अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर: कागज़ पर स्वास्थ्य, ज़मीन पर खाली भवन

अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर का उद्देश्य था कि शहर के लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उनके नजदीक ही मिल जाएं। जो 9 भवन स्वास्थ्य विभाग को मिले हैं, उनकी स्थिति ही इस योजना की सबसे बड़ी बाधा बन गई है।

अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर का उद्देश्य था कि शहर के लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उनके नजदीक ही मिल जाएं। जो 9 भवन स्वास्थ्य विभाग को मिले हैं, उनकी स्थिति ही इस योजना की सबसे बड़ी बाधा बन गई है।

पटना शहर में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए एक योजना बनाई गई थी—अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर। लक्ष्य साफ था कि शहर के 21 जनसुविधा केंद्रों को अपग्रेड कर ऐसे केंद्र बनाए जाएं, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलब्ध हों। यह योजना स्मार्ट सिटी मिशन के तहत दिसंबर 2024 से शुरू होनी थी। लेकिन 2026 तक आते-आते यह योजना अपने ही ढांचे में उलझ कर रह गई है।

21 केंद्रों में से सिर्फ 9 भवन ही उपलब्ध हो पाए हैं, और जो मिले हैं, उनकी स्थिति जर्जर है। सबसे गंभीर बात यह है कि अब तक एक भी केंद्र पूरी तरह चालू नहीं हो पाया है। यह स्थिति सिर्फ एक परियोजना की विफलता नहीं है, बल्कि यह शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकताओं और प्रशासनिक क्षमता पर सीधा सवाल है।

योजना की मंशा और जमीनी सच्चाई के बीच दूरी

अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर का उद्देश्य था कि शहर के लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उनके नजदीक ही मिल जाएं। इसमें सामान्य जांच, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं, टीकाकरण, और बेसिक दवाओं की उपलब्धता शामिल होनी थी। लेकिन योजना जिस गति से आगे बढ़नी चाहिए थी, वैसा नहीं हुआ। दिसंबर 2024 की समय सीमा बीत गई, लेकिन जमीन पर कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी। 2026 तक स्थिति यह है कि जिन भवनों में ये केंद्र बनने थे, वे खुद ही उपयोग के लायक नहीं हैं।

यहां सबसे बड़ा अंतर “योजना” और “क्रियान्वयन” के बीच दिखाई देता है। कागज़ पर जो मॉडल तैयार किया गया, वह जमीन पर उतरने से पहले ही कमजोर पड़ गया। जो 9 भवन स्वास्थ्य विभाग को मिले हैं, उनकी स्थिति ही इस योजना की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। इन भवनों की मरम्मत तक नहीं हुई है, और कई जगहों पर ये इतने पुराने और खराब हालत में हैं कि वहां ओपीडी या अन्य स्वास्थ्य सेवाएं शुरू करना संभव नहीं है।

अगर किसी भवन की बुनियादी संरचना ही सुरक्षित नहीं है, तो वहां मरीजों का आना खुद एक जोखिम बन जाता है। स्वास्थ्य केंद्र का उद्देश्य लोगों को सुरक्षा देना होता है, लेकिन यहां स्थिति उलटी हो गई है। यह समस्या सिर्फ भवनों की नहीं है, बल्कि यह योजना की प्रारंभिक तैयारी की कमी को भी दर्शाती है। जब भवनों की स्थिति का आकलन ही सही तरीके से नहीं किया गया, तो पूरी परियोजना की नींव ही कमजोर हो गई।

इस योजना में कई एजेंसियां शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है, जबकि स्मार्ट सिटी मिशन के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना नगर निगम और अन्य एजेंसियों की जिम्मेदारी है।

लेकिन जब जिम्मेदारियां अलग-अलग हिस्सों में बंट जाती हैं, तो समन्वय की समस्या सामने आती है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि उनका काम सिर्फ सेवाएं देना है, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना दूसरी एजेंसियों की जिम्मेदारी है। इस तरह की व्यवस्था में अक्सर यह होता है कि कोई भी एजेंसी पूरी जिम्मेदारी नहीं लेती। परिणाम यह होता है कि परियोजना आगे नहीं बढ़ती, और हर विभाग अपनी सीमा बताकर पीछे हट जाता है।

डॉक्टरों की कमी नहीं, फिर भी सेवा शुरू नहीं

इस पूरी स्थिति का एक दिलचस्प पहलू यह है कि इन केंद्रों के लिए डॉक्टरों की नियुक्ति पहले ही कर दी गई थी। यानी मानव संसाधन की कमी यहां मुख्य समस्या नहीं है। लेकिन जब भवन तैयार नहीं हैं, तो डॉक्टरों की नियुक्ति भी बेकार हो जाती है। जानकारी के अनुसार, इन नियुक्त डॉक्टरों में से आधे से अधिक ने अपनी नौकरी छोड़ दी है। यह स्थिति बताती है कि सिर्फ नियुक्ति कर देना पर्याप्त नहीं है। अगर कार्यस्थल ही उपलब्ध नहीं होगा, तो कोई भी पेशेवर लंबे समय तक वहां टिक नहीं पाएगा।

अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर का मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जाता है। इसका उद्देश्य शहरी गरीब और मध्यम वर्ग को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराना है। लेकिन पटना में इस मॉडल का क्रियान्वयन यह दिखाता है कि सिर्फ योजना बना लेना पर्याप्त नहीं है। शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही दबाव में हैं—सरकारी अस्पतालों में भीड़, निजी अस्पतालों की महंगाई, और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी।

इस स्थिति में अगर नई योजनाएं भी जमीन पर नहीं उतरतीं, तो पूरा सिस्टम और कमजोर हो जाता है।

स्मार्ट सिटी बनाम बेसिक जरूरतें

यह योजना स्मार्ट सिटी मिशन के तहत लाई गई थी। लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ शहर को “स्मार्ट” बनाने की बात होती है, दूसरी तरफ बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जरूरी भवन तक तैयार नहीं हो पाते। स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ डिजिटल सेवाएं या आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होता। इसका असली मतलब यह होता है कि शहर अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं बेहतर तरीके से दे सके।

अगर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सेवा ही उपलब्ध नहीं है, तो “स्मार्ट” शब्द सिर्फ एक लेबल बन कर रह जाता है।

प्रशासनिक क्षमता और निगरानी का सवाल

इस पूरी परियोजना की विफलता प्रशासनिक क्षमता पर भी सवाल उठाती है। क्या परियोजना शुरू करने से पहले पर्याप्त तैयारी की गई थी? क्या समय-सीमा और संसाधनों का सही आकलन किया गया था? क्या निगरानी तंत्र प्रभावी था? अगर इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो यह सिर्फ एक योजना की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की समस्या है। किसी भी परियोजना के लिए सिर्फ बजट और घोषणा पर्याप्त नहीं होती। उसके लिए स्पष्ट योजना, मजबूत निगरानी और जवाबदेही जरूरी होती है।

इस योजना के ठप रहने का सीधा असर शहर के लोगों पर पड़ता है। जिन इलाकों में ये केंद्र बनने थे, वहां के लोगों को अभी भी दूर के अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे दो समस्याएं पैदा होती हैं। एक, सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ता है। दूसरा, लोगों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है, जहां इलाज महंगा होता है।

यानी एक ऐसी योजना, जो स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने के लिए बनाई गई थी, उसके न होने से असमानता और बढ़ जाती है।

क्या यह सिर्फ देरी है या विफलता?

यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या इस योजना को सिर्फ “देरी” के रूप में देखा जाए, या यह एक “विफलता” है। अगर भवनों की स्थिति, डॉक्टरों के इस्तीफे और अब तक एक भी केंद्र के शुरू न होने को देखा जाए, तो यह सिर्फ देरी नहीं लगती। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां योजना धीरे-धीरे अपनी दिशा खो चुकी है। इस स्थिति को सुधारने के लिए सबसे पहले इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान देना होगा। भवनों की मरम्मत और नए निर्माण को प्राथमिकता देनी होगी।

इसके साथ ही, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत करना होगा, ताकि जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण हो सके। मानव संसाधन को भी स्थिर रखने के लिए कार्यस्थल और सुविधाएं सुनिश्चित करनी होंगी।

पटना जैसे शहर में, जहां जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है, क्या ऐसी योजनाएं सिर्फ कागज़ तक सीमित रह जाएंगी? या फिर प्रशासन इस स्थिति से सीख लेकर ऐसी व्यवस्था बनाएगा, जहां योजना सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि सेवा बन सके? क्योंकि स्वास्थ्य सिर्फ एक सेक्टर नहीं है। यह शहर की बुनियादी पहचान है—और जब यह पहचान कमजोर होती है, तो पूरा शहर उसके साथ कमजोर हो जाता है।