पटना यूनिवर्सिटी: डिजिटल इंडिया के दौर में कब होगा लाइब्रेरी का डिजिटलीकरण

देश के लीडर डिजिटल इंडिया बनाने की बात कह रहे हैं। लेकिन बिहार की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी, की लाइब्रेरी आज तक डिजिटल नहीं हो पायी है। चुनाव के दौरान क्या उच्च शिक्षा एक मुद्दा बनेगा?

देश के लीडर डिजिटल इंडिया बनाने की बात कह रहे हैं। लेकिन बिहार की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी, की लाइब्रेरी आज तक डिजिटल नहीं हो पायी है। चुनाव के दौरान क्या उच्च शिक्षा एक मुद्दा बनेगा?

साल 2024 की शुरुआत में पटना यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दावा किया था — “अब छात्र एक क्लिक में किताब ढूंढ सकेंगे। सेंट्रल लाइब्रेरी पूरी तरह ऑटोमेटेड और मॉडर्न बनेगी।”

इसके लिए करोड़ों रुपये की लागत से पटना यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में नई मशीनें, RFID स्कैनर, ऑटो बुक ड्रॉप सिस्टम और ई-कैटलॉग सॉफ्टवेयर लगाए गए। उद्घाटन के समय कहा गया था कि “यह बिहार की पहली पूरी तरह डिजिटल लाइब्रेरी होगी।” लेकिन सात महीने बाद तस्वीर कुछ और ही कहती है।

लाइब्रेरी में न तो मशीनें चल रही हैं, न सिस्टम। किताबें अब भी पुरानी रैक में बंद हैं और छात्रों को वही पुराने रजिस्टर में नाम ढूंढना पड़ता है।

“किताबें हैं, लेकिन मशीनें बंद हैं” — छात्र

बीए फाइनल ईयर के छात्र हर्ष राज कहते हैं, “हमें बताया गया था कि अब किताबें स्कैन होंगी, मोबाइल से रिज़र्वेशन होगा, लेकिन आज तक न किसी मशीन से किताब मिली और न किसी सिस्टम से। हमें अब भी ‘रजिस्टर देखो, नाम खोजो’ वाले दौर में रहना पड़ रहा है।”

लाइब्रेरी में लगाए गए RFID स्कैनर महीनों से बंद हैं। बुक ड्रॉप बॉक्स में महीनों से धूल जमी है। छात्रों का कहना है कि मशीनें महज़ दिखावे के लिए लगाई गईं। उद्घाटन के कुछ दिन बाद ही तकनीकी स्टाफ की कमी के कारण सब बंद हो गया।

सेंट्रल लाइब्रेरी में लगी ड्राप बॉक्स मशीन

“अगर यही ऑटोमेशन है तो पहले वाली लाइब्रेरी ही बेहतर थी,” छात्रा अंजलि कुमारी कहती हैं। “कम से कम वहां किताबें तो मिल जाती थीं, अब तो मशीनों के बहाने हमें टाल दिया जाता है।”

एजेंसी ने काम छोड़ा, विश्वविद्यालय ने चुप्पी साधी

सूत्रों के अनुसार, लाइब्रेरी ऑटोमेशन और मॉडर्नाइजेशन का काम दिल्ली की एक प्राइवेट एजेंसी को दिया गया था। लेकिन भुगतान विवाद और तकनीकी मंज़ूरी के अभाव में एजेंसी ने काम बीच में ही छोड़ दिया। मशीनें इंस्टॉल तो कर दी गईं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित कर्मी नहीं रखे गए।

यूनिवर्सिटी के एक कर्मचारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं— “कंपनी को काम का पैसा नहीं मिला। कुछ मशीनें अधूरी इंस्टॉलेशन में रह गईं। आईटी डिपार्टमेंट को मेंटेनेंस की ट्रेनिंग भी नहीं दी गई। अब कोई नहीं जानता कि इन्हें चलाना कैसे है।”

किसोक मशीन जिसपर लगा है प्लास्टिक का कवर

सीलिंग झर रही, लेकिन जवाब नहीं

सेंट्रल लाइब्रेरी की हालत सिर्फ मशीनों तक सीमित नहीं है।इमारत भी जर्जर है। फॉल्स सीलिंग झुक चुकी है, कुछ हिस्सों में गिर चुकी है। एक छात्र ने बताया —“डायरेक्टर रूम की सीलिंग कुछ दिन पहले गिरी थी। किसी ने मरम्मत नहीं कराई। हम मीडिया लैब में बैठने से डरते हैं, ऊपर से छत गिरने का डर रहता है।”

कई कमरों में पंखे और लाइटें महीनों से खराब हैं। लाइब्रेरी का स्टडी हॉल अब डर का हॉल बन चुका है।

लाइब्रेरी का स्टडी हॉल

बिहार की विश्वविद्यालयें क्यों पिछड़ रहीं हैं?

बिहार में 20 से अधिक सरकारी विश्वविद्यालय हैं, लेकिन अधिकांश में संरचनात्मक जर्जरता और तकनीकी पिछड़ापन आम समस्या है।
शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार:

  • राज्य के विश्वविद्यालयों में औसतन 40% स्थायी पद खाली हैं।
  • 60% से अधिक कॉलेजों में स्मार्ट क्लास या ई-लर्निंग की सुविधा नहीं है।
  • और 70% पुस्तकालयों में डिजिटल एक्सेस उपलब्ध नहीं है।

यानी डिजिटल इंडिया के नारे में बिहार की उच्च शिक्षा अब भी एनालॉग दौर में फंसी हुई है।

शिक्षा बजट बढ़ा, लेकिन लाइब्रेरी नहीं

बिहार सरकार ने 2024-25 के बजट में उच्च शिक्षा के लिए ₹4,217 करोड़ का प्रावधान किया — जो पिछले साल से 12% ज़्यादा है। लेकिन इसमें “लाइब्रेरी मॉडर्नाइजेशन” के लिए सिर्फ ₹14.6 करोड़ रखे गए हैं, जो कुल शिक्षा बजट का 0.34% है। यही कारण है कि तकनीक पहुंचती तो है, पर टिकती नहीं।

पटना यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के एक प्रोफेसर कहते हैं, “लाइब्रेरी की मशीनें सरकार के डेटा में ‘डिलीवर’ दिखा दी जाती हैं। लेकिन असल में कोई फॉलो-अप नहीं होता। मशीनें रखी जाती हैं, ट्रेनिंग नहीं दी जाती। फिर मशीनें ‘साइलेंट शोपीस’ बन जाती हैं।”

“शिक्षा के डिजिटल सपने को पॉलिटिकल फोटो-ऑप में बदल दिया गया”

पटना विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल करीम कहते हैं— “सेंट्रल लाइब्रेरी का उद्घाटन एक राजनीतिक शो था। फोटो खिंचवाने के लिए सब मौजूद थे — मंत्री, कुलपति, अधिकारी। लेकिन जब छात्र किताब मांगते हैं, तब कोई नहीं होता। यह वही सिस्टम है जो बिल पास कर देता है, लेकिन असल ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर देता है।”

क्यों ज़रूरी है लाइब्रेरी का ऑटोमेशन?

उच्च शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. अनिल झा कहते हैं, “ऑटोमेशन सिर्फ मशीन नहीं, एक सोच है — ज्ञान तक समान पहुंच की सोच। अगर वही मशीनें बंद पड़ी हैं, तो यह समानता के विचार का मज़ाक है। बिहार में हजारों गरीब छात्र हैं जो महंगे डिजिटल टूल्स नहीं खरीद सकते। लाइब्रेरी उनका एकमात्र सहारा है।”

वे आगे जोड़ते हैं — “समस्या तकनीक की नहीं, जवाबदेही की है। मशीनें खरीदी जाती हैं, लेकिन ‘कौन चलाएगा’ ये कोई नहीं सोचता।”

छात्रों की मांग — “हमारे लिए नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए सुधार कीजिए”

लाइब्रेरी के बाहर खड़े छात्र अभिषेक कुमार कहते हैं, “हम शायद पास होकर चले जाएंगे, लेकिन ये लाइब्रेरी अगले बैच के लिए बचनी चाहिए।
कम से कम हमारी आने वाली पीढ़ी को ये ना लगे कि बिहार में शिक्षा सिर्फ पोस्टर पर चलती है।”

नीति और जवाबदेही की कमी

बिहार में उच्च शिक्षा संस्थानों में सुधार को लेकर कोई स्थायी नीति नहीं है। हर प्रोजेक्ट “एक्सपेरिमेंट” की तरह शुरू होता है और अधूरा रह जाता है।
विज्ञान और तकनीकी विश्वविद्यालयों की रिपोर्ट (2024) में बताया गया कि:

  • 68% डिजिटल प्रोजेक्ट्स अपनी समयसीमा में पूरे नहीं होते।
  • 55% इंस्टॉलेशन के बाद “नॉन-फंक्शनल” हो जाते हैं।
  • और 72% संस्थानों ने “मेंटेनेंस बजट” के लिए कोई प्रावधान नहीं किया।

सरकार और विश्वविद्यालय की चुप्पी

जब डेमोक्रेटिक चरखा ने पटना यूनिवर्सिटी प्रशासन से सवाल पूछा कि “क्या मशीनों के रखरखाव और पुनः संचालन की कोई योजना है?” तो जवाब आया — “एजेंसी से संपर्क किया गया है, जल्द कार्य शुरू होगा।”

लेकिन “जल्द” बिहार की नौकरशाही की भाषा में शायद हमेशा “कभी नहीं” होती है।

आख़िर सवाल ये है—

जब सरकारें ‘डिजिटल इंडिया’ की बात करती हैं, जब विश्वविद्यालय ‘नॉलेज हब’ बनने का दावा करते हैं, तो फिर क्यों हमारी लाइब्रेरी की मशीनें धूल खा रही हैं और किताबें बंद अलमारियों में कैद हैं?

क्या शिक्षा की रोशनी सिर्फ उद्घाटन के फ्लैश में जलती है — या कभी छात्रों की आंखों तक भी पहुंचेगी?


(यह रिपोर्ट डेमोक्रेटिक चरखा की शिक्षा संवाद शृंखला के तहत प्रकाशित की जा रही है। अगले भाग में हम “बिहार के कॉलेजों की डिजिटल लैब्स” की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करेंगे।)