क्या बिहार एसआईआर में केवल ‘अवैध प्रवासियों’ के नाम काटे गए हैं?

बिहार चुनाव में एक बार फिर से घुसपैठिये और अवैध प्रवासियों का मुद्दा उठा है। देश के गृहमंत्री अमित शाह ने लगातार चुनावी रैलियों में घुसपैठियों की बात की। उन्होंने ये बयान दिया कि बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में उन्हीं लोगों के नाम काटे गए हैं जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।
47 लाख नाम, 202 सीटें और एक पैटर्न: क्या SIR ने बिहार चुनाव नतीजा तय किया?

बिहार चुनाव में एक बार फिर से घुसपैठिये और अवैध प्रवासियों का मुद्दा उठा है। देश के गृहमंत्री अमित शाह ने लगातार चुनावी रैलियों में घुसपैठियों की बात की। उन्होंने ये बयान दिया कि बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में उन्हीं लोगों के नाम काटे गए हैं जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।

बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर अभी तक निर्वाचन आयोग ने कोई भी पुख्ता जानकारी नहीं दी है। ना ही 47 लाख मतदाताओं के वोट काटने की वजह बताई है। लेकिन देश के गृहमंत्री अमित शाह इसे अवैध प्रवासियों और घुसपैठियों के ख़िलाफ़ एक मुहीम का नाम दे रहे हैं। 30 अक्टूबर को बिहार के नालंदा जिले में रैली को सम्बोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि, “राहुल गांधी ने बिहार में घुसपैठिया बचाओ रैली की थी। आओ बताइये, क्या अवैध प्रवासियों का नाम बिहार की मतदाता सूची से हटाना चाहिए या नहीं।”

बिहार चुनाव के दौरान गृहमंत्री अमित शाह
बिहार चुनाव के दौरान गृहमंत्री अमित शाह

अमित शाह ने विपक्ष द्वारा मतदाता अधिकार यात्रा को घुसपैठिया बचाओ यात्रा की संज्ञा भी दे दी। लेकिन उन्होंने निर्वाचन आयोग से आंकड़े पब्लिक करने की दरख्वास्त नहीं की जिससे ये पता चल सके कि क्या बिहार में 47 लाख मतदाता अवैध थें।

अगर बिहार में घुसपैठिये हैं, तो गृह मंत्रालय क्या कर रहा है?

बिहार चुनाव में भाजपा लगातार ‘बांगलादेशी-घुसपैठिए’ जैसे शब्द इस्तेमाल करते आयी है। लेकिन आज तक भाजपा इस पर कोई ठोस आंकड़ा नहीं दे पायी है। पिछले 20 सालों से बिहार में नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन में मुख्यमंत्री रहे हैं। पिछले 11 सालों से केंद्र में भी भाजपा के नेतृत्व की एनडीए सरकार मौजूद है। साल 2019 से अमित शाह देश के गृहमंत्री बने हुए हैं। तो अगर बिहार में अवैध विदेशी मौजूद हैं, तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? क्या ये ज़िम्मेदारी विपक्ष की है? या नीतीश कुमार की है?

क्या देश के गृहमंत्री ने घुसपैठियों की बात पर कभी नीतीश कुमार की सरकार से सवाल किया है? क्या इसको लेकर राज्य सरकार के पास कोई भी आंकड़ा मौजूद है?

बिहार एसआईआर को लेकर भी भाजपा अपना बयान ऐसे बदलती है जैसे नोटबंदी के समय बदला करती थी। कभी नोटबंदी काला धन के ख़िलाफ़ लड़ाई थी, कभी नकली नोटों के ख़िलाफ़ तो कभी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़। लेकिन आज तक नोटबंदी का क्या फ़ायदा हुआ ये ‘राज़’ किसी को पता नहीं चल सका।

ठीक वैसे ही, एसआईआर की वजह क्या है, ये भी एक ‘राज़’ है। अगर एसआईआर की वजह विदेशियों को चिन्हित करना है तो क्या केंद्र सरकार ये मान रही है कि उत्तर प्रदेश के ‘योगी राज’ में भी विदेशी हैं। क्योंकि निर्वाचन आयोग यूपी में भी एसआईआर करने जा रही है।

बिहार एसआईआर के आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं

बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पूरा हो चुका है। चुनाव आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया ‘मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी’ बनाने के लिए की गई थी। लेकिन जब नतीजे आए, तो सवाल उठने लगे आखिर ऐसा क्या हुआ कि 47 लाख वोटर गायब हो गए? और इन गायब नामों के पीछे की कहानी कौन बताएगा?

6% वोट कम, लेकिन कारण अघोषित

चुनाव आयोग ने खुद स्वीकार किया कि बिहार में मतदाताओं की संख्या में करीब 6% की कमी आई है। लेकिन यह कमी कैसे आई- इसका जवाब अभी तक नहीं दिया गया। 24 जून को आयोग ने कहा था कि चुनाव से ठीक पहले SIR कराने का एक बड़ा कारण था ‘मतदाता सूची में विदेशियों का होना।’ यानी आयोग के मुताबिक, बिहार की वोटर लिस्ट में कुछ विदेशी मतदाता छिपे बैठे थे।

पर बड़ा सवाल यह है, आखिर कितने विदेशी मतदाता पाए गए? और किस जिले में, किस आधार पर, उनके नाम हटाए गए?

आश्चर्यजनक रूप से, आयोग ने अब तक इन सवालों का कोई भी डेटा जारी नहीं किया है।

बिहार एसआईआर की घोषणा करते मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार

अमित शाह बोले — ‘जो भारतीय हैं, उन्हें डरने की ज़रूरत नहीं’

बुधवार शाम न्यूज़18 को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने SIR प्रक्रिया को सही ठहराते हुए कहा —

“जिन लोगों के नाम हटाए गए, वो इसलिए क्योंकि वे यह साबित नहीं कर पाए कि वे भारतीय नागरिक हैं। अगर वे भारतीय होते, तो सबूत दे देते। जिनके नाम हटे, उनके ख़िलाफ़ सिर्फ़ तीन अपीलें आईं। इसका मतलब है कि जिनके नाम हटे, वे भारतीय नहीं थे।”

यानी सरकार के हिसाब से जो चुप हैं, वही विदेशी हैं। क्योंकि अपील न करना अब नागरिकता का सबूत बन गया है।

65 लाख नाम हटाए गए — पर आंकड़े छिपे हुए

चुनाव आयोग ने 1 अगस्त को जब मसौदा मतदाता सूची (ड्राफ्ट रोल) जारी की, तो उसमें कुल 65 लाख हटाए गए नाम दर्ज थे। यहां तक कि आयोग ने दैनिक प्रेस विज्ञप्तियां भी जारी की थीं जिनमें यह बताया गया कि कितने मतदाता मृत मिले, स्थानांतरित हुए या डुप्लीकेट पाए गए।

इन 65 लाख हटाए गए नामों में से —

  • 22 लाख को मृत घोषित कर दिया गया,
  • 36 लाख को स्थायी रूप से स्थानांतरित बताया गया,
  • और 7 लाख के नाम एक से अधिक जगह दर्ज थे।

यानी चुनाव आयोग के पास हर हटाए गए नाम की वजह थी, लेकिन 47 लाख वोटों की वजह बताने में अब चुप्पी है।