खुलासा: कैसे फेसबुक बिहार चुनाव के उम्मीदवारों को ‘फंड’ कर रहा है!

बिहार में चल रहे विधानसभा चुनाव के दौरान हुई स्टडी में ये पाया गया कि चुनावी मैदान में उतरे कई उम्मीदवारों को 'मेटा' के मॉनेटाईज़ेशन के ज़रिये पैसे मिल रहे हैं। लेकिन इन पैसों का कोई भी हिसाब निर्वाचन आयोग के पास नहीं है। साथ ही फेसबुक के पॉलिसी के अनुसार, कोई भी चुनावी उम्मीदवार अपने पेज को मॉनेटाईज़ नहीं कर सकता है। पूरी स्टडी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
खुलासा: कैसे फेसबुक बिहार चुनाव के उम्मीदवारों को 'फंड' कर रहा है!

बिहार में चल रहे विधानसभा चुनाव के दौरान हुई स्टडी में ये पाया गया कि चुनावी मैदान में उतरे कई उम्मीदवारों को ‘मेटा’ के मॉनेटाईज़ेशन के ज़रिये पैसे मिल रहे हैं। लेकिन इन पैसों का कोई भी हिसाब निर्वाचन आयोग के पास नहीं है। साथ ही फेसबुक के पॉलिसी के अनुसार, कोई भी चुनावी उम्मीदवार अपने पेज को मॉनेटाईज़ नहीं कर सकता है। पूरी स्टडी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

डिजिटल युग में राजनीति और सोशल मीडिया का गठजोड़ अब कोई नई बात नहीं रही। लेकिन डेमोक्रेटिक चरखा और नेशनल एलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट, बिहार की यह रिपोर्ट—”From Reels to Revenue, from Views to Votes”—इस संबंध के एक खतरनाक पहलू को उजागर करती है: जब सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, जैसे फेसबुक, खुद चुनावी उम्मीदवारों को भुगतान करने लगें।

रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पहले चरण के 16% उम्मीदवारों के सोशल मीडिया अकाउंट्स मॉनिटाइज्ड हैं—यानी वे अपने रील्स और वीडियो से पैसे कमा रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 90% उम्मीदवारों ने अपने चुनावी हलफनामे में इस आय का जिक्र तक नहीं किया है।

बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी

राजनीति का नया चेहरा: इन्फ्लुएंसर उम्मीदवार

रिपोर्ट में तीन प्रकार के “इन्फ्लुएंसर-पॉलिटिशियन” की पहचान की गई है—

  1. लोकप्रिय मनोरंजन हस्तियां: जैसे खेसारी लाल यादव (RJD) और मैथिली ठाकुर (BJP), जो पहले से सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध थे और अब राजनीति में कदम रख रहे हैं।
  2. सोशल मीडिया स्टार लेकिन असफल राजनेता: जैसे पुष्पम प्रिया (Plurals Party) और मनीष कश्यप (Jan Suraaj)।
  3. वर्तमान जनप्रतिनिधि: जैसे कृष्ण कुमार मंटू (BJP) और प्रेम शंकर यादव (RJD), जो सार्वजनिक पदों पर रहते हुए भी अपने फेसबुक पेज से कमाई कर रहे हैं।

रिपोर्ट कहती है कि इन उम्मीदवारों को चुनावी प्रचार के दौरान भी प्लेटफ़ॉर्म्स से आय मिल रही है—कई मामलों में शायद उतनी ही जितनी वे खर्च कर रहे हैं।

प्लुरलस पार्टी की संस्थापक पुष्पम प्रिया
प्लुरलस पार्टी की संस्थापक पुष्पम प्रिया

नए उम्मीदवार से लेकर भाजपा मंत्री तक इसमें शामिल!

इस नए चलन का सबसे चमकदार उदाहरण हैं भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार खेसारी लाल यादव, जिन्होंने इस बार RJD से चुनाव मैदान में कदम रखा। उनके फेसबुक पर 62 लाख और यूट्यूब पर 1.1 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हैं। रिपोर्ट के अनुसार, खेसारी यादव का फेसबुक पेज 2019 से लगातार Meta के ‘Creator Program’ के तहत मॉनिटाइज्ड है — यानी उनके हर रील पर व्यू के साथ पैसा भी बन रहा है। उन्होंने नामांकन दाखिल करने के बाद भी फेसबुक पर कई राजनीतिक रील्स पोस्ट कीं, जिनमें से कुछ को 10 मिलियन तक व्यूज़ मिले। इससे यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि उन्हें प्रति वीडियो लाखों रुपये की कमाई हुई होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वे अपने प्रचार से ज़्यादा पैसा कमा रहे हैं, और अगर हाँ, तो क्या यह अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी प्लेटफ़ॉर्म द्वारा चुनावी उम्मीदवार को आर्थिक सहयोग नहीं है?

छपरा से राजद उम्मीदवार खेसारी लाल यादव

अगर किसी उम्मीदवार के लिए यह स्थिति चिंताजनक है तो किसी मौजूदा विधायक के लिए यह सीधे कानून का उल्लंघन है। कृष्ण कुमार मंटू, जो बिहार के पूर्व IT मंत्री और वर्तमान BJP प्रत्याशी हैं, का फेसबुक पेज ‘Facebook Subscription’ प्रोग्राम के तहत ₹89 प्रति माह की दर से मॉनिटाइज्ड है। उनके पेज पर सरकारी कार्यक्रमों, परेड और पूजा समारोहों के वीडियो दिखते हैं — जो अक्सर सरकारी संसाधनों से शूट किए जाते हैं। इसका अर्थ है कि सार्वजनिक संसाधनों से तैयार वीडियो अब व्यक्तिगत आय का माध्यम बन गए हैं। लोकतंत्र में यह स्थिति बेहद खतरनाक है, जहां शासन और निजी कमाई की रेखा पूरी तरह धुंधली हो गई है।

लेकिन हर कहानी इतनी साफ़ नहीं है। पुष्पम प्रिया चौधरी, जो लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पढ़ी हैं और बिहार में अपनी Plurals Party के ज़रिए “नई राजनीति” की बात करती हैं, खुद Meta के Creator Program से मॉनिटाइजेशन कर रही हैं। उनके फेसबुक पर लगभग 8.8 लाख फॉलोअर्स हैं और यही प्लेटफ़ॉर्म उनकी पार्टी के घोषणापत्र और नीतिगत पोस्ट का मुख्य माध्यम है। यानी वे अपने राजनीतिक कंटेंट से ही पैसे कमा रही हैं। यह स्थिति प्रत्यक्ष रूप से “हितों का टकराव” है — क्योंकि वही प्लेटफ़ॉर्म जो राजनीतिक विज्ञापनों से कमाई करता है, अब उम्मीदवारों को भी पैसा दे रहा है। इससे न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया को असमान भी बनाता है, जहां बड़े फॉलोअर्स वाले उम्मीदवारों को अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिल रहा है।

मामला केवल पैसे का नहीं, नैतिकता का है

फेसबुक (Meta) की अपनी Partner Monetisation Policy साफ़ कहती है कि राजनीतिक उम्मीदवार और सार्वजनिक पदाधिकारी अपने अकाउंट से कमाई नहीं कर सकते।
लेकिन “व्हाट टू फिक्स” नामक स्वतंत्र तकनीकी अनुसंधान समूह द्वारा एकत्र डेटा दिखाता है कि Meta खुद अपने नियमों का उल्लंघन कर रही है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि

  • कृष्ण कुमार मंटू और प्रेम शंकर यादव जैसे विधायकों के पेज पर “Facebook Subscription” फीचर सक्रिय है, जिससे वे सीधे पैसे कमा रहे हैं।
  • खेसारी लाल यादव के रील्स को लाखों व्यू मिल रहे हैं और हर रील से संभावित रूप से लाखों रुपये की कमाई हो रही है।
  • मैथिली ठाकुर ही एकमात्र उम्मीदवार हैं जिन्होंने अपने हलफनामे में “सोशल मीडिया और ब्रांड एंडोर्समेंट” को आय का स्रोत बताया।

भारत का चुनाव आयोग (ECI) और सर्वोच्च न्यायालय पहले से स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुके हैं कि उम्मीदवारों को अपनी सभी आय के स्रोत और सोशल मीडिया अकाउंट्स घोषित करने होंगे।

  • Representation of People Act, 1951 के तहत, गलत जानकारी देने या जानकारी छिपाने पर छह महीने की सज़ा या जुर्माने का प्रावधान है।
  • फिर भी, रिपोर्ट में पाया गया कि अधिकांश उम्मीदवार न तो अपने फेसबुक पेजों का पूरा विवरण दे रहे हैं और न ही उससे होने वाली आय का।

यह स्थिति न केवल पारदर्शिता की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह चुनाव आयोग की निगरानी व्यवस्था को भी कमजोर करती है।

मंत्री कृष्ण कुमार मंटू का सब्सक्राइबर बैज
मंत्री कृष्ण कुमार मंटू का सब्सक्राइबर बैज

लोकतंत्र पर असर: जब प्लेटफ़ॉर्म बन जाएं ‘फंडिंग एजेंसी

रिपोर्ट की एक केंद्रीय चिंता यह है कि अगर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म चुनावी उम्मीदवारों को “रील व्यूज़” के माध्यम से पैसे देते हैं, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से कॉर्पोरेट या विदेशी फंडिंग का रूप ले सकता है—जो भारतीय कानून के तहत प्रतिबंधित है।

यह स्थिति ऐसी है जैसे पहले टीवी चैनल्स को विज्ञापन के लिए पैसा दिया जाता था, लेकिन अब वही चैनल उम्मीदवारों को पैसा देने लगें। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जड़ों में दरार डाल सकता है।

बिहार चुनाव का यह अध्ययन केवल एक राज्य की कहानी नहीं है—यह भारत में लोकतंत्र और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के टकराव की कहानी है। जब फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म न केवल राजनीतिक संवाद बल्कि राजनीतिक वित्त का माध्यम बन जाएं, तो खतरा केवल निजता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निष्पक्षता का है।

यदि चुनाव आयोग और कंपनियां इस मुद्दे पर सख्त कार्रवाई नहीं करतीं, तो आने वाले वर्षों में “इन्फ्लुएंसर-पॉलिटिशियन” लोकतंत्र को “कंटेंट मार्केटिंग” में बदल सकते हैं—जहां वोट नहीं, व्यूज़ मायने रखेंगे।

इस रिपोर्ट ने बिहार में चल रहे एक खतरनाक लोकतांत्रिक रुझान को उजागर किया है — चुनाव लड़ते उम्मीदवार अब सोशल मीडिया से कमाई भी कर रहे हैं, जबकि प्लेटफ़ॉर्म्स अपने ही नियमों का पालन नहीं कर रहे। अगर इस पर जल्द रोक नहीं लगी, तो लोकतंत्र की निष्पक्षता “रील्स के राज” में बदल जाएगी।

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