16 मार्च 2024 को डेमोक्रेटिक चरखा ने एक आर्टिकल लिखा था कि किस तरह विक्रम के स्थानीय निवासी दशकों से ट्रॉमा सेंटर की मांग कर रहे हैं। पटना ज़िले के विक्रम प्रखंड में सड़क हादसे आम घटना बन चुके थे। घायल लोग समय पर इलाज न मिलने से दम तोड़ देते थे। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सिर्फ़ सामान्य दवाइयां और साधारण इलाज ही संभव था।
गंभीर मरीज़ों को PMCH या NMCH भेजना पड़ता था, लेकिन दूरी की वजह से कई बार हादसों के शिकार लोग अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते। 29 जुलाई 2025 का दिन इन दर्दनाक यादों के बीच उम्मीद की किरण लेकर आया, जब विक्रम में आखिरकार ट्रॉमा सेंटर का शिलान्यास हुआ।

संघर्ष की दास्तान: 25 साल की लंबी लड़ाई
विक्रम में ट्रॉमा सेंटर की मांग कोई नई नहीं थी। साल 2001 में पहली बार इस परियोजना का शिलान्यास हुआ था। कागज़ पर सब कुछ तय था, लेकिन ज़मीन पर कुछ भी नहीं हुआ। फाइलें दबी रहीं, सरकारें बदलीं, नेता आए-गए, मगर विक्रम की जनता की पीड़ा जस की तस रही। 2021–22 में जब हादसों की संख्या और बढ़ी, तब लोगों का धैर्य टूटा।
स्थानीय युवाओं, सामाजिक संगठनों और मज़दूर वर्ग ने मिलकर ट्रॉमा सेंटर की मांग को आंदोलन का रूप दिया। कई बार धरना हुआ, सड़क जाम हुई, अनशन हुआ। ‘ट्रॉमा सेंटर दो या वोट नहीं’ का नारा चुनावी माहौल में गूंजने लगा। जनता की आवाज़ और प्रशासन की प्रतिक्रिया लगातार आंदोलनों और चर्चाओं ने प्रशासन और नेताओं को इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर किया। 2023 और 2024 के दौरान विक्रम के लोग हर मंच पर यही सवाल उठाते— “हमारे जख्मों का इलाज कब मिलेगा?”
धीरे-धीरे यह मांग स्थानीय से लेकर राज्य स्तर तक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गई। दबाव और संवाद दोनों ने मिलकर रास्ता बनाया और आखिरकार कार्रवाई की दिशा में कदम उठाया गया।

आंकड़े बताते हैं तस्वीर कितनी गंभीर है
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में जहां एक PHC पर औसतन 30,000 लोगों का बोझ होना चाहिए, वहीं हक़ीक़त में यह आंकड़ा 36,000 से 40,000 तक पहुंच चुका है। NCRB की रिपोर्ट के अनुसार हर साल बिहार में करीब 10–12 हज़ार लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं। इनमें से आधे से अधिक की मौत इलाज देर से मिलने या समय पर ट्रॉमा केयर न होने की वजह से होती है। ये आंकड़े बताते हैं कि ट्रॉमा सेंटर जैसे संस्थान किसी क्षेत्र के लिए कितने ज़रूरी हैं।
29 जुलाई 2025 का ऐतिहासिक दिन
लंबे संघर्ष के बाद 29 जुलाई 2025 को विक्रम ट्रॉमा सेंटर का शिलान्यास हुआ। 9.66 करोड़ की लागत से बनने वाले इस केंद्र को 1–1.5 साल में तैयार करने का वादा किया गया है। आन्दोलन में शामिल दिलीप कुमार ने हमसे बात करते हुए कहा की “इस ट्रॉमा सेंटर के शुरू हो जाने पर सिर्फ़ विक्रम ही नहीं, बल्कि पालीगंज, बिहटा, मनेर, और आरा हाईवे से जुड़े इलाकों के 20–25 लाख लोगों को बड़ा सहारा मिलेगा। सड़क हादसों में घायल लोगों को अब पटना भागना नहीं पड़ेगा।”
इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले दीपक कुमार ने कहा कि “स्वतंत्र प्लेटफ़ॉर्म Democratic Charkha ने इस लड़ाई में अहम भूमिका निभाई।गांव-गांव जाकर लोगों की आवाज़ रिकॉर्ड की गई, उनकी पीड़ा को सरकार तक पहुंचाया गया और बार-बार यह सवाल उठाया गया कि आखिर क्यों विक्रम जैसे व्यस्त मार्ग पर ट्रॉमा सेंटर नहीं है।”
जनता की आवाज़ और मीडिया की गूंज ने मिलकर प्रशासन को इस मांग पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया।

वादा ही नहीं, पूरा होना भी ज़रूरी
बिहार की कई योजनाएं शिलान्यास से उद्घाटन तक लंबा सफ़र तय करती हैं। इसलिए अब विक्रम की जनता उम्मीद कर रही है कि इस बार यह परियोजना समय पर पूरी हो और लोगों को वास्तविक राहत मिले।
संघर्ष के नतीजे ने यह साबित कर दिया है कि अगर लोग संगठित होकर आवाज़ उठायें, तो बदलाव संभव है। अब यह जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की है कि इस भरोसे को बनाए रखें और ट्रॉमा सेंटर को समय पर बनवाकर जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरें। विक्रम ट्रॉमा सेंटर सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि 24 साल के संघर्ष, उम्मीद और जनता की जीत की कहानी है।





