जिन परिवारों ने पहली किस्त के पैसे से नींव डाल दी, दीवार खड़ी कर दी, वे दूसरी किस्त के इंतज़ार में महीनों से अधूरे ढांचे में रह रहे हैं।
बिहार विधानसभा में जब यह स्वीकार किया गया कि पिछले दो वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 12.08 लाख प्रधानमंत्री आवास मंज़ूर हुए, लेकिन उनमें से 9.16 लाख पूरे नहीं हो सके, तो यह सिर्फ़ एक सांख्यिकीय सूचना नहीं थी। यह उस वादे की पोल थी, जो वर्षों से “सबके सिर पर पक्का घर” के नाम पर दोहराया जाता रहा है। आंकड़ा सीधा है—मंज़ूरी और निर्माण के बीच एक बड़ी खाई है। सवाल यह है कि यह खाई क्यों है, और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?

प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) को देश की सबसे महत्वाकांक्षी सामाजिक योजनाओं में गिना जाता है। दावा यह रहा है कि कच्चे घरों को पक्की छत में बदला जाएगा, और ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन बिहार के संदर्भ में तस्वीर उतनी सीधी नहीं है। 2024-25 और 2025-26 के लिए लाखों घरों का लक्ष्य तय हुआ, स्वीकृतियां भी जारी हुईं, लेकिन निर्माण की रफ्तार उस वादे के अनुरूप नहीं चली। विधानसभा में खुद सरकार ने माना कि लाखों लाभार्थियों को पहली किस्त तो मिली, लेकिन दूसरी किस्त तक नहीं पहुंच पाई।
फंड जारी तो प्रधानमंत्री आवास का निर्माण क्यों नहीं?
यहां एक बुनियादी सवाल उठता है—अगर स्वीकृति हो गई, फंड जारी हो गया, तो निर्माण क्यों नहीं हुआ? सरकार की ओर से एक कारण सामने आया—स्टेट नोडल अकाउंट की अनुपस्थिति, जिसके कारण केंद्र से भुगतान में बाधा आई। लेकिन यह जवाब उतना ही प्रशासनिक है, जितना अपूर्ण। क्योंकि लाभार्थी के लिए “नोडल अकाउंट” कोई तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि अधूरी दीवार है। जिन परिवारों ने पहली किस्त के पैसे से नींव डाल दी, दीवार खड़ी कर दी, वे दूसरी किस्त के इंतज़ार में महीनों से अधूरे ढांचे में रह रहे हैं।

ग्रामीण इलाकों में अधूरे आवास का मतलब सिर्फ़ निर्माण रुक जाना नहीं है। इसका मतलब है—बारिश में टपकती छत, बिना प्लास्टर की दीवारें, और ऐसे घर में रहना जिसे पूरा मानने का प्रमाणपत्र काग़ज़ पर हो सकता है, लेकिन ज़मीन पर नहीं। कई जगहों पर लाभार्थियों ने उधार लेकर काम शुरू किया, यह भरोसा करते हुए कि अगली किस्त समय पर आ जाएगी। जब वह नहीं आई, तो कर्ज़ का बोझ भी सिर पर चढ़ गया।
इस पूरी प्रक्रिया में एक और परत है—लक्ष्य बनाम गुणवत्ता। जब लाखों घरों का लक्ष्य तय होता है, तो प्रशासनिक दबाव निर्माण की संख्या पर होता है, गुणवत्ता पर नहीं। पंचायत स्तर पर सत्यापन, तकनीकी निरीक्षण और भुगतान की निगरानी में जो कमजोरियां हैं, वे अधूरे घरों के रूप में सामने आती हैं। यह समस्या सिर्फ़ बिहार की नहीं, लेकिन बिहार में इसका पैमाना बड़ा है, क्योंकि यहां आवास की आवश्यकता भी अधिक है।
विधानसभा में यह भी बताया गया कि कई लाभार्थियों को पहली किस्त मिली, लेकिन दूसरी नहीं। इसका सीधा अर्थ है कि निर्माण प्रक्रिया बीच में अटक गई। यहां तकनीकी कारणों से ज़्यादा अहम है प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल। अगर राज्य स्तर पर खाता नहीं खुला, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? और जब तक यह प्रक्रिया ठीक नहीं होती, तब तक नए लक्ष्य घोषित करने का क्या अर्थ है?
पहली किस्त से दूसरी किस्त में देरी, हौंसलों को तोड़ देती है
प्रधानमंत्री आवास योजना का मूल विचार यह था कि लाभार्थी को किस्तों में राशि देकर स्वयं निर्माण के लिए सक्षम बनाया जाए। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश ग्रामीण परिवारों के पास निर्माण की लागत पूरी करने की क्षमता नहीं होती। पहली किस्त से नींव और दीवार खड़ी हो सकती है, लेकिन छत, दरवाज़ा, खिड़की, फर्श—इन सबके लिए अतिरिक्त संसाधन चाहिए। जब दूसरी किस्त में देरी होती है, तो पूरा ढांचा अस्थिर हो जाता है।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू जुड़ता है—डेटा की पारदर्शिता। कितने घर “पूर्ण” दिखाए गए हैं, और कितने वास्तव में रहने योग्य हैं? कई बार प्रशासनिक रिकॉर्ड में घर पूर्ण दिखा दिए जाते हैं, जबकि ज़मीन पर कार्य अधूरा होता है। यह अंतर केवल भौतिक नहीं, नैतिक भी है। क्योंकि एक अधूरा घर केवल ईंट-सीमेंट का ढांचा नहीं, बल्कि अधूरी नीति का प्रतीक है।
इस मुद्दे को केवल आवास तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। ग्रामीण विकास की पूरी श्रृंखला इससे जुड़ी है—पेयजल, शौचालय, बिजली कनेक्शन, और अब मनरेगा मजदूरी से जुड़ा श्रम। अगर एक योजना की कड़ी कमजोर होती है, तो पूरी श्रृंखला प्रभावित होती है। विधानसभा में यह भी सामने आया कि हजारों राजकीय नलकूप खराब पड़े हैं। यानी जहां घर अधूरे हैं, वहां पानी की व्यवस्था भी अधूरी है। यह एक संयुक्त संकट है।

केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय समन्वय का सवाल भी यहां केंद्रीय है। आवास योजना केंद्र प्रायोजित है, लेकिन कार्यान्वयन राज्य और पंचायत स्तर पर होता है। अगर स्टेट नोडल अकाउंट में देरी होती है, तो उसका असर सीधे लाभार्थी पर पड़ता है। यह तकनीकी खामी नहीं, शासन की खामी है। और जब तक इस खामी की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक हर साल नए लक्ष्य घोषित करना सिर्फ़ आंकड़ों की राजनीति रह जाएगा।
प्रधानमंत्री आवास सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न
यह भी ध्यान देने योग्य है कि बिहार में प्रधानमंत्री आवास की आवश्यकता केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का भी प्रश्न है। पक्का घर सिर्फ़ छत नहीं देता, बल्कि सामाजिक सम्मान, स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का आधार बनता है। जब लाखों घर अधूरे रह जाते हैं, तो उसका असर केवल परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे ग्रामीण ढांचे पर पड़ता है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस अंतर को स्वीकार कर उसे सुधारने के लिए ठोस रोडमैप पेश करेंगे? या फिर यह भी एक ऐसा आंकड़ा बनकर रह जाएगा, जो बजट सत्र की कार्यवाही में दर्ज हुआ और फिर अगली घोषणा तक भुला दिया गया? अगर 12 लाख घरों का लक्ष्य था और 9 लाख अधूरे हैं, तो यह केवल कार्यान्वयन की समस्या नहीं, बल्कि प्राथमिकता की समस्या है।
बिहार की ग्रामीण तस्वीर में अधूरी दीवारें सिर्फ़ निर्माण की कमी नहीं दिखातीं, बल्कि नीति और ज़मीन के बीच की दूरी भी दिखाती हैं। यह दूरी जितनी जल्दी कम होगी, उतना ही जल्दी योजनाओं का वादा वास्तविकता में बदलेगा। वरना हर साल मंज़ूरी की संख्या बढ़ेगी, लेकिन छतें अधूरी ही रहेंगी।





