लाल कार्ड है, नाम है लिस्ट में, पर अनाज नहीं मिलता… क्यों?

पटना के बेउर में रहने वाले शंकर साव का गुस्सा फुट पड़ा. हाथ में फटा-पुराना लाल राशन कार्ड था. नाम भी लिस्ट में दर्ज था. लेकिन राशन दुकान से खाली हाथ लौटना उनकी आदत बन चुकी थी. “साहब, नाम है… कार्ड है… लेकिन जब भी जाते हैं, दुकानदार कहता है – अनाज आया ही नहीं,” थकी हुई आवाज़ और निराशा, शायद आज के समय में बिहार की यही सच्चाई बन चुकी है.

यही कहानी केवल शंकर की नहीं, बल्कि बिहार के लाखों गरीब परिवारों की है, जिनके लिए सरकार की तरफ से ‘ग़रीबी रेखा से नीचे (BPL)’ वाले परिवारों के लिए दिए जाने वाले लाल कार्ड जीवन रेखा होते हैं. लेकिन कागज़ पर दर्ज हक़ और ज़मीन पर मिलने वाला हक़ – दोनों में आसमान-जमीन का फ़र्क है.

बिहार की PDS व्यवस्था – कागज़ पर मजबूत, ज़मीन पर खोखली

भारत सरकार की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत हर राज्य को गरीब परिवारों को सब्सिडी वाले दाम पर अनाज देना अनिवार्य है.

  • बिहार में लगभग 8.71 करोड़ लोग (कुल जनसंख्या का 86% से अधिक) PDS के तहत कवर हैं.
  • इनमें 1.68 करोड़ परिवारों के पास राशन कार्ड हैं (NFSA & बिहार खाद्य आपूर्ति विभाग, 2024).
  • हर लाभार्थी को प्रति माह 5 किलो चावल या गेहूं ₹1-3 प्रति किलो की दर से मिलना चाहिए.

वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) एक ऐसा उपकरण है जो देशों में भूख की गंभीरता को मापता है. भारत का स्कोर 27.3 इसे ‘गंभीर’ श्रेणी में रखता है. हालांकि 2023 की तुलना में भारत के स्कोर में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. देश में 13.7% आबादी अल्पपोषित है, 35.5% बच्चे अविकसित हैं, और 18.7% बच्चे कमजोर हैं. बाल मृत्यु दर 2.9% है.

बिहार में स्थिति और भी भयावह है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 के अनुसार, बिहार में 48.3% बच्चे अविकसित, 20.8% बच्चे कमजोर और 43.9% बच्चे कम वजन के हैं. राज्य में 6 महीने से 5 साल तक के 63.5% बच्चों में एनीमिया पाया गया. पटना जिले में 65.4% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. यह स्थिति हमें बताती है कि बिहार के बच्चों का भविष्य उनके वर्तमान की तरह ही अधूरा है.

लेकिन असलियत यह है कि कार्ड होने के बावजूद अनाज नहीं मिलता.

बिहार में कुपोषण का दंश

बिहार में कुपोषण केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है. राज्य में 63.1% गर्भवती महिलाएं और 63.6% सामान्य महिलाएं कुपोषण से जूझ रही हैं. यह स्थिति उन बच्चों को प्रभावित करती है जो इन महिलाओं के गर्भ से जन्म लेते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, पतलेपन वाला कुपोषण सबसे अधिक खतरनाक है. यह स्थिति बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बना देती है, जिससे उनका संपूर्ण विकास बाधित होता है. शिवहर, जहानाबाद और रोहतास जैसे जिलों में कुपोषण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.

राहुल (बदला हुआ नाम) जो 7 साल का छोटा सा बच्चा है पर दुर्भाग्य ऐसा है कि वो गरीब है. खाने पीने के लाले पड़े है जिसके कारण वह कुपोषण से झुझ रहा है. जब हमने राहुल के परिजनों से हमने जब बात की तो उन्होंने बताया कि हम गरीब लोग हैं साहेब. हमारे खाने में पोषण जैसा कुछ नहीं होता क्योंकि हमारे पास खरीदने को पैसे नहीं होते हैं. ऊपर से सरकार के तरफ़ से जो बच्चों के लिए खाने को मिलता है जैसे आंगनबाड़ी में जो खाना मिलता है उससे बच्चे का विकास नहीं हो पाता है. मेरा बेटा काफ़ी कमज़ोर हो गया है. हम सरकार से ये उम्मीद करते हैं कि सरकार इस पर ध्यान देगी.”

भ्रष्टाचार का जाल – ग़रीब को लूटने के कई तरीके

PDS में भ्रष्टाचार कोई नया किस्सा नहीं है. बिहार के कई जिलों में जांच से सामने आया है कि राशन माफिया और डीलर मिलकर गरीबों का हिस्सा डकार जाते हैं।

1. भूतिया लाभार्थी (Ghost Beneficiaries)

  • 2022 की CAG रिपोर्ट ने साफ किया कि बिहार में लाखों फर्जी राशन कार्ड चल रहे हैं.
  • जांच में सामने आया कि एक ही परिवार को दो-दो कार्ड दिए गए, जबकि असली गरीब बाहर रह गए.

2. वजन में कटौती

  • लाभार्थियों को 5 किलो की बजाय 3-4 किलो ही अनाज दिया जाता है.
  • दुकानदार कहते हैं, “ऊपर से कट जाता है, हम क्या करें?”

3. मशीन और नेटवर्क की समस्या

  • बायोमेट्रिक मशीनें फेल हो जाती हैं.
  • इंटरनेट नहीं चलता, तो दुकान बंद कर दी जाती है.
  • गरीब घंटों खड़े रहते हैं लेकिन राशन नहीं मिलता.

4. खुलेआम कालाबाज़ारी

  • सरकार ₹1-3 किलो में अनाज देती है.
  • वही अनाज काला बाज़ार में ₹20-25 किलो बिक जाता है.

आंकड़े बताते हैं – समस्या कितनी गहरी है

  • NITI Aayog (2023) रिपोर्ट: बिहार PDS लीकेज में टॉप स्टेट्स में शामिल है.
  • Bihar Watch & Media Reports (2024): लगभग 15-20% अनाज काला बाज़ार में जाता है.
  • CAG रिपोर्ट 2022: 2 लाख से अधिक फर्जी कार्ड रद्द करने पड़े.

ग़रीब की बेबसी – राशन के लिए लाइन, शिकायत पर धमकी

शिकायत का तंत्र मौजूद है, लेकिन व्यवहार में गरीब डरते हैं.

  • अगर डीलर की शिकायत कर दें तो अगली बार नाम काटने की धमकी मिलती है.
  • कई बार शिकायत सुनने वाले अधिकारी और डीलर की मिलीभगत भी उजागर हुई है.

बिहटा की ललिता देवी कहती हैं –
“राशन लेने जाएं तो डीलर कहता है मशीन खराब है. महीने-दर-महीने यही सुनते हैं. जब पूछो तो कहता है – बहुत बोलोगी तो कार्ड ही कटवा दूंगा.”

सरकार क्या कर रही है?

  • 2022 से बिहार सरकार ने आधार-बेस्ड वितरण सिस्टम लागू किया है.
  • फर्जी कार्ड हटाए गए, लेकिन अब भी 1.5 लाख से ज्यादा शिकायतें लंबित हैं (2024, Food & Consumer Protection Dept.)
  • कई जिलों में SMS अलर्ट सिस्टम शुरू हुआ है – जब गोदाम से दुकान तक अनाज जाता है, तो लाभार्थी को मैसेज आता है.

लेकिन टेक्नोलॉजी की कमजोरी और अधिकारियों की लापरवाही गरीबों की समस्या को खत्म नहीं कर पाई है.

सवाल वही – गरीब भूखा क्यों रहे?

गरीब आदमी के लिए लाल कार्ड सिर्फ कागज़ नहीं, बल्कि जीवन का सहारा है. अगर कार्ड होने के बावजूद अनाज नहीं मिलता तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीब के जीने के अधिकार पर हमला है.

नतीजा – व्यवस्था बनाम इंसान

बिहार की PDS व्यवस्था यह दिखाती है कि कागज़ पर जितनी भी योजनाएं मजबूत हों, ज़मीन पर लागू करने वाले अगर भ्रष्ट हैं, तो गरीब को उसका हक़ कभी नहीं मिलेगा.

शंकर साव और ललिता देवी जैसे लाखों लोग हर महीने यही सवाल पूछते हैं – “लाल कार्ड है, नाम है लिस्ट में, पर अनाज नहीं मिलता… क्यों?”