बिहार में बढ़ रहे दलित हिंसा पर चुप क्यों है 'विकास पुरुष' की सरकार?

हम दलित हैं. हम कहीं जाते हैं तो नीचे बैठाया जाता है. दूसरे के घरों में अंदर आने नहीं दिया जाता है. वहीं खाने पीने के लिए अलग बर्तन होता है. वहीं दूसरी तरफ़ योजनाओं का लाभ के लिए अगर अफ़सर के पास जाऊं तो वो भी हमसे नहीं मिलते.

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नाजिश महताब
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दलित हिंसा

हरिजन गाथा में कवि नागार्जुन दलितों के साथ हो रहे अत्याचार को देखते हुए लिखते हैं

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“हाल ही में घटित हुआ था वो विराट दुष्कांड/ झोंक दिए गए थे तेरह निरपराध हरिजन सुसज्जित चिता में/ यह पैशाचिक नरमेध पैदा कर गया है/ दहशत जन-जन के मन में इन बूढ़ों की तो नींद ही उड़ गई है तब से/ बाक़ी नहीं बचे हैं पलकों के निशान”

पटना के भवंर पोखर में एक बूढ़ी दलित महिला रहती हैं. सुरक्षा कारणों से हम उनकी पहचान उजागर नहीं कर सकते. जब हमारी टीम उनसे बात कर रही थीं तो वो काफ़ी डर गई. उनकी आंखे नम हो गयीं. हमारे दिलासा देने पर उन्होंने बताया कि “हम दलित हैं. हम पर बहुत तरह का शोषण होता है. हम कहीं जाते हैं तो नीचे बैठाया जाता है. दूसरे के घरों में अंदर आने नहीं दिया जाता है. वहीं खाने पीने के लिए अलग बर्तन होता है. वहीं दूसरी तरफ़ योजनाओं का लाभ के लिए अगर अफ़सर के पास जाऊं तो वो भी हमसे नहीं मिलते. समाज में हमारा बहिष्कार होता है.”

ये कहानी और हालात सिर्फ़ एक इंसान की नहीं है बल्कि इस देश के हर दलित परिवार की कहानी है. आरक्षण पर मुखर होकर बात करने वाले लोग पता नहीं क्यों आज भी इस तरह के जातिगत भेदभाव को नकारते रहते हैं.

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दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में बिहार देश में दूसरे स्थान पर

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के अध्यक्ष ने कहा कि अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में बिहार देश में दूसरे स्थान पर है. बिहार में दलितों पर शोषण कोई नई बात नहीं है. पिछले कई सालों से दलितों पर शोषण होता आ रहा है.

बिहार में हुए 2023 जनगणना के अनुसार बिहार में 19.65% दलित मौजूद हैं. बिहार में दलितों पर अत्याचार के मामले कम नहीं हो रहें हैं. बिहार के अलग-अलग जिलों से लगातार ऐसे मामले सामने आ रहें हैं जहां दलितों पर शोषण की समस्या दिख रही है.हालांकि ये कुछ ही मामले हैं जो मीडिया तक सामने आते हैं वहीं ज़्यादातर मामले तो सामने ही नहीं आते.

केंद्रीय गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा प्रकाशित भारत में अपराध-2022 रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में दलितों के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अत्याचार दर्ज करने वाले आठ राज्य हैं: उत्तर प्रदेश (15,368), राजस्थान (8,952), मध्य प्रदेश (7,733), बिहार (6,509), ओडिशा (2,902), महाराष्ट्र (2,743), आंध्र प्रदेश (2,315) और कर्नाटक (1,977).

जहां बिहार चौथे स्थान पर है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2015 से 2020 तक दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ बलात्कार के मामलों में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 

दलित हिंसा के आकडे

साल 2024 में दलितों के ख़िलाफ़ हुए कई अपराध

बिहार के पटना के हिंदौनी बधार क्षेत्र में दो महादलित नाबालिग लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ बर्बरता से बलात्कार किया गया. इस घटना में गंभीर रूप से घायल एक पीड़िता की मौत हो गई. परिवार के अनुसार, 7 जनवरी 2024 को दोनों लड़कियां रोज़ की तरह ईंधन के लिए गोबर के उपले इकट्ठा करने गई थीं, लेकिन देर शाम तक वो घर नहीं लौटीं.

एक पीड़िता के रिश्तेदार ने बताया कि स्थानीय लोगों ने अगले दिन एक लापता लड़की का शव देखा, जिसके बाद फुलवारी शरीफ पुलिस को सूचित किया गया. उप-विभागीय पुलिस अधिकारी विक्रम सुहाग ने बताया कि सोमवार को दोनों नाबालिग लड़कियां लापता हो गईं और मंगलवार की सुबह फुलवारी शरीफ पुलिस को इसकी सूचना मिली, जिसमें से एक लड़की मृत पाई गई.

 2 जनवरी 2024 को दुखी छापर गांव में किशनवती देवी और सुगंधी देवी नामक दो दलित महिलाओं पर भैसहवा मंदिर परिसर (गोपालगंज) में स्थित हैंडपंप से पानी भरने पर हमला किया गया और उन्हें गालियां दी गई. 

मोतिहारी के पहाड़पुर थाना क्षेत्र में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली सुहाना कुमारी (बदला हुआ नाम) और उसकी दोस्त कोचिंग में पढ़ने गई थी. उसी बीच कोचिंग में घुस कर कुछ लोगों ने छात्राओं के साथ छेड़खानी की. जिसका विरोध करने पर दर्जनों महादलित लड़कियों को पीटा गया. यह घटना 26 जून 2024 की है.

कोचिंग की छात्रा जिसके साथ हिंसा हुई

बिहार दलित एलियंस फोरम के संयोजक धर्मेंद्र कुमार से हमने बात कि तो उन्होंने बताया कि “देखिए ये बिहार ही नहीं पूरे भारत में दलितों पर अत्याचार हो रहा है. जहां देश अमृतमहोत्सव की तैयारी मना रहा है और जो बाबा साहब भीम राव अंबेडकर का सपना था और संविधान में दलितों को जो अधिकार मिला है लेकिन क्या दलितों को न्याय मिल पा रहा है ये खुद में ही बहुत बड़ा सवाल है.”

जाति आधारित अपराधों की नहीं दर्ज की जाती FIR

धर्मेंद्र बताते हैं कि “किसी दलित महिला के साथ अगर घटना घटती है तो मामले को पहले तो रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता है. अगर हिम्मत करके महिला थाना पहुंचती है तो थाना में उनके साथ सम्मानजनक बात नहीं की जाती है और उनके मनोबल को तोड़ा जाता है. प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती है और अगर प्राथमिकी दर्ज भी की जाती है तो सही धारा नहीं लगाई जाती है. ये बहुत बड़ा वजह है जिसके वजह से अपराधी को बेल मिल जाता है.”

समस्तीपुर के मोरवा का वाक्या है जहां एक 11 साल की दलित बच्ची रूबी कुमारी (बदला हुआ नाम) गांव में रहती है. एक दिन गांव में सामाजिक कार्यक्रम चल रहा होता था. वहां अपराधी बच्ची को अगवा कर ले जाते हैं सामूहिक बलात्कार होता और और हत्या कर दी जाती है. इस मामले में प्राथमिकी भी दर्ज नहीं की जाती है.

फिर अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग के पहल पर केस दर्ज हुआ और कुछ गिरफ्तारी भी हुई. लेकिन उस धारा में नहीं जिसमें होना चाहिए था.

बिहार में दलितों पर अत्याचार के मामले बहुत हैं. कुछ सामने आते तो कुछ करप्शन के तरह छुपे रह जाते हैं. दलित महिलाओं के साथ बलात्कार, बच्चियों के साथ बलात्कार, उत्पीड़न के वजह से दलितों का आत्महत्या और सरकार के पास इन सारी चीज़ों को लेकर अलग से कोई आंकड़ा भी नहीं है.

इन सारे क्रूर मामले देख कर छोटी छोटी बच्चियां स्कूल जाने से डरती हैं और कहीं न कहीं दलित समाज डर के कारण आगे नहीं बढ़ पाता है क्योंकि कहीं से भी उन्हें सहायता नहीं मिलती है. सरकार को चाहिए को दलितों पर अलग से शोध करके आंकड़ों को देखे और ज़मीनीस्तर पर जाकर दलितों की समस्याओं को दूर करे.