बिहार एक ऐसा राज्य है जहां हर साल किसी न किसी रूप में आपदा आती ही है—कभी गंगा और उसकी सहायक नदियों की बाढ़, तो कभी आगजनी, भूकंप या सड़क हादसे. ऐसे समय में सबसे पहले जो लोग राहत और बचाव कार्यों में सामने आते हैं, उन्हें हम ‘आपदा मित्र’ के नाम से जानते हैं. ये स्थानीय प्रशिक्षित स्वयंसेवक होते हैं, जो जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचाते हैं.
लेकिन दुखद विडंबना यह है कि समाज की सुरक्षा करने वाले ये लोग खुद सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं. मानदेय, नौकरी का दर्जा और सामाजिक सुरक्षा की कमी ने इन्हें मजबूर कर दिया है कि अब वे सरकार के खिलाफ़ आंदोलन करें. हाल ही में पटना में मुख्यमंत्री सचिवालय के सामने इनकी रैली और मार्च हुआ, जिसमें राज्य के 24 ज़िलों से आपदा मित्र पहुंचे.

आपदा मित्र कौन हैं ?
‘आपदा मित्र’ योजना की शुरुआत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने 2015 में की थी. उद्देश्य था कि हर ज़िले में प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक टीम बने, जो आपदा के समय प्रशासन की मदद कर सके.
ट्रेनिंग में इन्हें सिखाया जाता है—
- नाव संचालन और बाढ़ से बचाव
- प्राथमिक उपचार
- आग और सड़क हादसों में रेस्क्यू
- जागरूकता अभियान चलाना
इनकी भूमिका खास इसलिए है क्योंकि जब तक एनडीआरएफ या एसडीआरएफ की टीम घटनास्थल पर पहुंचती है, उससे पहले आपदा मित्र राहत कार्य शुरू कर देते हैं.
वैशाली जिले के एक आपदा मित्र विमल कुमार ने बताया “अगर नदी में कोई डूबता है या गांव में आग लगती है, तो सबसे पहले हम पहुंचते हैं. एनडीआरएफ या एसडीआरएफ की टीम तो दो घंटे बाद आती है. उस बीच जितनी जानें बच सकती हैं, हम बचाते हैं.”
आपदा मित्र नेता रोशन ने कहा “किसी पंचायत में अगर डूबने या आग लगने की घटना होती है, तो सबसे पहले आपदा मित्र पहुंचते हैं. एनडीआरएफ की टीम को आने में दो घंटे लग जाते हैं, लेकिन उससे पहले तक हम लोग जितना बचा सकते हैं, बचाते हैं.”

मानदेय का संकट
₹1200 तय था, लेकिन एक रुपया भी नहीं मिला ट्रेनिंग के समय वादा किया गया था कि हर आपदा मित्र को काम के लिए ₹1200 (₹400 राज्य और ₹800 केंद्र सरकार से) मिलेंगे. लेकिन हकीकत में स्थिति बिल्कुल अलग है.
रोशन बताते हैं, “प्रशिक्षण के दौरान कहा गया था कि ₹4800 दिया जाएगा हमारा प्रशिक्षण 20 बैच में हुआ लेकिन उसमें से 4 बैच के लोगो को ही पैसा मिला बाकी की राशि दबा ली गई. प्रशिक्षण से लेकर अब तक जितना भी काम कराया गया, उसका पैसा हमें नहीं मिला. सरकार कहती है ₹1200 मानदेय है, लेकिन हम लोगों को ₹1 भी नहीं दिया गया.”
यानी जिनसे बाढ़ में नाव चलवाया गया, अगलगी में झोंका गया और जागरूकता अभियान कराया गया, उन्हें उनके मेहनताने तक का भुगतान नहीं हुआ.
काम तो लगातार लिया जा रहा है
सरकार आपदा मित्रों से लगातार अलग-अलग मौकों पर काम ले रही है. छठ पूजा, दशहरा, दीपावली जैसे पर्वों पर ड्यूटी, कार्तिक पूर्णिमा मेले में तैनाती, ज़मीन सर्वे और पंचायत भवन में सहयोग, स्कूलों में आपदा प्रबंधन और भूकंप प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान लेकिन इन कार्यों का कोई नियमित हिसाब-किताब नहीं है और न ही कोई तय भुगतान.
तैनाती की स्थिति
बिहार के 24 ज़िलों में आपदा मित्र सक्रिय हैं. इनमें से कई बार जान जोखिम में डालकर ड्यूटी करनी पड़ती है. रोशन ने भागलपुर का एक मामला उठाया—
“वहां एक आपदा मित्र की ड्यूटी के दौरान मौत हो गई, लेकिन उनके परिवार को ₹1 का मुआवजा भी नहीं मिला. हम मांग कर रहे हैं कि शहीद आपदा मित्र के परिवार को कम से कम ₹20 लाख का मुआवजा दिया जाए.”
यानी जिन लोगों को आपदा का सिपाही कहा जाता है, उनकी जान की कीमत तक सरकार तय करने को तैयार नहीं.
आंदोलन कि चेतावनी
आपदा मित्र संगठन ने हाल ही में मुख्यमंत्री सचिवालय तक मार्च किया और 9 मांगें रखीं. इसमें शामिल हैं:
- सरकारी कर्मचारी का दर्जा
- न्यूनतम वेतनमान तय करना (₹26,910 प्रति माह की मांग)
- बकाया राशि का भुगतान
- मृतक आपदा मित्र के परिवार को ₹20 लाख मुआवजा
- पीएफ और सामाजिक सुरक्षा
- ज़िला और प्रखंड स्तर पर आपदा मित्र कार्यालय
- प्रशिक्षण राशि की जाँच और भुगतान
- नियमित मान देय का प्रावधान
- काम के आधार पर नौकरी की स्थिरता
संगठन ने साफ़ कहा है कि अगर सरकार ने मांग नहीं मानीं तो आने वाले चुनाव में भाजपा-जदयू गठबंधन के खिलाफ़ अभियान चलाया जाएगा. विपक्षी पार्टियों—सीपीआई-एमएल और कांग्रेस—को भी ज्ञापन सौंपा जा चुका है.

मज़बूत योजना, लेकिन कमजोर इरादा
आपदा मित्र योजना अपने आप में दुनिया के लिए एक मॉडल हो सकती थी. स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित नागरिक आपदा प्रबंधन में बड़ा रोल निभा सकते हैं. लेकिन बिहार में इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरियाँ हैं—
- स्थायी नौकरी और पहचान का अभाव
- मान देय का संकट
- शहीद आपदा मित्रों के परिवार को मुआवजा न मिलना
अगर सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में लोग इस भूमिका से ही किनारा कर लेंगे.
आपदा मित्र अब सिर्फ़ वॉलंटियर नहीं रहे. ये बिहार की आपदा प्रबंधन व्यवस्था की रीढ़ हैं. सवाल है कि क्या सरकार इन्हें सम्मान और सुरक्षा देने के लिए तैयार है?
अगर इन्हें स्थायी नौकरी और न्यूनतम वेतनमान नहीं मिला, तो यह सिर्फ़ एक योजना की विफलता नहीं होगी, बल्कि यह बिहार की आपदा प्रबंधन नीति पर अविश्वास की मुहर होगी.
‘आपदा मित्र’ ही वो कड़ी हैं जो प्रशासन और समाज को जोड़ती हैं. अगर इस कड़ी को कमजोर किया गया तो इसका खामियाजा सीधे जनता को भुगतना पड़ेगा.





