गरीबी घटी, लेकिन बिहार क्यों सबसे गरीब बना रहा?

बिहार की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 69,321 रुपये है—देश में सबसे कम। सवाल यही है कि अगर गरीबी घट रही है, तो बिहार सबसे गरीब क्यों बना हुआ है?
मनरेगा: नाम बदला, नियत बदली और मज़दूरों की ज़िन्दगी भी

बिहार की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 69,321 रुपये है—देश में सबसे कम। सवाल यही है कि अगर गरीबी घट रही है, तो बिहार सबसे गरीब क्यों बना हुआ है?

सुबह के सात बजे हैं। दरभंगा जिले के हायाघाट के पास एक छोटे से गांव में मीना देवी अपने घर के सामने बैठी हैं। घर कहना शायद ज़्यादा ठीक शब्द है—दो कमरों का कच्चा ढांचा, टीन की छत और एक कोने में रखा राशन का बोरा। मीना के पास आयुष्मान कार्ड है, बच्चों के नाम स्कूल में दर्ज हैं, उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन भी मिला है। सरकारी रिकॉर्ड में मीना देवी अब “गरीब” नहीं हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि महीने के अंत में सबसे मुश्किल क्या होता है, तो उनका जवाब सीधा है—“पैसा।”

यही वह विरोधाभास है, जिसे भारत का आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 पूरी स्पष्टता से पकड़ नहीं पाता। सर्वे के मुताबिक़ भारत में बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty Index) ऐतिहासिक रूप से घटी है। करोड़ों लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के पैमानों पर गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। लेकिन उसी समय सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बिहार की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 69,321 रुपये है—देश में सबसे कम। सवाल यही है कि अगर गरीबी घट रही है, तो बिहार सबसे गरीब क्यों बना हुआ है?

आर्थिक सर्वे का MPI तर्क यह मानता है कि अगर किसी परिवार के पास शौचालय है, बिजली है, गैस कनेक्शन है और बच्चे स्कूल जा रहे हैं, तो वह बहुआयामी गरीबी से बाहर आ चुका है। यह दृष्टिकोण अपने आप में ग़लत नहीं है। बुनियादी सुविधाएं जीवन की गरिमा के लिए ज़रूरी हैं। लेकिन बिहार की समस्या यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि यहीं से शुरू होती है। क्योंकि गरीबी सिर्फ़ सुविधाओं की अनुपस्थिति नहीं होती, वह आय की अनिश्चितता, रोज़गार की कमी और भविष्य के डर का भी नाम होती है।

बिहार में बड़ी आबादी ऐसी है जो योजनाओं के दम पर तो “गरीबी रेखा से बाहर” आ गई है, लेकिन जिसकी आमदनी इतनी कम और अस्थिर है कि वह किसी भी झटके—बीमारी, फसल खराब होने, नौकरी छूटने—से फिर उसी गरीबी में लौट सकती है। यही वजह है कि प्रति व्यक्ति आय का सवाल बिहार में कहीं ज़्यादा अहम हो जाता है। 69,321 रुपये सालाना का मतलब है—लगभग 5,800 रुपये महीना। इस रकम में एक परिवार कैसे जीता है, यह सवाल आंकड़ों से नहीं, ज़मीन से पूछा जाना चाहिए।

बिहार की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है। विकास दर भी तेज़ रही है। आर्थिक सर्वे खुद कहता है कि बिहार की विकास दर 22 राज्यों से अधिक है। लेकिन यह विकास आमदनी में क्यों नहीं बदल पा रहा? इसका एक जवाब बिहार की जनसंख्या संरचना में छिपा है। यहां प्रति व्यक्ति आय कम इसलिए भी है क्योंकि आबादी बहुत बड़ी है और औद्योगिक रोजगार बहुत सीमित। कृषि पर निर्भरता ज़्यादा है, लेकिन खेती छोटे-छोटे जोतों में बंटी हुई है, जहां उत्पादकता और आय दोनों सीमित रहती हैं।

एक और अहम पहलू यह है कि बिहार की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र पर टिका है। दिहाड़ी मजदूरी, गिग वर्क, मौसमी पलायन—ये सभी आय के ऐसे स्रोत हैं जो न तो स्थिर हैं और न ही पर्याप्त। आर्थिक सर्वे जब गरीबी घटने की बात करता है, तो वह इस अस्थिरता को पूरी तरह नहीं गिनता। MPI यह नहीं पूछता कि किसी परिवार की आय अगले महीने भी रहेगी या नहीं। वह सिर्फ़ यह देखता है कि इस समय उसके पास कौन-सी सुविधाएं हैं।

यहीं पर नीति और ज़मीन के बीच की दूरी साफ़ दिखती है। बिहार के लाखों लोग ऐसे हैं जो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी हैं, लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। योजनाएं उन्हें जीवन की न्यूनतम सुरक्षा देती हैं, लेकिन सम्मानजनक आमदनी नहीं। यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता। क्योंकि जब राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार आय नहीं, बल्कि सब्सिडी बन जाए, तो असमानता का ढांचा बदलता नहीं, सिर्फ़ उसका रूप बदलता है।

बिहार का एक और सच है—पलायन। राज्य की अर्थव्यवस्था में बाहर कमाने वाले मजदूरों की भूमिका बहुत बड़ी है। दिल्ली, मुंबई, सूरत और पंजाब में काम कर रहे बिहारी मजदूर जो पैसा गांव भेजते हैं, वही कई परिवारों की असली आमदनी है। लेकिन यह आमदनी बिहार के प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों में ठीक से परिलक्षित नहीं होती। पलायन एक तरह से बिहार की गरीबी को छिपाने का माध्यम बन गया है—राज्य के बाहर कमाया गया पैसा राज्य के भीतर गरीबी को अस्थायी रूप से ढक देता है।

आर्थिक सर्वे में असमानता पर चर्चा सीमित है। जबकि बिहार के संदर्भ में असमानता ही असली सवाल है। पटना, मुज़फ़्फ़रपुर जैसे शहरों में आय और अवसर हैं, लेकिन सीमांचल, मगध और कोसी क्षेत्र के कई जिलों में स्थिति बेहद खराब है। राज्य के भीतर ही कई बिहार हैं—कुछ आगे बढ़ते हुए, कुछ वहीं ठहरे हुए। MPI औसत निकाल देता है, लेकिन यह नहीं बताता कि कौन पीछे छूट रहा है।

गरीबी घटने की सरकारी कहानी में एक नैतिक खतरा भी छिपा है। अगर हम सिर्फ़ यह मान लें कि गरीबी अब “इतनी बड़ी समस्या नहीं रही”, तो हम उन संरचनात्मक सवालों से बच निकलते हैं, जो बिहार को दशकों से पीछे खींचते रहे हैं—शिक्षा की गुणवत्ता, उद्योगों की कमी, महिलाओं की कम भागीदारी, और ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार का अभाव। गरीबी का नया पैमाना इन सवालों को हल्का बना देता है।

बिहार की प्रति व्यक्ति आय का सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि यह राज्य की भविष्य की दिशा तय करता है। कम आय का मतलब है कम बचत, कम निवेश और सीमित अवसर। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक गतिशीलता पर पड़ता है। अगर आय नहीं बढ़ेगी, तो योजनाएं हमेशा राहत बनकर रहेंगी, समाधान नहीं।

अंत में सवाल यह नहीं है कि आर्थिक सर्वे ग़लत है या सही। सवाल यह है कि हम किस तरह की गरीबी को देखना चाहते हैं। अगर गरीबी का मतलब सिर्फ़ योजनाओं तक पहुंच है, तो बिहार की कहानी सफल कही जा सकती है। लेकिन अगर गरीबी का मतलब सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थिर आमदनी है, तो बिहार अभी भी सबसे गरीब है—और शायद इसलिए सबसे असुरक्षित भी।

मीना देवी के घर के सामने रखे राशन के बोरे और उनके खाली पर्स के बीच का फर्क यही कहानी कहता है। गरीबी काग़ज़ों से घट सकती है, लेकिन ज़िंदगी से नहीं—जब तक आमदनी नहीं बढ़ती। और बिहार की असली लड़ाई आज यही है: योजनाओं के आगे, आय की राजनीति।