विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग खोलने की भी कोई योजना नहीं है। और अगर इन उत्तरों से स्थिति स्पष्ट है, तो सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाने की इच्छुक नहीं है।
विधान परिषद में एक सवाल पूछा गया। सवाल बहुत बड़ा नहीं था। न उसमें कोई सनसनी थी, न आरोप। बस इतना पूछा गया था कि क्या यह सही है कि संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी पिछले पंद्रह वर्षों से बिना अध्यक्ष के चल रही हैं? क्या सरकार की कोई योजना है कि बिहार में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसा संस्थान स्थापित किया जाए? क्या विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग खोलने का प्रस्ताव है? सरकार ने जवाब दिया। जवाब छोटा था। सीधा था। और उसी में एक लंबी चुप्पी छिपी हुई थी।
उत्तर में कहा गया कि वर्ष 2017 से बिहार संगीत नाटक अकादमी एवं बिहार ललित कला अकादमी में अध्यक्ष कार्यरत नहीं हैं। चयन प्रक्रिया अधीन है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स्थापित करने की कोई योजना वर्तमान में नहीं है। विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग खोलने की भी कोई योजना नहीं है। और अगर इन उत्तरों से स्थिति स्पष्ट है, तो सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाने की इच्छुक नहीं है।
यह उत्तर सिर्फ एक प्रशासनिक प्रतिक्रिया नहीं है। यह बिहार की सांस्कृतिक स्थिति का आधिकारिक दस्तावेज है।
संस्कृति का संस्थागत खालीपन
बिहार की सांस्कृतिक परंपरा पर कोई विवाद नहीं है। यह वही भूमि है जहां लोकनाट्य की परंपरा रही, जहां भिखारी ठाकुर ने समाज को आईना दिखाया, जहां मैथिली, मगही और भोजपुरी रंगमंच ने अपनी भाषा में प्रतिरोध और प्रेम दोनों को मंच दिया। लेकिन आज जब हम संस्थागत ढांचे को देखते हैं, तो वहां खाली कुर्सियां हैं।

संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी किसी राज्य की सांस्कृतिक धुरी होती हैं। वे कलाकारों को मंच देती हैं, अनुदान देती हैं, प्रशिक्षण देती हैं, नीति बनाती हैं। लेकिन अगर वहां अध्यक्ष ही नहीं है, तो निर्णय कौन ले रहा है? और अगर निर्णय प्रक्रिया “अधीन” है, तो यह अधीनता कितने वर्षों तक चलेगी? 2017 से 2026। नौ साल। एक पीढ़ी कॉलेज से निकलकर काम करने लगी, लेकिन राज्य की अकादमियों में नेतृत्व नहीं आया।
नाट्य विद्यालय की अनुपस्थिति
जब पूछा गया कि क्या बिहार में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसा संस्थान खोलने की योजना है, तो जवाब था—नहीं। यह “नहीं” सिर्फ एक शब्द नहीं है। यह उन हजारों युवाओं के लिए संकेत है जो रंगमंच में करियर बनाना चाहते हैं।
दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय है। कुछ अन्य राज्यों में भी राज्य स्तरीय नाट्य संस्थान हैं। लेकिन बिहार, जो सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध है, वहां कोई ठोस योजना नहीं है। इसका अर्थ है कि जो युवा रंगमंच सीखना चाहते हैं, उन्हें राज्य से बाहर जाना होगा। और जो बाहर नहीं जा सकते, वे शौक तक सीमित रहेंगे। संस्कृति अगर केवल शौक बनकर रह जाए, तो वह समाज का नेतृत्व नहीं कर पाती।
विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग का अभाव
सरकार ने स्पष्ट कहा कि विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग खोलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। इसका मतलब यह है कि अकादमिक स्तर पर रंगमंच को कोई प्राथमिकता नहीं दी जा रही।
जब शिक्षा नीति में कला और संस्कृति की बात होती है, तब अक्सर यह माना जाता है कि यह “अतिरिक्त” है। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज बिना सांस्कृतिक विमर्श के आगे बढ़ सकता है? क्या कला सिर्फ उत्सवों के लिए है, या वह लोकतंत्र का भी हिस्सा है?

विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग का मतलब सिर्फ अभिनय नहीं है। यह समाजशास्त्र, राजनीति, इतिहास और साहित्य को मंच पर समझने का माध्यम है। अगर यह माध्यम ही अनुपस्थित है, तो विमर्श का एक बड़ा दरवाजा बंद हो जाता है।
सरकार ने कहा कि चयन प्रक्रिया अधीन है। यह वाक्य भारतीय प्रशासनिक शब्दावली में अक्सर इस्तेमाल होता है। लेकिन इसका कोई समय-सीमा नहीं होती। अधीन कब तक? एक वर्ष? पांच वर्ष? एक दशक?
संस्कृति में नेतृत्व का खालीपन केवल पद का खाली होना नहीं है। यह दिशा का अभाव है। बिना अध्यक्ष के अकादमियां कार्यरत हैं, लेकिन क्या वे सक्रिय हैं? क्या कलाकारों को अनुदान मिल रहा है? क्या नए कार्यक्रम बन रहे हैं? क्या ग्रामीण कलाकारों तक पहुंच है?
जब जवाब सिर्फ प्रशासनिक हो और दृष्टि अनुपस्थित हो, तो संस्कृति धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाती है।
संस्कृति और राजनीति का रिश्ता
यह भी सच है कि संस्कृति और राजनीति का रिश्ता जटिल होता है। अक्सर सरकारें सांस्कृतिक संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर सावधान रहती हैं। लेकिन सावधानी और स्थिरता में फर्क होता है। अगर वर्षों तक नियुक्ति न हो, तो यह सावधानी नहीं, उपेक्षा लगने लगती है।
बिहार में राजनीतिक बहसें तीखी होती हैं। चुनावी रैलियां बड़ी होती हैं। लेकिन जब सांस्कृतिक संस्थानों की बात आती है, तो बहस ठंडी पड़ जाती है। शायद इसलिए कि संस्कृति तुरंत वोट में नहीं बदलती। लेकिन दीर्घकाल में वही समाज की दिशा तय करती है।
ग्रामीण कलाकारों पर सरकार की चुप्पी

राज्य की अकादमियों का काम केवल राजधानी में कार्यक्रम करना नहीं है। उन्हें जिलों तक जाना चाहिए। लोक कलाकारों को मंच देना चाहिए। लेकिन जब नेतृत्व नहीं है, तो पहल भी नहीं होती। कई लोक कलाकार आज भी निजी संसाधनों से कार्यक्रम करते हैं। सरकारी सहायता के लिए आवेदन करते हैं, और महीनों प्रतीक्षा करते हैं। यदि अकादमियां सक्रिय होतीं, तो यह स्थिति अलग हो सकती थी।
सरकार कहती है कि इस प्रकार की कोई योजना वर्तमान में नहीं है। यह कथन नीति का बयान है। लेकिन यह भी बताता है कि प्राथमिकता क्या है। जब बजट में सड़क, पुल और भवनों के लिए बड़ी राशि होती है, तो संस्कृति का हिस्सा अक्सर छोटा होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास केवल भौतिक ढांचे से मापा जाएगा? या समाज की सांस्कृतिक जीवंतता भी उसका हिस्सा है?
अगर राज्य की दो प्रमुख सांस्कृतिक अकादमियां वर्षों से बिना अध्यक्ष के चल रही हैं, और नाट्य शिक्षा को लेकर कोई नई योजना नहीं है, तो इसका मतलब क्या है? क्या संस्कृति स्वाभाविक रूप से चलती रहेगी? या उसे दिशा देने की जरूरत है?
लोकतंत्र केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व से नहीं चलता। वह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से भी चलता है। जब मंच खाली होता है, तो संवाद कम हो जाता है। और जब संवाद कम होता है, तो समाज में असहमति के स्वर भी कमजोर पड़ जाते हैं।
इन सवालों का जवाब कब देगी सरकार?
विधान परिषद में पूछा गया सवाल खत्म हो गया। उत्तर रिकॉर्ड में दर्ज हो गया। फाइल बंद हो गई। लेकिन सवाल अभी भी खुला है। क्या बिहार अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल अतीत की कहानी बनाकर छोड़ देगा? या वह संस्थागत ढांचे को मजबूत करेगा? क्या अकादमियों में नेतृत्व आएगा? क्या विश्वविद्यालयों में नाट्य विभाग खुलेंगे? क्या युवा कलाकारों को राज्य में ही अवसर मिलेगा?
संस्कृति का संकट अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे चुप्पी में बदलता है। और अभी, बिहार में मंच पर रोशनी कम है।





