राज्य में रोज़ लगभग 2.5 लाख सिलेंडरों की सप्लाई होती है। अभी कमर्शियल सप्लाई रोक दी गई है। तर्क यह है कि बिहार में गैस पहले घरेलू स्तर पर सुनिश्चित करना है।
सीवान के बड़हरिया में रघुनाथ सिंह के घर में आज तीसरा दिन है। रसोई में खाली सिलेंडर उल्टा रखा है, जैसे किसी ने हार मानकर उसे दीवार से टिकाया हो। पत्नी लकड़ी के चूल्हे पर दाल चढ़ा रही हैं। धुआँ आँख में जाता है तो वह कहती हैं—“बुकिंग तो कर दिए हैं, लेकिन कोड नहीं आया।”

यह “कोड” इस समय बिहार की सबसे बड़ी रसोई-राजनीति है। बुकिंग के बाद जो डीओसी (डिलीवरी ऑथराइजेशन कोड) आता है, वही तय करता है कि गैस आपके घर पहुँचेगी या नहीं। और यह कोड अब 20–25 दिन बाद आ रहा है। उधर अखबार की सुर्खी कहती है—कमर्शियल गैस सप्लाई अस्थायी तौर पर रोकी गई है ताकि घरेलू सिलेंडर को प्राथमिकता दी जा सके। कंपनियाँ कहती हैं—घरेलू गैस की कोई कमी नहीं है। प्रशासन कहता है—मॉनिटरिंग शुरू हो गई है। लेकिन रघुनाथ सिंह की रसोई में जो धुआँ है, वह इन बयानों से हल्का नहीं होता।
कमर्शियल रोकी, घरेलू बचाई — पर संतुलन कहाँ है?
राज्य में रोज़ लगभग 2.5 लाख सिलेंडरों की सप्लाई होती है। इनमें करीब 12,500 कमर्शियल सिलेंडर हैं, जो होटल, ढाबा, मिठाई दुकानों और छोटे कारोबारों तक जाते हैं। अभी कमर्शियल सप्लाई रोक दी गई है। तर्क यह है कि बिहार में गैस पहले घरेलू स्तर पर सुनिश्चित करना है।
लेकिन यह तर्क आधा सच है।
कमर्शियल और घरेलू सप्लाई अलग-अलग दुनिया नहीं हैं। दोनों का वितरण ढांचा साझा है—गोदाम, ट्रक, एजेंसी नेटवर्क। जब आप एक हिस्से को रोकते हैं, तो उसका दबाव दूसरे हिस्से पर आता है। अगर कमर्शियल सिलेंडर नहीं पहुँचेंगे, तो होटल वाले कैसे चलेंगे? वे बंद होंगे या वैकल्पिक रास्ता खोजेंगे। और जब वे बंद होंगे, तो रोज़गार पर असर पड़ेगा। यह संतुलन की राजनीति है। और इस बार संतुलन बिगड़ा हुआ है।
‘कोई कमी नहीं’ — यह वाक्य किसके लिए है?
तेल कंपनियों का बयान है—घरेलू गैस की कोई कमी नहीं है। एजेंसियों को निर्देश है कि बुकिंग के आधार पर डिलीवरी करें। प्रशासन मॉनिटरिंग कर रहा है। लेकिन अगर बुकिंग के 25 दिन बाद कोड आ रहा है, तो यह कमी नहीं तो क्या है? कमी केवल गोदाम में खालीपन से नहीं मापी जाती। कमी तब भी होती है जब सप्लाई चक्र टूट जाए। जब 5–6 दिन की डिलीवरी 20 दिन पर पहुँच जाए। जब एजेंसी पर 1500 सिलेंडरों का बैकलॉग खड़ा हो जाए।
कमी का मतलब यह नहीं कि गैस देश में खत्म हो गई है। कमी का मतलब है—सिस्टम आपकी ज़रूरत के समय साथ नहीं है।
उज्ज्वला की असली परीक्षा
बिहार में उज्ज्वला योजना के तहत लाखों कनेक्शन दिए गए। यह राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धि के रूप में पेश किया गया। लेकिन हर योजना की असली परीक्षा वितरण में होती है। कनेक्शन देना आसान है, रिफिल की नियमितता सुनिश्चित करना कठिन है।

गाँवों में बहुत से परिवार एक ही सिलेंडर पर निर्भर हैं। उनके पास बैकअप नहीं होता। 20 दिन की देरी का मतलब है—वापस लकड़ी, कोयला, गोबर। उज्ज्वला की तस्वीर में धुआँ नहीं दिखता था। अब वह धुआँ फिर लौट रहा है।
एजेंसियों का तर्क है—होली के बाद मांग बढ़ गई। प्लांट स्तर पर रिफिलिंग प्रभावित हुई। ट्रांसपोर्ट देरी हुई। छुट्टियों के कारण चक्र बिगड़ा। सवाल है—क्या हर त्योहार के बाद सिस्टम चौंक जाएगा? अगर राज्य में रोज़ 2.5 लाख सिलेंडर की खपत है, तो क्या मांग का डेटा अचानक आता है? क्या यह अनुमानित नहीं है? अगर वैश्विक बाजार में तनाव है, तो क्या वैकल्पिक भंडारण योजना नहीं होनी चाहिए?
संकट का मतलब यह नहीं कि समस्या अचानक आ गई। संकट का मतलब है—तैयारी कम थी।
युद्ध का असर या स्थानीय अव्यवस्था?
ईरान–इज़राइल तनाव से वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस जाता है। लेकिन बिहार में गैस की लाइन का सीधा संबंध उस युद्ध से है—यह अभी तक आधिकारिक रूप से नहीं कहा गया। फिर भी, जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार डगमगाता है, तो कंपनियाँ घरेलू वितरण को प्राथमिकता देती हैं। कमर्शियल पर रोक इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

लेकिन सवाल यह है—क्या यह रणनीति समय पर और पारदर्शी तरीके से बताई गई? अगर जनता को पहले से बताया जाता कि सप्लाई चक्र धीमा होगा, तो अफवाहें कम होतीं।
पटना जिला प्रशासन ने मॉनिटरिंग शुरू की है। एजेंसियों और गोदामों का निरीक्षण हो रहा है। कालाबाजारी रोकने के निर्देश दिए गए हैं। यह जरूरी है। लेकिन यह प्रतिक्रिया है, तैयारी नहीं। जब लाइन लग गई, तब मॉनिटरिंग आई। जब कोड 25 दिन पर पहुँचा, तब निरीक्षण शुरू हुआ।
कौन जिम्मेदार है?
यह सवाल असुविधाजनक है। क्या तेल कंपनियाँ जिम्मेदार हैं? क्या राज्य प्रशासन की तैयारी कम थी? क्या वितरण नेटवर्क का विस्तार मांग के अनुरूप नहीं हुआ? या यह सब मिलकर एक ढीली संरचना का परिणाम है? जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, अगला त्योहार फिर यही तस्वीर दोहराएगा।
गैस अब केवल ईंधन नहीं है। यह घरेलू अधिकार का हिस्सा बन चुकी है। उज्ज्वला के बाद यह राज्य की सामाजिक नीति का हिस्सा है। जब अधिकार कोड पर निर्भर हो जाए, और कोड देरी से आए, तो अधिकार प्रतीक्षा में बदल जाता है।





