“आशा नहीं रही, केवल काम की मशीन बन गई हैं आशा वर्कर!”

“दीदी, कभी-कभी लगता है कि मर जाऊं, शायद तब सरकार को याद आए कि हम ज़िंदा थे।”

ये शब्द हैं पूर्णिया जिले के धमदाहा ब्लॉक की आशा कार्यकर्ता रेखा देवी के। बीते 10 महीनों से मानदेय नहीं मिला। रोज़ 20 से ज़्यादा घरों में जाकर गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन करती हैं, बच्चों को टीकाकरण केंद्र तक लाती हैं, कोविड के समय घर-घर जाकर लोगों की जांच की, और अब फिर से मलेरिया और डेंगू के केस बढ़ने पर डोर-टू-डोर सर्वे कर रही हैं। लेकिन उनका अपना जीवन एक अनदेखा, अनसुनापन और अत्याचार का दस्तावेज़ बन चुका है।

रेखा कहती हैं, “आशा हैं, पर खुद के लिए कोई उम्मीद नहीं बची”। उनकी आंखें भी उतनी ही थकी हुई हैं जितनी उनकी चप्पलें।

आशा वर्कर: ज़मीन की रीढ़, लेकिन व्यवस्था की पीठ पीछे

बिहार में 1.07 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ता (स्रोत: NHM Bihar, 2023) हैं जो भारत सरकार की सबसे बुनियादी स्वास्थ्य योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर लागू करती हैं। इनका चयन उनके गांवों से होता है और इन्हें ‘स्वयंसेवक’ कहा जाता है। लेकिन काम ऐसा कि सरकार की 18 से ज़्यादा योजनाओं की ज़िम्मेदारी इन्हीं के कंधे पर डाल दी गई है — वो भी बिना तयशुदा वेतन के।

वे क्या-क्या काम करती हैं:

  • गर्भवती महिलाओं की पहचान और ANC चेकअप
  • बच्चों का टीकाकरण
  • परिवार नियोजन प्रचार
  • डोर-टू-डोर मलेरिया/डेंगू सर्वे
  • मातृत्व सुरक्षा योजना
  • कोविड टीकाकरण और जांच
  • स्वास्थ्य कैंप का आयोजन
  • सरकारी अस्पताल में प्रसव की व्यवस्था

एक तरह से देखा जाए, तो अगर गांव की स्वास्थ्य सेवा की कोई ‘रीढ़’ है, तो वह आशा वर्कर ही हैं। लेकिन उनके साथ व्यवहार ऐसा होता है जैसे वो सरकारी मशीन की कोई गुमनाम पुर्ज़ी हों।

बिना वेतन, बिना सम्मान — कैसे ज़िंदा हैं ये महिलाएं?

शाहीन खातून, जो कटिहार के कोढ़ा ब्लॉक में काम करती हैं, बताती हैं, “हमसे मोबाइल ऐप पर डेटा फीड करवाते हैं, लेकिन फ़ोन रिचार्ज तक का पैसा नहीं देते। कुछ महीनों तक तो पति ने मदद की, अब वो भी परेशान हो गया है। कभी-कभी महिला मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए अपने पैसे से ऑटो करवाना पड़ता है।”

मानदेय की स्थिति क्या है?

  • आशा वर्कर को हर कार्य के लिए प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
  • यह राशि ₹500 से ₹2000 तक होती है — वो भी तब, जब सब कुछ समय पर रिपोर्ट हो।
  • कई बार यह भी नहीं मिलता, क्योंकि ऐप में तकनीकी दिक्कत आ जाती है या डेटा ‘अपलोड नहीं हुआ’ दिखा देता है।

2024 में एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के 65% आशा वर्करों को 3 महीने से ज़्यादा समय से कोई मानदेय नहीं मिला था। (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस, मई 2024)

डिजिटल भारत, मगर डेटा वाली दीदी भूखी!

आशा वर्कर से अब सिर्फ फॉर्म भरवाना नहीं, मोबाइल ऐप से रिपोर्ट अपलोड, लाइव लोकेशन भेजना, फोटो लेना और कॉल रिकॉर्ड रखना तक की मांग की जा रही है।

लेकिन 70% आशा वर्करों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं (स्रोत: NHM Bihar internal assessment 2023)। और जिनके पास है, वो भी अपने बच्चों या पति का इस्तेमाल करती हैं। फिर भी उनसे डिजिटल रिपोर्टिंग की उम्मीद की जाती है।

रेखा देवी कहती हैं, “फोन में MB नहीं होता, तो ब्लॉक ऑफिस से गाली सुननी पड़ती है। फिर पैसे नहीं मिलने पर घर में झगड़ा अलग।”

बदलते दौर में भी नहीं बदली हालत

कोविड महामारी के दौरान जब सब लोग घरों में कैद थे, तब ये महिलाएं PPE किट के बिना गांव-गांव जाकर केस ट्रेस कर रही थीं। कितनी की जान चली गई, लेकिन न मुआवज़ा मिला, न ही स्थायी नौकरी का वादा पूरा हुआ।

2021 में प्रधानमंत्री ने कहा था कि आशा वर्कर ‘कोरोना योद्धा’ हैं। लेकिन 2024 में भी उनकी हालत वही है — कम पैसे, ज़्यादा काम, और कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं।

आंदोलन की आवाज़: जब थककर उठ खड़ी होती हैं आशा वर्कर

2023-24 में पूरे बिहार में आशा वर्करों ने 3 बार हड़ताल की। उनका एक ही मुख्य मांग पत्र था:

  1. न्यूनतम ₹18,000 मासिक वेतन
  2. EPF और सामाजिक सुरक्षा की सुविधा
  3. काम का निश्चित समय और पारदर्शी मॉनिटरिंग

लेकिन सरकार ने हर बार ‘स्वयंसेवक’ शब्द का सहारा लेकर इसे टाल दिया।

बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की रिपोर्ट में माना गया है कि 60% से अधिक आशा वर्कर 8 घंटे से ज़्यादा काम करती हैं। लेकिन फिर भी उन्हें ‘अंशकालिक कार्यकर्ता’ की श्रेणी में रखा गया है।

आशा दीदी की बात सरकार के कानों से दूर क्यों?

मुजफ्फरपुर की नीलम देवी तीन बच्चों की मां। दोपहर में सर्वे, शाम को रिपोर्टिंग। जब पैसे नहीं आए तो सब्जी बेचने लगीं। कहती हैं, “काम हमसे मेट्रिक से ऊपर का करवाते हैं, लेकिन इज्ज़त दिहाड़ी मजदूर से भी कम मिलती है।”

गया की रूबी खातून कोविड के समय पूरे गांव में अकेले सर्वे किया। खुद संक्रमित हो गईं। अस्पताल में इलाज के बाद घर लौटीं तो घरवालों ने कहा — अब मत जाओ, लेकिन सिस्टम ने अगले ही दिन नया सर्वे पकड़ा दिया।

सरकारी तंत्र की नाकामी और ज़मीनी ज़रूरत

राज्य सरकार ने 2023 में आशा कार्यकर्ताओं के लिए ₹260 करोड़ का बजट रखा था, लेकिन उसमें से 30% राशि मार्च तक जारी ही नहीं हो पाई (स्रोत: बिहार बजट विश्लेषण रिपोर्ट 2024)।

इसके अलावा आशा फैसिलिटेटरों की संख्या घट रही है, जिससे मॉनिटरिंग भी खराब हो गई है। ज़्यादातर काम काग़ज़ में हो रहा है, ज़मीनी स्तर पर नहीं।

जब ज़मीन की सच्चाई आसमान से टकराए

आशा वर्कर वो नींव हैं जिन पर भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था टिकी है। लेकिन नींव को ही अगर हिला दिया जाए, तो इमारत कितने दिन टिकेगी?

रेखा देवी कहती हैं, “हमसे कहते हैं कि काम सेवा है, लेकिन भूख सेवा नहीं समझती।”

आज अगर बिहार की 1 लाख से ज़्यादा आशा वर्कर चुप हैं, तो इसका मतलब ये नहीं कि वे टूट गई हैं। वे इंतज़ार में हैं — एक ऐसे दिन के, जब सरकार उन्हें सिर्फ ‘दीदी’ नहीं, एक कर्मचारी, एक इंसान, एक योद्धा मानेगी।