विक्रम PHC: सरकारी अस्पताल को शिफ़्ट करने से ग्रामीणों में आक्रोश

बिहार जैसे बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति हमेशा चिंता का विषय रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में करीब 1.25 करोड़ लोग हर महीने सरकारी अस्पतालों और PHC पर इलाज के लिए निर्भर रहते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि यहां उपलब्ध संसाधन ज़रूरत के मुकाबले बेहद कम हैं.

प्रत्येक PHC पर है आवश्यकता से 20% अधिक भार

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में जहां एक PHC पर औसतन 30,000 लोगों का बोझ होना चाहिए. वहीं हकीकत में एक PHC पर करीब 36,000 से 40,000 लोग निर्भर हैं. यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि PHC पर भार IPHS की सिफारिश से लगभग 20% अधिक है. ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति और भी गंभीर है — जहां हर छोटी-बड़ी बीमारी, प्रसव, टीकाकरण और आपात स्थिति में PHC ही पहली और कभी-कभी एकमात्र उम्मीद होते हैं. इससे ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और पहुंच की समस्या बढ़ जाती है.

लेकिन सवाल उठता है कि जब यही केंद्र लोगों की पहुंच से दूर कर दिए जाएं, तो आम जनता कहां जाएगी? ग्रामीण भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ़ इलाज की जगह नहीं, बल्कि ज़िंदगी का सहारा होते हैं. छोटे-मोटे बुखार, प्रसव जैसी आपात स्थिति, टीकाकरण या सामान्य इलाज — हर ज़रूरत यहीं पूरी होती है.

विक्रम प्रखंड का यह PHC 1912 से लोगों की सेवा कर रहा है. यह स्थान लोगों के घरों के नज़दीक है, जिसकी वजह से बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे आसानी से पहुंच जाते हैं. अब इसे मुख्यालय से कई किलोमीटर दूर शिफ्ट किए जाने की तैयारी हो रही है. ग्रामीणों का कहना है कि यह फ़ैसला उनकी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करता है.

विक्रम प्रखंड का मामला इस दर्द को साफ़ दिखाता है. एक ऐसा PHC, जो 1912 से लोगों की सेवा कर रहा है, अब गांव से दूर शिफ्ट किया जा रहा है. यह फैसला सिर्फ़ एक इमारत बदलने का नहीं, बल्कि लाखों लोगों की ज़िंदगी और उनके स्वास्थ्य अधिकार पर सीधा असर डालता है.

“बीमारी तो बताकर नहीं आती, अगर अस्पताल ही दूर हो गया तो हम कहां जाएंगे?”

विक्रम प्रखंड के ग्रामीणों की यह चिंता किसी व्यक्तिगत परेशानी की नहीं, बल्कि पूरे समाज की झलक है. सालों से यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) गांव वालों का पहला सहारा रहा है. लेकिन अब जब इसे दूर स्थानांतरित करने की तैयारी हो रही है, तो लोगों को डर है कि कहीं इलाज की उम्मीद ही उनसे न छिन जाए.

क्या है पूरा मामला?

1 अगस्त को ग्रामीणों को सूचना मिली कि जिस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से उन्हें अब तक लाभ मिलता रहा है, उसे वहां से दूर किसी और जगह शिफ्ट किया जा रहा है. इसके बाद से ग्रामीणों में काफी चिंता है. इसी फैसले के विरोध में 24 अगस्त को ग्रामीणों ने स्वास्थ्य केंद्र का घेराव भी किया.

इस मामले में विरोध करने वाले एक प्रदर्शनकारी और स्थानीय निवासी दिलीप कुमार शर्मा ने बताया, “यहां 1912 से अस्पताल बना है. आसपास के दूर-दूर गांवों से लोग इलाज के लिए आते हैं. अब इसे पांच-छह किलोमीटर दूर शिफ्ट किया जा रहा है. अगर PHC यहां से उठाकर दूसरी जगह ले जाएंगे, तो 1,00,000 से ज़्यादा लोग प्रभावित हो जाएंगे… यहां से दूसरा सरकारी अस्पताल 8–10 किलोमीटर दूर है. इस वजह से इमरजेंसी के समय में काफ़ी समस्या होगी.”

आंदोलनकारी दीपक जी ने बताया कि नोटिस लगभग 10–15 दिन पहले दिया गया था और कहा गया है कि इस महीने 31 तारीख तक शिफ्ट कर दिया जाएगा. इसके बाद से लोग काफी नाराज़ हैं.

स्वास्थ्य केंद्र हटने से बढ़ेगा निजी इलाज का बोझ

धरने में शामिल धीरज कुमार ने हमें बताया, “यहां से चार किलोमीटर दूर रात में बच्चा-बच्ची की तबीयत ख़राब हो जाए, तो हम तुरंत PHC पहुंच जाते हैं. यहां सरकारी अस्पताल है, बहुत पुराना है, रात में कुछ भी हो तो इमरजेंसी के लिए गाड़ी उपलब्ध रहती है. बाज़ार है, दवा मिल जाती है. लेकिन जहां इसे ले जाया जा रहा है, वहां 10 किलोमीटर दूर कोई व्यवस्था नहीं है — न बाज़ार, न दवा. ऐसे में ग्रामीण क्यों जाएंगे वहां इलाज कराने? तब हमारे पास सिर्फ़ एक विकल्प बचेगा — प्राइवेट क्लिनिक. लेकिन सब लोग इलाज का खर्च उठा पाएंगे, ऐसा तो नहीं है.”

क्या कहते हैं PHC प्रभारी?

PHC प्रभारी डॉ. जय बोध कुमार ने आश्वासन दिया कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों तक यह बात पहुंचाई जाएगी और जल्द कोई समाधान निकाला जाएगा. स्वास्थ्य मंत्री से भी सिर्फ़ आश्वासन मिला. दीपक जी ने आगे बताया, “कुछ दिन पहले स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे यहाँ आए थे ट्रॉमा सेंटर के शिलान्यास में. तब स्थानीय विधायक ने कहा कि यह PHC यहीं रहने दिया जाए. इस पर मंगल पांडे बोले — ठीक है, यह रहेगा. लेकिन यह बात सिर्फ़ मौखिक आदेश तक ही रह गई. आज तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.”

आगे की राह क्या?

इस सवाल पर पूरे आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे दीपक जी ने कहा, “आज तो हमने सिर्फ़ 4 घंटे तक बैठकर सरकार को अपनी मांग बताई है. लेकिन अगर सरकार ने हमारी नहीं सुनी, तो हम जल्द ही करो या मरो की नीति पर लड़ाई लड़ेंगे और एक बड़ा आंदोलन खड़ा करेंगे.”

विक्रम प्रखंड का यह मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या स्वास्थ्य सेवाओं की योजना बनाते समय आम जनता की ज़रूरतों को दरकिनार किया जा सकता है? बिहार पहले से ही स्वास्थ्य ढांचे के मामले में पिछड़ा है. यहां का हर PHC लाखों लोगों के जीवन से जुड़ा है. अगर इन्हें लोगों की पहुंच से दूर कर दिया जाएगा, तो यह स्वास्थ्य अधिकार की मूल भावना के खिलाफ़ होगा. सरकार को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा सिर्फ़ इमारत और मशीनों का नाम नहीं, बल्कि मरीज़ तक समय पर पहुंचने वाली सुविधा का नाम है. विक्रम प्रखंड के ग्रामीणों की मांग यही है कि अस्पताल उनकी पहुंच में रहे, ताकि इलाज उनकी ज़िंदगी से जुड़ा सहारा बना रहे, बोझ नहीं.

स्वास्थ्य सेवा का अधिकार संविधान की मूल भावना है. जब तक ये सेवाएं ग्रामीणों की पहुंच में नहीं होंगी, तब तक विकास अधूरा रहेगा.