चुनाव से पहले आंगनवाड़ी सेविका और सहायिका का मानदेय बढ़ा

सवाल सीधा है—क्या भारत के लाखों बच्चों का भविष्य टूटी दीवारों, जंग लगे बर्तनों और अधूरी योजनाओं के सहारे लिखा जा रहा है? और इसका जवाब उतना ही कड़वा है—हां।

चुनाव आने से ठीक पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं का मानदेय बढ़ाने की घोषणा की है। लेकिन ये मुद्दा चुनाव से पहले ही क्यों याद आया? साल 2023 और 2024 में आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं ने लगातार आंदोलन किया। लेकिन आंदोलन का क्या नतीजा निकला? टूटी हड्डियां, लाठीचार्ज और वाटर केनन से लगी चोटें।

भारत सरकार और राज्य सरकारें हर साल आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए करोड़ों रुपये का बजट घोषित करती हैं। टीवी पर विज्ञापन आते हैं—“हर बच्चा पढ़ेगा, हर बच्चा बढ़ेगा।” लेकिन गांव की गलियों में झांककर देखिए, तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखती है।

आंगनवाड़ी की शुरुआत और सपना

1975 में जब समेकित बाल विकास योजना (ICDS) शुरू हुई, तो इसका सपना था—

  • बच्चों को शुरुआती शिक्षा,
  • पौष्टिक आहार,
  • गर्भवती और धात्री महिलाओं को स्वास्थ्य सुविधा,
  • और ग्रामीण समाज में पोषण और शिक्षा की नींव रखना।

पचास साल पूरे होने वाले हैं, लेकिन सवाल यह है—क्या यह सपना आज भी अधूरा नहीं है?

बिहार के मधेपुरा ज़िले का एक गांव। वहां की आंगनवाड़ी केंद्र की छत बरसात में टपकती है। दीवारें काई से भरी हैं। बरसात के मौसम में बच्चे फिसलकर गिरते हैं, इसलिए माता-पिता उन्हें भेजना ही बंद कर देते हैं।

गांव की महिला, ममता देवी, जो खुद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, कहती हैं—

“हम महीने भर काम करते हैं, लेकिन वेतन तीन-तीन महीने तक अटका रहता है। खाना बनाने के लिए राशन समय पर नहीं आता। बच्चे खाली पेट लौट जाते हैं। फिर हमें ही गांव वाले ताने मारते हैं कि आंगनवाड़ी कुछ काम की नहीं।”

यह आवाज़ सिर्फ़ मधेपुरा की नहीं है, यह कहानी पूरे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और देश के दर्जनों राज्यों में एक जैसी है।

आंकड़े बनाम हकीकत

2024–25 के केंद्रीय बजट में सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के लिए 21,200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि देशभर में 14 लाख से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्र चल रहे हैं।

लेकिन जब इन केंद्रों की स्थिति पर 2023 की कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की रिपोर्ट आई, तो साफ हुआ कि—

  • 35% आंगनवाड़ी केंद्रों के पास अपनी बिल्डिंग ही नहीं है।
  • 25% में शौचालय नहीं हैं।
  • 32% केंद्रों में पीने के पानी की सुविधा नहीं है।

आंकड़े कहते हैं कि योजना विशाल है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह बताती है कि यह विशाल योजना खुद ही अपनी जड़ों से खोखली हो चुकी है।

याद कीजिए 2017 का झारखंड का गढ़वा ज़िला। वहां संतोषी नाम की बच्ची भूख से मर गई थी। उसकी मां बार-बार कह रही थी—

“राशन कार्ड नहीं बना, इसलिए हमें चावल नहीं मिला।”

आंगनवाड़ी केंद्र वहां था, लेकिन महीनों से राशन नहीं आया था। नतीजा—एक नौ साल की बच्ची की मौत।

आज भी बिहार और झारखंड के कई जिलों में यही हाल है। बच्चे मिड-डे मील और आंगनवाड़ी आहार के भरोसे स्कूल जाते हैं। लेकिन जब खाना ही नहीं मिलता, तो पढ़ाई भी छूट जाती है।

आंगनवाड़ी सेविकाओं की पीड़ा

आंगनवाड़ी सेविका और सहायिका इस व्यवस्था की रीढ़ हैं। लेकिन उनकी स्थिति भी दयनीय है।

  • बिहार में सेविका को 9,000 रुपये मानदेय देने और आंगनवाड़ी सहायिका को 4,500 रूपए दिए जाने की घोषणा की है।
  • झारखंड में यह और भी कम है।
  • कई बार वेतन बढ़ाने की मांग पर कार्यकर्ताओं ने सड़क पर आंदोलन किया, लेकिन सरकार ने उन्हें ‘स्वयंसेवक’ कहकर किनारा कर लिया।

पटना के एक सेविका कहती हैं—

“हमसे जनगणना करवाई जाती है, घर-घर सर्वे कराए जाते हैं, पोलियो ड्राइव भी कराते हैं। लेकिन जब हक़ की बात आती है, तो कहा जाता है—आप सरकारी कर्मचारी ही नहीं हो।”

यह दोहरा रवैया सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है।

नीति और राजनीति

पिछले दस सालों में आंगनवाड़ी को लेकर दर्जनों योजनाएं आईं—

  • पोषण अभियान (2018),
  • सक्षम आंगनवाड़ी (2021),
  • और पोषण 2.0 (2022)।

हर योजना का उद्देश्य यही बताया गया—“कुपोषण मिटाना।”

लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के आंकड़े कहते हैं कि—

  • बिहार में 42% बच्चे स्टंटेड (कम ऊंचाई वाले),
  • 40% अंडरवेट (कम वजन वाले) हैं।

तो सवाल है—क्या योजनाएं सिर्फ़ कागज़ पर ही सफल हैं?

विरोधाभास की कहानी

एक ओर प्रधानमंत्री मंच से कहते हैं—“मेरा सपना है 2047 तक विकसित भारत।” दूसरी ओर, गांव में आंगनवाड़ी भवन की छत गिरने से बच्चे घायल होते हैं।

एक ओर बजट में डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी को हज़ारों करोड़ मिलते हैं। दूसरी ओर आंगनवाड़ी में बच्चों को चावल और दाल तक नहीं मिलता।

क्या यह विरोधाभास ही हमारी सबसे बड़ी विफलता नहीं है?

शिक्षा पर असर

आंगनवाड़ी सिर्फ़ खाना देने का केंद्र नहीं है। यह बच्चों की पहली पाठशाला है। यहीं से बच्चे अक्षर पहचानना, कविता गाना और खेल-खेल में पढ़ना सीखते हैं।

लेकिन जब केंद्र ही बंद हो जाएं या जर्जर हों, तो बच्चे शुरुआत से ही शिक्षा से कट जाते हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में ड्रॉपआउट रेट अभी भी बहुत अधिक है।

सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन समाधान भी उतना ही जरूरी है।

  1. भवन निर्माण: हर पंचायत स्तर पर स्थायी भवन।
  2. सुविधा: पानी, शौचालय और रसोई अनिवार्य।
  3. मानदेय: कार्यकर्ताओं को कर्मचारी का दर्जा और समय पर वेतन।
  4. पारदर्शिता: राशन वितरण और बजट का ऑनलाइन ट्रैकिंग।
  5. सामुदायिक निगरानी: गाँव के लोग खुद देख सकें कि उनके बच्चों को क्या मिल रहा है।

अधूरा सपना!

आंगनवाड़ी केंद्र भारत के भविष्य की नींव थे। लेकिन आज यह नींव ही दरक चुकी है। सरकार हर साल बजट बढ़ाती है, योजनाओं के नाम बदलती है, लेकिन जब तक गांव की झोपड़ी में बैठी ममता देवी को समय पर राशन और वेतन नहीं मिलेगा, तब तक आंगनवाड़ी सिर्फ़ कागज़ी सपना रहेगा।

अंत में सवाल वही है—
क्या भारत के बच्चे सिर्फ़ विज्ञापनों में ही स्वस्थ और पढ़े-लिखे दिखेंगे, या कभी सचमुच आंगनवाड़ी उनके जीवन को बदल पाएगी?