना हो जाए, या ऐप उसे बाहर कर दे, तो क्या वह 90 दिन की शर्त पूरी न कर पाने के कारण सुरक्षा से बाहर हो जाएगा? 

नया नियम इन सवालों का जवाब नहीं देता। वह सिर्फ़ एक संख्या देता है वो है 90। यह संख्या देखने में तटस्थ लगती है, लेकिन इसके भीतर एक चयन तंत्र छुपा है। जो इस संख्या तक पहुंच पाएगा, वह सिस्टम के भीतर रहेगा। जो नहीं पहुंच पाएगा, वह बाहर।

डेटा भी यही कहानी कहता है। भारत में गिग वर्कर्स की संख्या करोड़ों में आंकी जाती है, लेकिन इनमें से बहुत कम लोग पूरे साल एक ही प्लेटफॉर्म से जुड़े रहते हैं। अधिकांश लोग ऐप बदलते रहते हैं, कई बार बेरोज़गार हो जाते हैं, कई बार तकनीकी या व्यावसायिक कारणों से बाहर कर दिए जाते हैं। 

यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि मॉडल की बुनियादी विशेषता है। ऐसे में 90 दिन की शर्त उस मॉडल को चुनौती नहीं देती, बल्कि उसे और मज़बूत करती है जहां काम अस्थिर है, लेकिन सुरक्षा भी अस्थिर ही रहेगी।

गिग वर्कर्स सामाजिक सुरक्षा की तरफ़ पहला कदम

यह सच है कि इस नियम के कुछ फायदे भी हैं। पहली बार केंद्र सरकार यह स्वीकार कर रही है कि गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत है। पहली बार बीमा, पेंशन और स्वास्थ्य सुरक्षा की बात हो रही है। यह एक वैचारिक बदलाव है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। 

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह बदलाव अधूरा है। क्योंकि इसमें ज़िम्मेदारी मज़दूर पर डाल दी गई है, जबकि नियंत्रण कंपनियों और उनके एल्गोरिदम के पास है। अगर ऐप काम नहीं देता, तो मज़दूर असफल माना जाएगा। अगर एल्गोरिदम रेटिंग गिरा दे, तो 90 दिन का सपना टूट जाएगा।

राज्यों की भूमिका भी यहां सीमित है। कुछ राज्य अपने स्तर पर गिग वर्कर्स के लिए योजनाएं बना रहे हैं, लेकिन केंद्रीय कानून के ढांचे से बाहर वे ज़्यादा नहीं जा सकते। अगर केंद्र ने पात्रता की शर्त सख़्त रखी, तो राज्य भी उसी में बंधे रहेंगे। इसका मतलब यह है कि यह नियम पूरे देश के गिग वर्कर्स की ज़िंदगी को एक जैसी शर्तों में बांध देगा, चाहे उनकी ज़मीनी परिस्थितियां कितनी भी अलग क्यों न हों।

अब नीति बनाम ज़मीन का सवाल सीधा खड़ा होता है। नीति कहती है न्यूनतम काम की शर्त ज़रूरी है। ज़मीन कहती है काम की उपलब्धता मज़दूर के हाथ में नहीं है। नीति कहती है डेटा के बिना सुरक्षा नहीं दी जा सकती। ज़मीन कहती है डेटा का नियंत्रण कंपनियों के पास है, मज़दूर के पास नहीं। नीति कहती है यह पहला कदम है। ज़मीन पूछती है क्या पहला कदम भी उन्हीं के लिए होगा जो पहले से बेहतर स्थिति में हैं?

यहीं नीति और लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है। सामाजिक सुरक्षा का मतलब सिर्फ़ योजना बनाना नहीं होता। उसका मतलब यह होता है कि जो सबसे अनिश्चित है, उसे सबसे पहले सुरक्षित किया जाए। अगर सुरक्षा भी शर्तों में बांध दी जाए, तो वह सुरक्षा नहीं, चयन बन जाती है। और चयन अक्सर उन्हीं के खिलाफ जाता है, जिनके पास चुनने का विकल्प नहीं होता।

यह नियम एक शुरुआत है, लेकिन अगर इसे ज़मीन की सच्चाइयों के साथ नहीं जोड़ा गया, तो यह भी उन तमाम नीतियों की तरह बन जाएगा जो फाइलों में बेहतर दिखती हैं और सड़कों पर फीकी पड़ जाती हैं। गिग वर्कर्स को सुरक्षा चाहिए, परीक्षा नहीं। और अगर नीति यह फर्क नहीं समझ पाती, तो 90 दिन की शर्त 365 दिन की अनिश्चितता में बदल जाएगी।