क्या प्रधानमंत्री Modi के भाषण सोशल मीडिया के मीम्स से प्रभावित हैं?

प्रधानमंत्री ने चुनावी भाषण में मुसलमानों को ज़्यादा बच्चा पैदा करने वाले कहा, घुसपैठिया कहा. लेकिन ये भाषा तो हर रोज़ हम सोशल मीडिया पर देख रहे हैं.

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आमिर अब्बास
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मोदी काका

एक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री

साल 2014 वो वक्त था जब टीवी पर कई रचनात्मक विज्ञापन देखने को मिले. देश को एक चायवाला भा गया. यकीनन भाजपा के नेतृत्व वाली NDA गठबंधन ने जी तोड़ मेहनत की. इसका परिणाम NDA ने साल 2014 लोकसभा चुनाव में 336 सीट दर्ज की. बीजेपी ने 427 सीट में से 282 सीट जीती और 31% वोट बीजेपी को मिला. कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA गठबंधन को ज़बरदस्त नुकसान हुआ और UPA महज़ 59 सीट ही जीत पायी जिसमें से 44 सीट कांग्रेस ने जीती. कांग्रेस को 19.31% वोट हासिल हुए. 

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इस चुनाव के बाद से विपक्ष की ज़रूरत ख़त्म होनी शुरू हो गयी. युवाओं के मन में विपक्ष को बस एक मीम मटेरियल बन कर रह गया. 2015-16 में '4G क्रांति' ने बीजेपी को मज़बूत और विपक्ष को मानसिक रूप से और ख़त्म करने का काम किया. इस '4G क्रांति' में एक चीज़ और प्रचलित हुई- धर्म और जाति के नाम पर मज़ाक और नीचा दिखाने की प्रवृति. 

आज के समय में इन्स्टाग्राम पर चलने वाला हर चौथा रील या यूट्यूब के शॉर्ट्स मुसलमानों को आतंकवादी, ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाले, अपनी ही बहनों से शादी करने वाले और पंक्चर बनाने वालों के तौर पर दिखाया जाता है. 

यही मीम्स किसान आंदोलन के समय किसानों को खालिस्तानी बना रहे थें. यही रील्स ब्राह्मण-राजपूत को आज भी सर्वोच्च दिखाने का काम करते हैं. 

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लेकिन ऐसा नहीं है कि ये रील्स सिर्फ सोशल मीडिया पर ही मौजूद हैं. प्रधानमंत्री के हालिया चुनावी भाषणों से यही लगता है कि उन्होंने ये सभी भाषण रील्स से प्रभावित होकर ही दिए हैं.

'अब्दुल ट्रेनिंग करते हुए' वाले मीम्स क्या आपने देखे हैं?

सोशल मीडिया पर एक मीम-'अब्दुल ट्रेनिंग करता हुआ' आपने देखा है? नहीं तो नीचे देखिये-

आगे और भी मीम्स हैं-

लेकिन इन मीम्स में सिर्फ़ मुसलमान ही टारगेट नहीं किये जा रहे हैं. बल्कि दलितों और पिछड़ों को भी उतना ही टारगेट किया जाता है.

क्या है इन मीम्स का मकसद?

आज के समय में शायद कई इंटेलेक्चुअल समाज के लोग मीम्स की सच्चाई से इंकार कर दें, लेकिन मीम्स हमारे समाज का ही एक आईना है. मीम्स ने हमारे घरों की बात को सोशल मीडिया पर डालना शुरू कर दिया है.

"धूप में निकल कर मेरी शक्ल एकदम चमार जैसी हो गयी है."

"मुस्लिम थोड़ी हैं कि चार ठो बीवी रखें और 10 ठो बच्चा पैदा करें."

हम सभी लोगों ने अपने घरों में ऐसी जातिवादी और धार्मिक कट्टरता-नफ़रत से भरी बातें सुनी ही होंगी. हमारी युवा पीढ़ी ने इसी बात को आत्मसात कर लिया है. अब इन मीम्स के ज़रिये वो अपने बुज़ुर्गों की नफ़रती भाषा को सोशल मीडिया पर बढ़ावा देने लगे हैं. उनका मकसद इन मीम्स के ज़रिये दूसरे समुदाय के लोगों को नीचा दिखा कर अपनी जाति और धर्म को 'गौरवान्वित' महसूस कराना है. 

लेकिन इन मीम्स का प्रधानमंत्री की भाषा से क्या लेना देना है?

प्रधानमंत्री की भाषा और मीम्स की भाषा में कई समानताएं देखी जा सकती हैं. 

  1. ये सच्चाई से कोसो दूर होती हैं.
  2. इनका मकसद समाज में द्वेष फैलाना होता है.
  3. ये दूसरे समुदाय को नीचा दिखाना चाहते हैं.
  4. ये ख़ुद को 'पीड़ित' और 'शोषित' बताते हैं और दिखाना चाहते हैं कि दलितों और अल्पसंख्यक ने इन पर ज़ुल्म किये हैं. मुसलमानों ने संस्कृति तबाह की और दलितों ने नौकरी खा ली.
  5. इनकी आलोचना करो तो पिनक कर अपशब्द बोलने लगेंगे. 

तो क्या प्रधानमंत्री के भाषणों में सच्चाई नहीं है?

प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में कुछ महत्वपूर्ण बयान दिए हैं, जो उनके भाषणों को मीम्स में तब्दील कर देते हैं. 

बयान नंबर 1- "कांग्रेस में मेनिफेस्टो में हमारी बहनों के सोने को लेने की बात कही गयी है. मंगलसूत्र लेने की बात कही गयी है. और ये आपकी संपत्ति किसे देंगे? मुसलमानों को देंगे. घुसपैठियों को देंगे. ज़्यादा बच्चे पैदा करने वालों को देंगे."

सच्चाई नंबर 1- कांग्रेस का मेनिफेस्टो, जिसका नाम न्याय पत्र है, उसमें कहीं भी किसी की संपत्ति मुसलमानों को देने की बात नहीं कही गयी है. यहां तक कि उसमें पिछड़े और दलित समुदाय के आरक्षण को खत्म करके मुसलमानों को देने की बात कहीं भी नहीं की गयी है. अब बात करते हैं मुसलमानों के ज़्यादा बच्चा पैदा करने की. पिछले 20 सालों में, यानी 2005-06 में, मुसलमानों में प्रजनन दर 3.4 का था. साल 2021 में मुसलमानों में प्रजनन दर 2.4 तक पहुंच चुका है. यानी मुसलमानों की आबादी पहले के मुकाबले कम होनी शुरू हुई है. अब प्रधानमंत्री ने जो घुसपैठियों वाली बात कही है, उसमें कोई सिर-पैर नहीं है कि उसको गलत साबित करने के लिए कोई आंकड़ा दिया जाए.

बयान नंबर 2- "इंडी गठबंधन को अपनी वोट बैंक की राजनीति करनी है तो करे, उन्हें मुजरा करना है तो करे. लेकिन मैं ओबीसी और दलितों को अधिकार किसी को देनें नहीं दूंगा."

सच्चाई- मुजरा करने की बात तो इस तरह की है कि इसकी आलोचना करना भी अशोभनीय ही माना जाना चाहिए. प्रधानमंत्री जिस अधिकार को मुसलमानों को देने की बात कह रहे हैं उसमें 1 प्रतिशत की भी सच्चाई नहीं है. इसका कहीं कोई लिखित या मौखिक बयान भी मौजूद नहीं है कि कांग्रेस के किसी नेता या पदाधिकारी ने ऐसी बात कही है. 

झूठ बोलो, बार-बार झूठ बोलो, जितना हो सके उतना झूठ बोलो 

प्रधानमंत्री और NDA के नेता इसी झूठ बोलने के फार्मूला पर चुनाव लड़ रहे हैं. इन्होंने लोगों को डराने और चुनाव जितने के लिए कई काल्पनिक विलेन खड़े कर दिए हैं और असली मुद्दों को छुपा दिया है. 'टुकड़े-टुकड़े गैंग', 'अवार्ड वापसी गैंग', 'लव जिहाद', 'गेम जिहाद', 'वोट जिहाद' और 'पाकिस्तान' जैसे काल्पनिक विलेन को खड़ा किया गया. रोज़गार, गरीबी, भूखमरी, शिक्षा के बजट में कटौती कभी चुनाव में मुद्दे बन ही नहीं पा रहे हैं. 

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