वायु प्रदूषण: विकास की गति में हवा हुई ज़हरीली, सांस की बीमारी बढ़ी

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन कर क्या रहा है? पटना में प्रदूषण का यह स्तर सिर्फ पर्यावरण का विषय नहीं है बल्कि यह जनता के जीवन का प्रश्न है।
वायु प्रदूषण: विकास की गति में हवा हुई ज़हरीली, सांस की बीमारी बढ़ी

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन कर क्या रहा है? पटना में प्रदूषण का यह स्तर सिर्फ पर्यावरण का विषय नहीं है बल्कि यह जनता के जीवन का प्रश्न है।

पटना में दिसंबर की सुबहें हमेशा धुंध से ढकी रहती थीं। लोग इसे सर्दी की ठंडक मानते थे, नदी किनारे की नमी मानते थे, मौसम का प्राकृतिक बदलाव समझते थे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह धुंध मौसम नहीं, मौत लेकर आती है। अब यह धुंध, यह धुआं, यह हवा, प्राकृतिक नहीं है। यह मिश्रण है धूल, कचरे, वाहन उत्सर्जन, निर्माण स्थल की मिट्टी, और प्रशासनिक लापरवाही का। और इस बार पटना में प्रदूषण जिस स्तर तक पहुंचा है, वह सिर्फ चेतावनी नहीं बल्कि एक स्वास्थ्य आपातकाल है।

सबसे ज़्यादा प्रभावित वे इलाके हैं, जिन्हें पटना शहर की धड़कन कहा जाता है, वेटनरी मैदान और गांधी मैदान का पूरा क्षेत्र। तीन दिन की मामूली राहत के बाद वेटनरी के पास AQI फिर से 248 पर पहुंच गया, यानी गंभीर श्रेणी की ओर बढ़ता हुआ स्तर। गांधी मैदान क्षेत्र में प्रदूषण कुछ कम नहीं था, वहां 218 का रिकॉर्ड दर्ज किया गया। 

यही हाल सिर्फ इन दो इलाकों का नहीं है। दानापुर, तारामंडल, सचिवालय, पटना सिटी, हर जगह हवा का स्तर खतरनाक ढंग से बढ़ा हुआ है। PM2.5 और PM10 दोनों ही राष्ट्रीय मानकों से दुगुने से ज़्यादा दर्ज किए गए हैं।

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के मुताबिक 200-300 के AQI स्तर को ‘ख़राब’ माना जाता है। यानी यह वह हवा है, जिससे सांस लेने पर शरीर में महीन धूल कण घुस जाते हैं। फेफड़े सिर्फ ऑक्सीजन नहीं लेते वो PM2.5 की बारीक परतों को भी भीतर खींच लेते हैं, जो कभी शरीर से बाहर नहीं निकलती। यही वजह है कि पटना के अस्पतालों में अस्थमा, खांसी, सीने में दर्द, एलर्जी और सांस फूलने के मरीज़ अचानक बढ़ गए हैं।

वेटनरी मैदान का इलाका बन रहा है गैस चैम्बर

वेटनरी मैदान इस समय शहर का प्रदूषण हॉटस्पॉट बन चुका है। यहां सुबह 6 बजे टहलने आने वाले लोग अब मास्क पहनकर चलते हैं। 55 वर्षीय दिलीप सिंह, जो हर सुबह वेटनरी मैदान में व्यायाम करते थे, बताते हैं, “सांस भारी हो रही है। दो दिनों से सीने में दर्द है। डॉक्टर ने कहा है कि बाहर न निकलें। लेकिन हम बूढ़े लोग घर में बैठकर क्या करें?” यही सवाल हर बुज़ुर्ग, हर दिहाड़ी मज़दूर, हर रिक्शा चालक का है जो न चाहते हुए भी हर दिन इस ज़हरीली हवा को पीने के लिए मजबूर हैं।

गांधी मैदान की स्थिति भी कम खराब नहीं। जहां पहले बच्चे क्रिकेट खेलते दिखते थे, आज वहां N95 मास्क पहने युवा जॉगिंग करते देखे जा सकते हैं। यह दृश्य किसी महानगर की प्रदूषण फिल्म का हिस्सा नहीं यह पटना की वास्तविकता है।

लेकिन इस प्रदूषण का एक बड़ा कारण सिर्फ धूल या ठंड नहीं है। पटना में पिछले तीन वर्षों से निर्माण कार्य लगभग लगातार चल रहा है सड़कें खोदी जाती हैं, महीनों खुले रहती हैं, उनके किनारे बजरी और मिट्टी जमा रहती है। ट्रैक्टर और ट्रक बिना कवर के धूल उड़ाते हुए शहर में घूमते हैं। जितना कचरा उठाया नहीं जाता, उससे ज़्यादा शहर में फैलता जाता है। प्रदूषण सिर्फ हवा के माध्यम से नहीं फैलता यह प्रशासनिक अक्षमता के माध्यम से भी फैलता है। जब कचरा प्रबंधन ढीला हो, ट्रैफिक नियंत्रण न हो, और मास्टर प्लान में पर्यावरण को प्राथमिकता न मिले तब हवा जहरीली होना तय है।

दानापुर और तारामंडल पटना के घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं। यहां गलियां संकरी हैं, लोग ज़्यादा हैं, बाइक और ई-रिक्शा पूरे दिन धुआं छोड़ते रहते हैं। शाम के समय यहां धुंध और धूल की ऐसी परत बन जाती है, जिसमें साफ़ दिखना मुश्किल है। कई परिवारों ने अपने बच्चों की स्कूल बस रूट बदलवा दिए हैं, कुछ ने तो घर से बाहर खेलने पर भी रोक लगा दी है। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए यह हवा बेहद घातक है।

पटना में फैल रहा स्मॉग

एक महीने में सांस के मरीज़ बढ़ने की संभावना

पटना मेडिकल कॉलेज और IGIMS के डॉक्टर मान रहे हैं कि अगले एक महीने में सांस की बीमारियों के मरीज़ दोगुने हो सकते हैं। शहर की हवा में पहले से ही नाइट्रोजन डाईऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ चुकी है। ये गैसें लंबे समय तक शरीर में रहकर दिल और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं। कई डॉक्टर यह भी कह रहे हैं कि पटना में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा अब वास्तविक हो चुका है। यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि डेटा-आधारित चेतावनी है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन कर क्या रहा है? हर साल ठंड शुरू होते ही राजधानी का AQI 200 से ऊपर पहुंच जाता है। हर साल मीडिया में ख़बरें छपती हैं। हर साल बयानबाज़ी होती है। लेकिन समाधान कहां है? क्या निर्माण स्थल पर पानी का छिड़काव होता है? क्या ट्रकों और ट्रैक्टरों को ढककर चलाया जाता है? क्या कचरा समय पर उठता है? क्या शहर में ग्रीन बेल्ट बढ़ाई गई है? सच्चाई यह है कि इन सभी सवालों का जवाब या तो ‘नहीं’ है या ‘कागज पर हां, जमीन पर नहीं’।

पटना की हवा ख़राब होना अब कोई अचानक की आपदा नहीं बल्कि यह एक सतत संकट है। यह संकट उस शहर का है, जो विकास के नाम पर धूल में दफन हो रहा है। यह संकट उन बच्चों का है, जिनका फेफड़ा पैदा होते ही कमज़ोर हो जाता है। यह संकट उन श्रमिकों का है, जो पूरे दिन सड़क पर काम करते हैं और अपनी सांसों के बदले शहर को निर्माण देते हैं। यह संकट उन बुज़ुर्गों का है, जो दवाइयों के सहारे ज़िन्दगी काट रहे हैं।

पटना का AQI स्तर

एक बड़ा कारण यह भी है कि पटना में सार्वजनिक परिवहन की हालत बेहद कमज़ोर है। लोग मजबूरी में बाइक या स्कूटी से चलते हैं, जिससे धुआं और बढ़ता है। शहर में पेड़ों की संख्या लगातार घट रही है। नालों की सफाई समय पर नहीं होती। जब हवा में नमी अधिक होती है, तो धूल का कण ऊपर उड़ने की बजाय नीचे जम जाता है, जिससे ‘स्मॉग’ बनता है, जो पटना की सुबह को काला और भारी बना देता है।

वायु प्रदूषण जीवन का प्रश्न

पटना में प्रदूषण का यह स्तर सिर्फ पर्यावरण का विषय नहीं है बल्कि यह जनता के जीवन का प्रश्न है। सरकार को यह समझना होगा कि हवा सुधारने के लिए जश्न या प्रतीकात्मक कदम नहीं चाहिए इसके लिए कड़ाई चाहिए। निर्माण कार्यों को नियंत्रित करना होगा। धूल रोकने की तकनीक लागू करनी होगी। ट्रैफिक को व्यवस्थित करना होगा। पेड़ लगाने होंगे। कचरा प्रबंधन को मजबूत करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण प्रदूषण को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही तय करनी होगी।

आज पटना के लोग हवा नहीं, सूक्ष्म धूलकणों का मिश्रण सांस के रूप में ले रहे हैं। यह हवा किसी भी महामारी से कम घातक नहीं। लेकिन इसका कोई वैक्सीन नहीं है। इसका इलाज सिर्फ प्रशासनिक इच्छाशक्ति है जो फिलहाल अत्यंत कमज़ोर दिख रही है।

वेटनरी मैदान में चलने वाली हवा सिर्फ 248 के AQI की एक संख्या नहीं है यह उस शहर की तकलीफ़ का प्रतीक है, जो अपनी सांस गंवा रहा है। गांधी मैदान में 218 का स्तर सिर्फ एक रिपोर्ट की लाइन नहीं यह उन हज़ारों लोगों की कहानी है जो रोज़ वहां से गुजरते हुए अपनी सेहत बिगाड़ रहे हैं। पटना आज जिस दिशा में जा रहा है, वह सिर्फ गंभीर नहीं बेहद खतरनाक है।