प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना की महत्वकांक्षा ने युवाओं को हुनर सिखाने का सपना दिखाया था, लेकिन अब वही सपना ठगी क्यों महसूस हो रहा है?
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना की कहानी भारत में युवाओं की उम्मीद और व्यवस्था की हकीकत के बीच खड़े उस लंबे, अंधेरे गलियारे जैसी है, जिसमें रोशनी दिखाने का दावा तो हर तरफ़ है, लेकिन रास्ता पार करते-करते युवक खुद ही अंधेरे में गुम हो जाता है। एक ऐसी योजना, जिसे महत्वकांक्षी कहा गया, जिसे रोज़गार क्रांति का बीज बताया गया और जिसे युवाओं के कौशल विकास की दिशा में ‘ऐतिहासिक’ कदम बताया गया। लेकिन जब योजना एक साल बाद अपने आंकड़ों के साथ सामने खड़ी होती है, तो वह किसी भी आंकड़ा-विशेषज्ञ के नहीं, बल्कि उस युवा के दिल को चोट पहुंचती है जिसने इस पर भरोसा किया था।
सरकार ने इस योजना की शुरुआत बड़े दावों के साथ की थी। कहा गया कि 1.25 लाख युवाओं को उद्योगों में इंटर्नशिप दिलाई जाएगी। इसके लिए पूरे देश में कंपनियों को पोर्टल पर पोस्टिंग डालने का आग्रह किया गया था। युवा उमड़ पड़े, 1.81 लाख से अधिक युवाओं ने आवेदन किया, और 6 लाख से अधिक आवेदन पोर्टल पर जमा हुए। पहली नज़र में यह किसी भी योजना के लिए असाधारण उत्साह है।
लेकिन जैसे ही प्रक्रिया आगे बढ़ी, तस्वीर का असली चेहरा दिखना शुरू हुआ। कंपनियों ने करीब 82,000 ऑफ़र लेटर जारी किए। इतने बड़े ऑफ़र लेटर देखकर ऐसा लगता था कि योजना सच में उड़ान भरने वाली है, लेकिन जैसे ही युवाओं को ऑफ़र मिला, वास्तविकता ने उन्हें खींचकर जमीन पर ला पटका। सिर्फ 28,000 युवाओं ने ऑफ़र स्वीकार किया। और ऑफ़र स्वीकार करने वाले उन 28,000 में से भी सिर्फ 8700 युवाओं ने इंटर्नशिप शुरू की।
आधे युवाओं ने बीच में इंटर्नशिप क्यों छोड़ी?
यहां से कहानी निराशाजनक नहीं, बल्कि चौंकाने वाली हो जाती है। 8700 में से भी लगभग आधे यानी 4565 युवाओं ने इंटर्नशिप बीच में ही छोड़ दी। सरकार ने खुद माना है कि अंत में सिर्फ 2066 युवाओं ने पूरी 12 महीने की इंटर्नशिप पूरी की। और इनमें बिहार के सिर्फ 156 युवा मौजूद थे।
बेरोज़गारी में देश में लगातार शीर्ष पर रहने वाले बिहार जैसे प्रदेश के लिए यह संख्या वैसे ही है जैसे किसी विशाल मैदान में एक दिया जलता हुआ छोड़ देना न रोशनी दे पाएगा, न दिशा। सरकार ने संसद में बताया कि इस योजना पर 73.72 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जिनमें से 16.62 करोड़ रुपये युवाओं को स्टाइपेंड के रूप में दिए गए। बजट की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है, शुरुआत में योजना के लिए लगभग 840 करोड़ रुपये का प्रावधान था, जिसे काटकर 380 करोड़ के आसपास ला दिया गया। यह कटौती सिर्फ बजट की नहीं, उम्मीद की भी थी।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर जो योजना युवाओं के लिए बनाई गई थी, उसे युवाओं ने ही क्यों छोड़ दिया? इसका जवाब भी सरकार के पास है, क्योंकि उसने एक फीडबैक सर्वे कराया था। उस सर्वे में तीन प्रमुख कारण सामने आए। पहला, इंटर्नशिप में मिलने वाला स्टाइपेंड- अधिकतम 10,000 रुपये युवाओं के जीवन-यापन की लागत के सामने बहुत कम था। किसी छोटे शहर से दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में जाकर रहना, खाना और यात्रा करना क्या 10,000 रुपये में संभव है? यह योजना बनाने वालों के मन में शायद कभी नहीं आया।

दूसरा कारण था इंटर्नशिप की अवधि 12 महीने। युवाओं ने साफ़ कहा कि इतनी लंबी अवधि में वे न नौकरी खोज सकते हैं, न पढ़ाई पर ध्यान दे सकते हैं, और न ही कोई महत्वपूर्ण कौशल सीख पाते हैं। तीसरी वजह सबसे गंभीर है कि अधिकतर कंपनियों ने इंटर्न्स को असली प्रशिक्षण देने के बजाय उन्हें डेटा एंट्री, एक्सेल अपडेट या फॉर्म भरने जैसे कामों में लगा दिया। यानी उद्योग अनुभव के नाम पर युवाओं से वही काम करवाया गया, जो अकसर मुफ्त में करवाया जाता है। यह न इंटर्नशिप थी, न प्रशिक्षण यह सस्ती श्रमशक्ति का उपयोग था।
इंटर्नशिप के नाम पर युवाओं से सिर्फ़ ठगी हुई
कंपनियां योजना में आईं, लेकिन ज़िम्मेदारी से साथ नहीं आईं। कई कंपनियों ने पोर्टल पर हज़ारों की संख्या में पोस्टिंग डाल दी, पर उनके पास न तो मेंटरशिप मॉडल था, न प्रशिक्षण का ढांचा, न सीखने का माहौल। कंपनियां खुश थीं, सरकार स्टाइपेंड दे रही थी, CSR स्कोर बढ़ रहा था, और उन्हें कम पैसों में काम करवाने के लिए युवा मिल रहे थे। सरकार भी खुश थी क्योंकि आंकड़े दिख रहे थे, पोस्टिंग हो रही थीं, आवेदन बढ़ रहे थे, और योजना अख़बारों में चमक रही थी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा नुकसान युवाओं का हुआ। वे इंटर्नशिप का अर्थ समझते हुए आए थे और लौटे खाली हाथ।
यह भी गंभीर सवाल है कि बिहार इस योजना में इतना पीछे क्यों रह गया। 2066 सफ़ल इंटर्न्स में सिर्फ 156 बिहार से। इसका सीधा मतलब यह है कि बिहार के युवा न योजना तक पहुंच पाए, न योजना उन तक पहुंच पाई। कारण बहुत स्पष्ट है, बिहार के अधिकांश युवा गरीब परिवारों से आते हैं, वे दूर शहरों में रहने का खर्च नहीं उठा सकते, उनके पास तकनीकी कौशल कम है, और राज्य में उद्योगों की संख्या लगभग न के बराबर है। इंटर्नशिप की अधिकतर पोस्टिंग महानगरों में थीं, और बिहार के एक साधारण परिवार के लिए 12 महीने के लिए अपने बेटे या बेटी को भेजना एक बड़ा आर्थिक जोखिम है। बिहार में इस योजना की असफलता सिर्फ बेरोज़गारी का नहीं, सामाजिक और आर्थिक असमानता का परिणाम है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन 2066 युवाओं ने योजना पूरी की, उन सभी को भी नौकरी की गारंटी नहीं मिली है। योजना में यह लिखा ही नहीं गया था कि इंटर्नशिप के बाद नौकरी मिलेगी। लेकिन जब सरकारी स्कीमों में बड़े-बड़े वादे होते हैं, तो युवा स्वाभाविक रूप से यह मान लेते हैं कि कुछ न कुछ फायदा होगा। जब इंटर्नशिप खत्म होने के बाद भी कंपनियों ने दरवाज़ा बंद कर दिया, तो युवाओं को एहसास हुआ कि वे एक साल सिर्फ उम्मीद में गुज़ार चुके हैं जिंदगी में आगे बढ़ने की बजाय पीछे रह गए।
नौकरी में अस्पष्टता विफ़लता की सबसे बड़ी वजह
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना की सबसे बड़ी विफलता इसकी डिज़ाइन में दिखती है। एक ऐसा पोर्टल, जिस पर लाखों आवेदन भरे जाएं, पर सिस्टम धीमा पड़े। वेरिफिकेशन समय पर न हो। जॉब-रोल की स्पष्टता न हो। कंपनियों पर कोई निगरानी न हो। और स्टाइपेंड इतना कम हो कि शहर में रहना ही असंभव हो जाए। यह योजना सिर्फ कागज़ पर महात्वाकांक्षी थी। ज़मीन पर यह शुरुआत से ही अस्थिर थी, और इसका टूटना सिर्फ समय का सवाल था।
आज, जब प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के आंकड़े सामने आते हैं, तो सरकार कह सकती है कि 2066 युवाओं ने इसे पूरा किया। लेकिन असल सवाल यह है कि 1.81 लाख युवाओं ने आवेदन किया था तो उनमें से सिर्फ 2066 अंत तक क्यों पहुंचे? इसका मतलब यह है कि स्कीम में 98% युवा बीच में ही छूट गए। किसी भी योजना के लिए यह विफलता नहीं, प्रणालीगत दुर्घटना है।
इंटर्नशिप की दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है सीखना। लेकिन इस योजना में सीखने की बजाय युवा केवल सिस्टम की कमी समझने लगे। उन्हें पता चला कि सरकारी योजनाएं गूगल शीट्स और पोर्टल के दम पर नहीं चलतीं उन्हें जमीन पर काम चाहिए। कंपनियों की जवाबदेही चाहिए। मेंटरशिप चाहिए। प्रशिक्षण चाहिए। और सबसे ज़रूरी युवाओं का सम्मान चाहिए।
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना भारत की उस युवा नीति का आईना है, जिसमें दिशा बहुत है, लेकिन मंज़िल नहीं। जहां घोषणा बहुत हैं, लेकिन तैयारी नहीं। जहां पोर्टल तो आधुनिक है, लेकिन अवसर नहीं। जहां डेटा बहुत है, लेकिन पारदर्शिता नहीं। और जहां भविष्य की बातें तो खूब हैं, लेकिन वर्तमान में कुछ भी ठोस नहीं।





