शिक्षा में भेदभाव: क्या आज भी स्कूल में दलित बच्चों के साथ भेदभाव होता है?

भारत का संविधान कहता है कि हर बच्चे को समान शिक्षा का अधिकार है. RTE Act बच्चों को न सिर्फ दाखिले की गारंटी देता है, बल्कि भेदभाव रहित माहौल की भी बात करता है.

सोनू पासवान की उम्र 10 साल है. वह बिहार के जहानाबाद ज़िले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता है. जब लंच की घंटी बजती है, तो बच्चे लाइन में लग जाते हैं — लेकिन सोनू और उसके दो दोस्त पास ही खड़े रहते हैं. पूछने पर मास्टर कहते हैं, “ये लोग बाद में खाते हैं. पहले बाकी बच्चे खा लें.” बाद में सोनू को बर्तन साफ़ करने को कहा जाता है — उसी खाने के जो उसने अब तक खाया भी नहीं.

सोनू की आंखों में ग़ुस्सा नहीं, आदत है. एक ऐसी आदत जो उसे उसकी जाति की याद रोज़ दिलाती है.

कक्षा में अलग बैठना, सवाल पूछने पर चुप कराना

पलामू के विश्रामपुर ब्लॉक के एक गांव में एक लड़की, आरती देवी, कहती है कि वह स्कूल जाती है लेकिन मास्टर कभी उसका नाम नहीं लेते. जब वह हाथ उठाती है, तो शिक्षक उसे देखकर नज़र फेर लेते हैं. वह अक्सर कक्षा के कोने में बैठाई जाती है — जहां न ब्लैकबोर्ड दिखता है, न अध्यापक का चेहरा.

औरंगाबाद ज़िले के डुमरिया ब्लॉक में एक रिपोर्टिंग के दौरान एक शिक्षक ने बताया — “कुछ बच्चे गंदे रहते हैं, उनको अलग बैठाना पड़ता है. बाकी बच्चों को भी तो बीमारी न फैले.” जब हमने पूछा कि ये बच्चे कौन जाति के हैं, तो जवाब मिला — पासी, मुसहर, हरिजन… वही.”

शिक्षा के मंदिर में अदृश्य जाति व्यवस्था

ये 2025 का भारत है, लेकिन स्कूलों में आज भी जाति “छुपी नहीं, जीती जाती है.” मिड डे मील में कौन खाना परोसेगा, कौन बर्तन धोएगा, किसको लाइन में सबसे पीछे खड़ा किया जाएगा — ये सब तय होता है बच्चे के जाति से, उसके नाम से, और उसके पहनावे से.

कई स्कूलों में तो आज भी एक ‘अनकहा सिस्टम’ चल रहा है — दलित या पिछड़े वर्ग के बच्चों को टॉयलेट साफ़ कराने से लेकर स्कूल ग्राउंड झाड़ू लगवाने तक का काम दिया जाता है, जो शिक्षा के नाम पर सिर्फ मज़दूरी है.

शिक्षक की मानसिकता और संस्थागत चुप्पी

एक दलित बच्ची की मां, प्रमिला देवी बताती हैं, “हम बेटी को स्कूल भेजते हैं, पर वो रोते हुए लौटती है. कहती है मास्टर जी गाली देते हैं — ‘तुम्हारे जैसे लोग पढ़ने लायक नहीं.’ हम शिकायत करें तो कहते हैं — ‘बच्ची झूठ बोल रही है.’”

इस चुप्पी के पीछे केवल शिक्षक की सोच नहीं है, बल्कि पूरा संस्थागत तंत्र है. सरकार ने RTE (Right to Education) के तहत “समान शिक्षा” की बात तो की, लेकिन ज़मीनी निगरानी ना के बराबर है. शिक्षा विभाग की मासिक समीक्षा बैठकें होती हैं, मगर इनमें जातिगत भेदभाव पर बात तक नहीं होती.

  • ActionAid की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण स्कूलों में 45% दलित बच्चों ने बताया कि उन्हें जानबूझकर पीछे बिठाया जाता है.

  • UNESCO 2021 के अनुसार, जाति आधारित भेदभाव “शैक्षणिक ड्रॉपआउट” की सबसे बड़ी वजहों में से एक है.

  • NSSO 2019 के डेटा के अनुसार, बिहार के प्राथमिक स्कूलों में SC/ST वर्ग के बच्चों की उपस्थिति दर 18% कम है, जो सामाजिक हाशिए की ओर इशारा करता है.

जब स्कूल ही जाति का आईना बन जाए

“सरकारी स्कूल में नाम तो लिखा दिया था, पर पढ़ाई नहीं होती थी. बस बैठकर दूसरों को खाना खाते देखते थे.” यह कहना है सोनू के बड़े भाई रमेश पासवान का, जो अब 15 साल के हैं और स्कूल छोड़कर मज़दूरी कर रहे हैं.

स्कूलों में अगर जाति के आधार पर व्यवहार होता है, तो वहां शिक्षा नहीं, अपमान मिलता है. यह सिर्फ सामाजिक असमानता नहीं, संवैधानिक मूल्यों का अपमान है.

RTE और SC/ST Act का उल्लंघन रोज़ाना होता है

भारत का संविधान कहता है कि हर बच्चे को समान शिक्षा का अधिकार है. 2009 में लागू हुआ RTE Act (Right to Education) बच्चों को न सिर्फ दाखिले की गारंटी देता है, बल्कि भेदभाव रहित माहौल की भी बात करता है.

इसके अलावा SC/ST (Prevention of Atrocities) Act 1989 साफ़ कहता है कि अगर किसी दलित बच्चे के साथ सार्वजनिक स्थान पर, विशेषकर स्कूल में, जाति के आधार पर अपमान होता है, तो यह दंडनीय अपराध है.

लेकिन बिहार, झारखंड और यूपी के सैकड़ों स्कूलों में यह कानून दीवार पर नहीं, ज़मीन पर टूटा हुआ मिलता है.

शिक्षकों की ट्रेनिंग में जाति पर चुप्पी

सरकारी शिक्षक प्रशिक्षण केंद्रों में SCERT और DIET जैसे संस्थान हर साल हज़ारों शिक्षकों को तैयार करते हैं. लेकिन इन प्रशिक्षणों में सामाजिक न्याय, जातिगत चेतना, या समावेशिता पर कोई ठोस मॉड्यूल नहीं होता.

एक शिक्षिका ने नाम न छापने की शर्त पर बताया —“हमें बच्चों को पढ़ाने की तकनीक तो सिखाई जाती है, पर ये नहीं सिखाया जाता कि कैसे सबको बराबरी से देखें.”

योजना vs ज़मीनी निगरानी

केंद्र सरकार और राज्य शिक्षा विभाग की दर्जनों योजनाएं मौजूद हैं:

  • बाल संसद

  • स्कूल प्रबंधन समिति (SMC)

  • जेंडर/इक्विटी मॉड्यूल

  • मिड डे मील निगरानी

  • बाल अधिकार निगरानी मंच

लेकिन इनमें से अधिकतर कागज़ पर चलते हैं. स्कूल निरीक्षण दुर्लभ है, समुदाय की भागीदारी न्यूनतम है, और अभिभावकों को अधिकारों की जानकारी भी नहीं.

समाधान की दिशा में पांच ज़रूरी क़दम

  1. जाति-चेतना प्रशिक्षण: शिक्षकों को जातिगत समावेशिता और संवैधानिक मूल्यों की विशेष ट्रेनिंग दी जाए.

  2. समावेशी निगरानी तंत्र: SMC और बाल अधिकार मंचों को मज़बूत कर ज़मीनी निगरानी सुनिश्चित की जाए.

  3. समाज संवाद: हर स्कूल में साल में 2 बार सामुदायिक संवाद सत्र हों — भेदभाव, शिक्षा और समानता पर.

  4. मिड डे मील में नियमबद्धता: भोजन व्यवस्था ऐसी हो जिसमें जाति आधारित बर्ताव पर सख्ती से कार्रवाई हो.

  5. बच्चों की आवाज़ को मंच: बच्चों को शिकायत का सुरक्षित और गोपनीय माध्यम दिया जाए.

नाम भर से कोई बराबरी नहीं होती

“अब्बू ने मेरा नाम अमन रखा था, ताकि कोई मेरी जाति न पहचाने.” ये शब्द हैं औरंगाबाद के एक आठवीं कक्षा के छात्र अमन का. उसका नाम सुनकर कोई उसकी जाति नहीं जानता, पर जब मिड डे मील में उसके हिस्से का खाना सबसे आखिर में आता है, तो उसे समझ आ जाता है कि “यहां सिर्फ नाम बदला है, जात नहीं.”

स्कूल के बाहर लिखे शब्द — “सर्व शिक्षा अभियान”, “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, और “शिक्षा का अधिकार” — अच्छे लगते हैं.
लेकिन स्कूल के अंदर जब एक बच्चा सिर्फ इसलिए अलग बैठता है क्योंकि उसकी जाति ‘नीची’ है, तो इन नारों की स्याही दलित पसीने से धुंधली हो जाती है.

शब्दों से नहीं, व्यवहार से बदलता है समाज

सरकार लाख योजना बना ले, घोषणाएं कर दे, लेकिन जब तक एक शिक्षक अपने भीतर बैठी जातिवादी सोच को नहीं निकालता, तब तक कोई बदलाव नहीं आएगा.

जब तक एक मां यह कहने से डरती है कि “मेरे बच्चे के साथ भेदभाव हुआ है”, तब तक स्कूल सीखने की जगह नहीं, सज़ा की जगह बन जाता है.

एक आखिरी दृश्य: गांव की वो दीवार

बिहार के गया ज़िले के एक स्कूल की दीवार पर सफ़ेद रंग से लिखा है — “हम सब एक हैं. कोई भेदभाव नहीं.

ठीक उसी दीवार के नीचे, एक बच्चा बैठा है — दूर, बाकी बच्चों से हटकर. उसके पास किताब है, लेकिन मन नहीं.
उसकी आंखें शिक्षक को नहीं देख रहीं, बल्कि दीवार पर उस झूठ को देख रही हैं, जो हर दिन उसके आत्मसम्मान को तोड़ता है.

जब शिक्षा भेदभाव सिखाने लगे, तो कैसी शिक्षा?

शिक्षा सिर्फ अक्षर जोड़ना नहीं है, यह समाज जोड़ने की प्रक्रिया है. और जब शिक्षा व्यवस्था ही जातिवादी हो जाए, तो वह संविधान का नहीं, मनुस्मृति का विस्तार बन जाती है.

बच्चों को स्कूल में समानता नहीं मिली, तो वे कब, कैसे और क्यों समाज को बदलेंगे?

यह लेख सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, एक सवाल है — क्या हम अपने बच्चों को सिर्फ पढ़ना सिखा रहे हैं, या बराबरी भी?