बेरोज़गारी का नया चेहरा: स्किल इंडिया से लेकर स्टार्टअप इंडिया तक, वादों की फाइल कहां अटकी है?

देश में बेरोज़गारी दर 8% से ऊपर है। और बिहार, झारखंड, यूपी जैसे राज्यों में यह 14-16% तक पहुंच चुकी है। यानी स्किल तो दिया गया, पर स्किल से कमाई का रास्ता नहीं मिला।

देश में बेरोज़गारी दर 8% से ऊपर है। और बिहार, झारखंड, यूपी जैसे राज्यों में यह 14-16% तक पहुंच चुकी है। यानी स्किल तो दिया गया, पर स्किल से कमाई का रास्ता नहीं मिला।

2014 में जब ‘स्किल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे नारे आए, तो लगा कि अब देश के नौजवानों के हाथ में डिग्री ही नहीं, दिशा भी होगी। सरकार ने कहा — “हर हाथ को हुनर देंगे, हर विचार को अवसर।” आज दस साल बाद, सवाल ये है कि — वो अवसर कहां है?

स्किल इंडिया: ट्रेनिंग के बाद ‘थैंक यू सर्टिफिकेट’

देशभर में करोड़ों युवाओं को स्किल ट्रेनिंग दी गई। लेकिन Democratic Charkha की पड़ताल कहती है — 70% युवाओं को ट्रेनिंग के बाद न जॉब मिली, न इंटर्नशिप।

पटना के राजीव, जिन्होंने 2022 में ‘इलेक्ट्रिशियन स्किल प्रोग्राम’ पूरा किया, बताते हैं: “तीन महीने की ट्रेनिंग हुई, सर्टिफिकेट मिला, फिर बोला गया — अब खुद काम ढूंढो।”

ये वही स्किल इंडिया है, जिसका लक्ष्य हर साल 1 करोड़ युवाओं को रोज़गार से जोड़ने का था। पर नतीजा यह कि रोज़गार तो दूर, स्किल सेंटर खुद बंद हो रहे हैं।

स्टार्टअप इंडिया: आइडिया अच्छे, इकोसिस्टम अधूरा

सरकार ने कहा — “Job seeker नहीं, job creator बनो।” 

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गांव या छोटे शहरों में स्टार्टअप शुरू करना अब भी सपना है। बैंक लोन नहीं देते, सरकारी पोर्टल महीनों तक अटका रहता है, और जिनको मंज़ूरी मिलती है — वे ‘फाइल प्रोसेसिंग’ के चक्कर में ही टूट जाते हैं।पटना के अभिषेक ने “फूड स्टार्टअप” शुरू किया था। कहते हैं: “पोर्टल पर सब्सिडी की स्कीम देखी थी, आवेदन किया। आज दो साल हो गए — जवाब नहीं आया। बस फोन आते हैं, ‘सर, डॉक्यूमेंट अपडेट कीजिए।

मेक इन इंडिया: जो बना, वो ‘मेड फॉर डेटा’ था

देश की अर्थव्यवस्था को ‘मेक इन इंडिया’ से बल देने का दावा हुआ। लेकिन उद्योगों की वास्तविक स्थिति यह कहती है — 2015 से 2024 के बीच मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 4.2% से ऊपर कभी नहीं गई।

बिहार, यूपी, और मध्य भारत के राज्यों में एक भी नया बड़ा औद्योगिक क्लस्टर नहीं बना। हां, मोदी जी के भाषणों में जरूर ‘इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ के बोर्ड हर 100 किलोमीटर पर दिखे।

सरकारी आंकड़ों की बाज़ीगरी: बेरोज़गारी को डेटा से छिपाने की कोशिश

सरकार कहती है — “रोज़गार बढ़ रहा है।” पर Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE) कहता है —
2025 में शहरी युवा बेरोज़गारी दर 12.3% है। गांवों में भी रोज़गार घटा है, क्योंकि कृषि क्षेत्र अब 8 महीने की नौकरी तक सिमट गया है।

फिर भी हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा जाता है — “अवसरों की कोई कमी नहीं।” बस यह नहीं बताया जाता कि अवसर किसके लिए हैं — नेता के बेटे के लिए या बेरोज़गार बेटे के लिए?

हकीकत की जमीन पर सवाल: स्किल कौन देगा, जब सिस्टम ही अनस्किल्ड है?

हर बार नई स्कीम, नया लोगो, नया ऐप — पर काम वही पुराना: “घोषणा करो, फोटो खिंचवाओ, भूल जाओ।”

देश में 65% आबादी 35 साल से कम उम्र की है, पर नीति ऐसी बनाई जा रही है जैसे 1980 का भारत अब भी कायम है।
युवा बोल रहा है — “हमें स्किल नहीं, हमें स्थिरता चाहिए।”

स्टार्टअप की बात छोड़िए, पहले सिस्टम स्टार्ट करिए

‘स्किल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्टअप इंडिया’ — इन सबकी सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि इनमें India तो है, ground नहीं। हर योजना में नारा बड़ा है, पर नीति नदारद।

बेरोज़गारी अब सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, यह उस पीढ़ी की पहचान बन चुकी है जो सरकार के PowerPoint में ‘Target Achieved’ कहलाती है, पर वक़्त से पहले हताश हो चुकी है।