बिहार विधानसभा नतीजे: NDA की इतनी बड़ी जीत की आखिर वजह क्या रही?

बिहार विधानसभा नतीजे 2025 एक ऐतिहासिक चुनाव साबित हुआ है। शायद NDA को भी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी। जदयू ने एक मज़बूत वापसी की है।
बिहार विधानसभा नतीजे: NDA की इतनी बड़ी जीत की आखिर वजह क्या रही?

बिहार विधानसभा नतीजे 2025 एक ऐतिहासिक चुनाव साबित हुआ है। शायद NDA को भी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी। जदयू ने एक मज़बूत वापसी की है।

14 नवंबर की सुबह, पटना की हवा में हल्की ठंड थी, मगर माहौल में एक अजीब-सा ताप। शहर जाग चुका था, पर आज उसकी आंखों में वह नींद नहीं थी जो किसी रोज़मर्रा के दिन होती है। आज लोग जल्दी उठे थे, जल्दी नहाए थे, और जल्दी टीवी और मोबाइल खोलकर बैठ गए थे।

क्योंकि आज चुनावी नतीजों का दिन था। आज बिहार फैसला करने वाला था कि उसके भविष्य की चाबी किसके हाथ में जाएगी। और बिहार के लिए यह चुनाव सिर्फ सत्ता का चुनाव नहीं, भविष्य का चुनाव होता है।

मैं पटना विश्वविद्यालय के पास अमर चाय दुकान पर खड़ा था। वहां सभी लोग यूट्यूब पर न्यूज़ चैनल को लगातार देख रहे थे। कई चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर अपने विधानसभा की स्थिति देख रहे थे। आसपास कई लोग जमा हो चुके थे। 

एक बुज़ुर्ग आदमी, जो वहीं के रहने वाले थे, वो कहते हैं, “इस साल का चुनाव साल 1995 के बाद सबसे महत्वपूर्ण चुनाव है। लालू जी चुनाव से दूर हैं, दोनों बेटों में फूट है। नीतीश बाबू का आखिरी चुनाव है और SIR के बाद देश में पहला चुनाव। अगर यहां NDA जीतती है तो फिर इसका असर बंगाल में भी देखने को मिलेगा।” उनकी आंखों में अनुभव था, लेकिन उसकी आवाज़ में उम्मीद। जो बिहार की राजनीति का एक बेहद दिलचस्प मिश्रण है।

बिहार में राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं बदलती, यह समाज के तापमान, मानसिकता और दिशा को बदल देती है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, ECI ट्रेंड्स आने लगे। और हर ट्रेंड पिछले ट्रेंड से बड़ा झटका था। शुरूआती पोस्टल बैलेट्स की गिनती में राजद और भाजपा में कांटे की टक्कर थी। लग रहा था कि सबसे बड़ी पार्टी बनने के लिए ये मुकाबला मज़ेदार रहेगा। लेकिन जैसे ही EVM से गिनती शुरू हुई, महागठबंधन को झटका लगना शुरू हो गया। 

NDA सीट दर सीट आगे बढ़ रहा था। BJP की बढ़त 80 पार गई। JD(U) 70 के ऊपर पहुंच चुकी थी। LJP-RV भी कई सीटों पर कमाल दिखा रहा था।

दूसरी ओर RJD की परंपरागत सीटों में भी मुश्किलें बढ़ने लगी थीं। कांग्रेस तो लगभग चुनाव से गायब थी। और वामदल अपनी पुरानी जमीन बचाने के लिए जूझ रहे थे। बिहार का जनादेश एक स्थिर और ठोस सरकार की ओर बढ़ता हुआ दिख रहा था। अभी रात के साढ़े आठ बज रहे हैं, इस समय बिहार ने अपना जनादेश साफ़ कर दिया है। अभी तक के आये आंकड़ों/रुझानों के अनुसार: 

भाजपा- 89
जदयू- 85 
राजद- 25
कांग्रेस- 6 

साथ ही भाजपा को 20.07%, जदयू को 19.28%, राजद को 22.99% और कांग्रेस को 8.72% वोट मिले हैं। 

बिहार विधानसभा चुनाव: निर्वाचन आयोग के आंकड़े
स्रोत- निर्वाचन आयोग

वोटिंग में बढ़ोतरी के बावजूद सत्ता पक्ष को नुकसान नहीं फायदा मिला

वोटिंग प्रतिशत 67.13%, बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा मतदान। इतिहास बना। और उसी इतिहास ने एक नई राजनीतिक कहानी लिखी।

लेकिन इस कहानी के अंदर कितनी परतें हैं, यह सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। इसमें भूगोल है, इसमें जाति है, इसमें महिला शक्ति है, इसमें बेरोज़गारी की आग है, इसमें पलायन का दर्द है, इसमें सीमांचल की टूटन है, इसमें मगध का संघर्ष है, इसमें मिथिला की शिक्षित उम्मीदें हैं, और इसमें पटना की बदलती सामाजिक संरचना।

इसलिए यह सिर्फ चुनाव नहीं, एक सामाजिक भूकंप था। जो कई सालों तक महसूस किया जाएगा। अमूमन ये समझा जाता है कि अगर वोटिंग प्रतिशत में 5% से अधिक का बदलाव होता है तो सत्ता बदलती है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में जब वोटिंग प्रतिशत बढ़ा था तब भी सत्ता बदली थी। 

2025 चुनाव क्यों ऐतिहासिक था? 

बिहार को राजनैतिक प्रयोग का किचन कहना गलत नहीं होगा। कभी भी बिहार का विधानसभा चुनाव एक सामान्य चुनाव नहीं होता। इस बार भी ऐसा ही था। पूरे देश में पहली बार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की शुरुआत बिहार से हुई और उसके आधार पर ही मतदान भी हुआ। विपक्षी नेता पूरे राज्य में वोट चोरी को लेकर ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के ज़रिये सत्ता के खिलाफ एक माहौल बना रहे थें। इसकी वजह से पूरे देश की नज़र बिहार के नतीजों पर थी। बिहार के नतीजे देश में SIR के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। 

2025 के चुनाव से पहले महिलाओं के बैंक खातों में 10,000 रूपए का जाना भी एक महत्वपूर्ण वजह बनी। उस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का महिलाओं से ये कह कर अपील करना कि “चुनाव है थोड़ा देख लीजियेगा” शायद काम कर गया।  

बिहार में महिला मतदाता अब निर्णायक हो चुकी हैं। 2015 में जो शुरुआत हुई थी, 2020 में जो बढ़ी थी, वह 2025 में चरम पर पहुंच गई हैं। महिलाओं ने रिकॉर्ड मतदान किया, और राजनीतिक निर्णय का केंद्र बन गईं। इस बार चुनाव में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 71.7% का रहा, जो पुरुषों के वोटिंग प्रतिशत (62.9%) से 8.8% अधिक था। महिलाओं के इस अधिक भागीदारी ने जातिगत समीकरण को पीछे छोड़ते हुए एक लैंगिक समीकरण को जन्म दिया है। 

महिलाओं ने इस बार पुरुषों से अधिक मतदान किया
महिलाओं ने इस बार पुरुषों से अधिक मतदान किया

पहली बार वोट देने वाले 14 लाख मतदाताओं ने भी इस बार रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन रोकने को मुद्दा बनाया। NDA और महागठबंधन ने नौकरी देने का वादा किया। तेजस्वी यादव ने हर घर सरकारी नौकरी देने का वादा किया। लेकिन NDA ने इसे बचकाना वादा करार दिया था। छठ पूजा के तुरंत बाद हो रहे चुनाव ने लोगों के मन में पलायन का दर्द भी ताज़ा कर दिया। NDA गठबंधन ने इस दर्द को लालू यादव के ‘जंगलराज’ से जोड़कर पेश किया। NDA ने फैक्ट्री और इंडस्ट्री नहीं होने की वजह भी इसी ‘जंगलराज’ को बताया। 

सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि , जनता क्या चाहती थी?

2025 के चुनाव का असली सवाल था: बिहार की जनता आखिर चाहती क्या है? कुछ लोग कहते हैं, वह रोजगार चाहती है। कुछ कहते हैं, वह कानून-व्यवस्था चाहती है। कुछ कहते हैं, वह विकास चाहती है। लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि जब-जब आप बिहार को समझते हैं, बिहार आपको झटका देती है। 

यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।

जनता RJD के बेरोज़गारी-विरोधी आंदोलनों से जुड़ी, पर महिला और शहरी वोटों ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी। जनता NDA की योजनाओं को महसूस कर रही थी, पर उससे सवाल भी कर रही थी। जनता कांग्रेस की कमजोरी से निराश थी और वामदलों की सीमित पहुंच से भी।

आज भी बिहार की जनता के बीच में NDA ने लालू यादव के काल को ‘जंगलराज’ से ही संबोधित किया। इसके पीछे उस समय की जो भी सामाजिक संरचना और जातिगत टकराव हो, लेकिन आज भी जनता इस बात से सहमत होती है कि उस समय कानून व्यवस्था का हाल बुरा था। पटना के एक व्यापारी बताते हैं, “उस समय व्यापार करने का मतलब था कि आपको हफ्ता देना है। नहीं देने पर हत्या या परिजनों की किडनैपिंग भी होती थी। अभी स्थिति में सुधार है। हम तो चाहते हैं कि सरकार महागठबंधन की बने लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हो। अगर राजद का मुख्यमंत्री होगा तो फिर से डर का माहौल वापस आ जायेगा।”

2025 का मनोविज्ञान बेहद दिलचस्प था, जनता बदलाव चाहती थी, लेकिन बदलाव का तरीका पुराने मॉडल वाले टकराव में नहीं देख रही थी। इसलिए उसने एक स्थिर मॉडल को चुना और तेज़ बदलाव की उम्मीद उस मॉडल से लगाई।

बिहार का भूगोल: जहां जमीन सिर्फ खेती नहीं, राजनीति भी उगाती है

बिहार का भूगोल सिर्फ नक्शे पर खींची हुई सीमाएं नहीं हैं, यहां नदियां चुनाव तय करती हैं, यहां सड़कें नेताओं का भविष्य लिखती हैं, यहां बाढ़ किसी की राजनीति को डुबो देती है, और यहां प्रवासी मजदूरों के पसीने से नई राजनीतिक चेतना जन्म लेती है।

बिहार कुल मिलाकर पांच बड़े राजनीतिक क्षेत्रों में बंटा हुआ है:

1. सीमांचल

2. मिथिला

3. मगध

4. उत्तर बिहार (छपरा, मुज़फ्फरपुर, वैशाली क्षेत्र)

5. शहरी पटना

इन पांचों की अपनी-अपनी राजनीतिक आत्मा है, अपनी किस्मत, अपनी प्राथमिकताएं और अपना गुस्सा। 2025 के चुनाव में सबसे बड़ा संदेश यही था कि बिहार अब क्षेत्रीय रूप से एक जैसा नहीं सोचता। हर क्षेत्र अपनी समस्याओं के अनुसार वोट करता है। 

सबसे पहले महागठबंधन की राजनीति को समझने की कोशिश करते हैं। राजद का कोर वोटर्स यानी पिछड़ा और अप्ल्संख्यक। लेकिन इस बार राजद के कोर वोटर्स ही उससे दूर जाते दिखाई दिए। शायद इसकी वजह राजद सुप्रीमो लालू यादव का चुनाव से दूरी बनाना और हर फैसला तेजस्वी द्वारा किया जाना है। उदाहरण के लिए गौरा बौराम विधानसभा से लालू यादव ने अफ़ज़ल अली को पार्टी सिंबल दिया। लेकिन इस सीट से मुकेश साहनी की पार्टी और महागठबंधन में शामिल विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने अपने उम्मीदवार को मैदान में उतार दिया। तेजस्वी यादव ने अफ़ज़ल अली को ही पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। इस फैसले से लोगों को ये सन्देश गया कि तेजस्वी ही अब असली राजद सुप्रीमो हैं। इस वजह कई सीट पर यादवों ने भी राजद को भरपूर समर्थन नहीं दिया। इसका एक उदाहरण दानापुर विधानसभा से रीतलाल यादव की 29 हज़ार से अधिक वोटों से हार है।   

अफ़ज़ल अली को पार्टी का सिंबल देते लालू प्रसाद यादव
अफ़ज़ल अली को पार्टी का सिंबल देते लालू प्रसाद यादव

महागठबंधन में कांग्रेस भी कहां पीछे है। सबसे पहले 61 सीटों की मांग करना, जबकि 2020 के चुनावों में कांग्रेस ने 70 सीट में से केवल 19 सीट पर ही जीत हासिल की थी। इसी जोड़-तोड़ में सीट शेयरिंग में काफ़ी लेट-लतीफ़ी भी दिखाई दी। जबकि दूसरी तरफ़ NDA ने समय से सीट शेयरिंग की घोषणा कर दी थी। कांग्रेस ने अपने कई उम्मीदवारों को काफ़ी बाद में टिकट दिया, जिससे उनके पास सही चुनावी तैयारी करने का समय नहीं था। कांग्रेस के भीतर चलने वाली लड़ाई भी एक हार की एक महत्वपूर्ण वजह है। टिकट बंटने के बाद कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावारु पर टिकट बेचने का भी आरोप लगा। वोटिंग से कुछ दिन पहले पटना एयरपोर्ट पर कृष्णा अल्लावारु और कांग्रेस नेता शकील अहमद खान पर कांग्रेसियों ने ही हमला कर दिया। इससे पार्टी की अंदरूनी लड़ाई जनता के सामने आने लगी और इसका असर वोटिंग में दिखाई दिया।  

यहां पर NDA ने महागठबंधन की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया, और यह बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव है। लेकिन इसकी क्या वजह रही? 

नीतीश कुमार कुर्मी समुदाय से आते हैं। जब 2005 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे, वो तब भी जानते थे कि कुर्मी आबादी बिहार में कम है। केवल 2.8% कुर्मी आबादी के सहारे उनका राजनैतिक जीवन लंबा नहीं हो सकता है। इसलिए उन्होंने एक नया वोट बैंक पर काम करना शुरू कर दिया, ‘महिला वोटबैंक’। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद से जीविका, कन्या उत्थान योजना, कन्या पोशाक योजना और कन्या साइकिल योजना का लाभ सीधा महिलाओं को देना शुरू किया। उसके बाद शराबबंदी के फैसले ने महिला वोटर्स को और मज़बूत करने का काम किया। साथ ही नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन में होने के बावजूद अल्पसंख्यकों के करीब नज़र आये हैं। नीतीश कुमार के चेहरे पर अल्पसंख्यकों को भी कोई कड़ी आपत्ति नहीं रही। डेमोक्रेटिक चरखा के पत्रकार जब सीमांचल और कोसी इलाके के कई गांवों में गए तो वहां भी मुख्यमंत्री बदलने की कोई हवा नहीं थी। हालांकि भाजपा के खिलाफ नाराज़गी ज़रूर थी, लेकिन नीतीश कुमार के खिलाफ नहीं।

जीविका दीदी के साथ नीतीश कुमार
जीविका दीदी के साथ नीतीश कुमार

SIR और ‘घुसपैठ’ का भी असर चुनाव पर रहा 

30 अक्टूबर को बिहार के नालंदा जिले में रैली को सम्बोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि, “राहुल गांधी ने बिहार में घुसपैठिया बचाओ रैली की थी। आओ बताइये, क्या अवैध प्रवासियों का नाम बिहार की मतदाता सूची से हटाना चाहिए या नहीं।” बिहार चुनाव में भाजपा लगातार ‘बांगलादेशी-घुसपैठिए’ जैसे शब्द इस्तेमाल करते आयी है। लेकिन आज तक भाजपा इस पर कोई ठोस आंकड़ा नहीं दे पायी है। जब SIR की शुरुआत हुई तब चुनाव आयोग ने कई बार ये कहा कि बिहार में कई विदेशी हैं जिन्होंने अपना वोटर आईडी फर्जी तरीके से बनवा लिया है। 

इस वजह से कई लोगों ने चुनाव पर ‘घुसपैठियों’ का असर ना पड़े, इसलिए भाजपा को एकतरफा वोट देने का काम दिया है। भाजपा की ‘हिन्दू केंद्रित’ राजनीति का असर वोट में तब्दील हुआ है। यहां तक कि बिहार में भी ‘उर्दू’ नाम वाले जगहों का नाम बदलने की भी बात की गयी। अलीनगर विधानसभा से भाजपा उम्मीदवार मैथली ठाकुर ने अलीनगर का नाम बदल कर सीतानगर करने की बाद कही। कई रैलियों में उन्होंने इसे ‘जनता की मांग’ भी कहा। मैथली ठाकुर ने अपने एजेंडा और विकास के मुद्दों पर कम बात ही की है। उनका ज़्यादा ज़ोर नाम बदलने पर रहा, अब वो 11 हज़ार से अधिक वोटों से चुनाव जीत चुकी हैं। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मोहिउद्दीन नगर विधानसभा में प्रचार के दौरान कहा था कि, “हम चुनाव जीतने के बाद मोहिउद्दीन नगर का नाम ‘मोहननगर’ कर देंगे और इसे कैद से मुक्त कराएंगे।” इस विधानसभा से भी भाजपा उम्मीदवार राजेश कुमार सिंह 11 हज़ार वोट से जीत दर्ज की है।   

अलीनगर से उम्मीदवार मैथली ठाकुर ने 11 हज़ार वोट से जीत दर्ज की
अलीनगर से उम्मीदवार मैथली ठाकुर ने 11 हज़ार वोट से जीत दर्ज की

सोशल मीडिया की राजनीति , रील्स ने वोट बदले

2025 बिहार का पहला रील्स वाला चुनाव था। इंस्टाग्राम रील्स + फेसबुक लाइव + यूट्यूब शॉर्ट्स ने पूरे चुनाव का रंग बदल दिया। NDA ने इसमें बहुत निवेश किया, उनकी हर योजना रील में बदल गई। NDA ने सोशल मीडिया विज्ञापन पर भी काफी पैसे खर्च किये। डेमोक्रेटिक चरखा और NAPM द्वारा की गयी स्टडी के अनुसार:

1. आधिकारिक फेसबुक विज्ञापनों पर कुल खर्च 7.8 करोड़ रुपये रहा, जिसमें से BJP का खर्च 5.6 करोड़ रुपये (70%) था। गूगल विज्ञापनों पर भी BJP ने अक्टूबर में 6.75 करोड़ रुपये खर्च किए।

2. इसके अलावा 2.9 करोड़ रुपये का ‘अनौपचारिक/ग़ैर-घोषित’ विज्ञापन खर्च किया गया, जो चुनाव आयोग (ECI) को घोषित नहीं किया गया है। यह पूरा खर्च अनकाउंटेड है।

3. एक नया ट्रेंड दिखा— कई ‘न्यूज़ मीडिया’ नाम वाले पेज वोक्स-पॉप स्टाइल वीडियो चलाकर राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं।

  • Bihar Live — JDU के समर्थन में
  • Today Bihar News — RJD को बढ़ावा देने वाला

4. दो शैडो पेज — Bhak Budbak और Jungle Raaj — अत्यंत घृणित, अपमानजनक और जातिगत भाषा में RJD और यादव परिवार पर हमले कर रहे थे।

  • इनके विज्ञापनकर्ता की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी।
  • फिर भी ये पेज चुनाव से ठीक पहले बड़े पैमाने पर विज्ञापन चला रहे थे।

5. कई उम्मीदवारों के ‘फैन पेज’ चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं।

  • इससे उम्मीदवारों का वास्तविक खर्च 40 लाख रुपये की सीमा से ऊपर जा सकता है।
  • उदाहरण: सम्राट चौधरी (BJP) का आधिकारिक खर्च 8.6 लाख रुपये, लेकिन फैन पेजों के माध्यम से 20% अतिरिक्त, यानी लगभग 2.3 लाख रुपये और खर्च किए गए।

सोशल मीडिया की इस रेस में NDA आगे निकली जिसका सीधा असर युवा और पहली बार वोट देने वालों पर पड़ा। 

फेसबुक पेज- Bhak Budbak का एक पोस्ट
फेसबुक पेज- Bhak Budbak का एक पोस्ट

जनादेश के बाद असली कहानी अभी शुरू 

चुनाव जीतना आसान है, बिहार को चलाना मुश्किल।

पटना की एक गली में मुझे एक बुज़ुर्ग रिक्शा चालक मिला। उसने कहा, “बाबू, चुनाव में सब बोलते हैं, पर असली काम तो जनता देखती है कि सरकार बोलने के बाद करती क्या है।”

उसके इस वाक्य में बिहार की राजनीति का पूरा सच छिपा है। बिहार ने NDA को भारी बहुमत दिया है, लेकिन साथ ही भारी ज़िम्मेदारी भी। अब चुनाव जीतने के बाद NDA पर सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां क्या रहेंगी, इस पर अगले आर्टिकल में विस्तार से बात करेंगे।