बिहार विधानसभा चुनाव: इंडिया गठबंधन को हराने के लिए इंडिया गठबंधन मैदान में

सात सीटों पर ‘इंडिया vs इंडिया’: जब गठबंधन ही खुद से भिड़ गया। ऐसे में जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इंडिया गठबंधन में भी किस इंडिया को वोट करें? जब चुनाव से पहले एकता नहीं है तो चुनाव के बाद क्या होगा?
अतिपिछड़ा न्याय संवाद के दौरान इंडिया गठबंधन

सात सीटों पर ‘इंडिया vs इंडिया’: जब गठबंधन ही खुद से भिड़ गया। ऐसे में जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इंडिया गठबंधन में भी किस इंडिया को वोट करें? जब चुनाव से पहले एकता नहीं है तो चुनाव के बाद क्या होगा?

बिहार विधानसभा चुनावों के पहले चरण में जो नज़ारा दिखा है, वह राजनीति नहीं — एक कॉमेडी ड्रामा है। जहां एक ओर विपक्षी गठबंधन खुद को इंडिया कहकर देश बचाने की बात कर रहा है, वहीं सात सीटों पर ‘इंडिया vs इंडिया’ का मैच तय हो गया है। मतलब — टीम इंडिया ही टीम इंडिया को हराने उतरी है।

जनता हैरान है कि वोट किसे दें? क्योंकि दोनों ओर “मोदी हटाओ” वाले ही मैदान में हैं। अंतर बस इतना है कि एक पोस्टर पर लाल झंडा है और दूसरे पर हरा।

बिहार बंद के दौरान इंडिया गठबंधन
बिहार बंद के दौरान इंडिया गठबंधन

सवाल वही पुराना — जनता किसकी? सीट किसकी?

इस बार बिहार के पहले फेज में सात सीटों पर इंडिया गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। कांग्रेस बनाम राजद, राजद बनाम सीपीआई, सीपीआई बनाम कांग्रेस — सबने तय कर लिया है कि “पहले घर की लड़ाई जीतेंगे, फिर बीजेपी को देखेंगे।”

यहां गठबंधन के अंदर का ‘जनहित’ कुछ ऐसा दिखता है —पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ल की बेटी शिवानी शुक्ल को राजद ने लालगंज सीट से मैदान में उतारा तो कांग्रेस ने उसी सीट से आदित्य कुमार राजा को अपना उम्मीदवार बना दिया। राजनीतिक निष्ठा का आलम ये है कि हर पार्टी ने अपने उम्मीदवार को ‘जनता की आवाज़’ बताया है — बस जनता को ही नहीं बताया कि इतनी आवाज़ें सुनने के बाद वो किसकी मानें।

‘इंडिया’ बनाम ‘इंडिया’: सीट-दर-सीट सर्कस

  1. लालगंज सीट — राजद की ओर से पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ल, कांग्रेस से आदित्य कुमार राजा, दोनों दावा कर रही हैं कि ‘जनता उनके साथ है।’ जनता कह रही है — “हम तो बस घर में टीवी देखेंगे।”
  2. वैशाली सीट — राजद और कांग्रेस आमने-सामने। एक ही मंच पर हाल में फोटो खिंचवाने वाले अब एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे। राजद ने इस सीट से अजय कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया तो उसके खिलाफ कांग्रेस ने ई. संजीव सिंह को उम्मीदवार बनाया।
  3. राजापाकर सीट — कांग्रेस और सीपीआई आमने-सामने। पहले साथ मिलकर भाजपा को हराने की कसम, अब एक-दूसरे के खिलाफ। कांग्रेस ने प्रतिमा कुमारी को उम्मीदवार बनाया है तो वहीं सीपीआई ने मोहित पासवान को।
  4. रोसड़ा सीट — कांग्रेस और सीपीआई फिर से आमने सामने। कांग्रेस के बीके रवि और सीपीआई के लक्ष्मण पासवान ने नामांकन कर दिया है।
  5. बिहारशरीफ सीट — कांग्रेस और सीपीआई में फिर भिड़ंत। कांग्रेस की तरफ से उमैर खान और सीपीआई की तरफ से शिव प्रसाद यादव उर्फ़ सरदार जी ने नामांकन किया है।
  6. बछवाड़ा सीट — सीपीआई की पारंपरिक सीट। सीपीआई के अवधेश कुमार राय ने नामांकन किया है, लेकिन कांग्रेस ने वाइल्ड कार्ड एंट्री दी है शिव कुमार गरीब दास को और अपना उम्मीदवार बनाया है।
  7. तारापुर सीट — राजद बनाम वीआईपी। राजद के अरुण साह और वीआईपी के सकलदेव बिन्द ने नामांकन किया है।

कुरमी–कोइरी का कोटा पूरा, पर जनता फिर खाली

जदयू और भाजपा दोनों ने जातीय गणित का पूरा बोर्ड सजा लिया है। एक ने कुरमी–कोइरी का हिसाब लगाया, तो दूसरे ने सवर्ण–वैश्य का। पर किसी ने ये नहीं पूछा कि बेरोज़गार नौजवानों का कोटा कौन भरेगा?

पार्टीकुर्मीकोइरीयादवराजपूतभूमिहारब्राह्मणकायस्थअति पिछड़ादलितवैश्यमुस्लिम
जदयू1213081009020119150804
भाजपा0207062116110110121500
लोजपा (आर)0001050504010000080401
हम 0000000002000000040000
रालोमो0003000101000000000100

‘गठबंधन’ अब एक शब्द नहीं, बल्कि एक जोक है

बिहार की राजनीति में गठबंधन अब विचारधारा नहीं, बल्कि ‘सीट एडजस्टमेंट ऐप’ बन चुका है। हर चुनाव में ये पार्टियां एक-दूसरे की पीठ थपथपाती हैं — और टिकट कटते ही छुरा भी वही चलाती हैं।

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इंडिया गठबंधन में जो पहले साथ थे वो आज खिलाफ हैं

ये वही इंडिया गठबंधन है जो संसद में ‘एकजुटता’ की बातें करता है, और मैदान में टिकट बंटते ही ‘एक-दूसरे को हराने’ की रणनीति बनाता है।

वोटर का सच: “हम तो देखते हैं सर्कस, वोट डालते हैं चुपचाप”

दरअसल, बिहार का वोटर अब समझदार है। वो जानता है कि आज का ‘मित्र दल’ कल ‘विरोधी मोर्चा’ बन सकता है। लोग कहते हैं, बिहार में राजनीति धर्म जैसी है — सब आस्था दिखाते हैं, कोई आचरण नहीं निभाता।

सवाल तो एक ही है-

जब INDIA गठबंधन खुद ही खुद से भिड़ जाए, तो क्या बीजेपी की ज़रूरत भी रह जाती है? और जब विपक्ष ही विपक्ष का विपक्ष बन जाए, तो जनता किससे उम्मीद रखे — पोस्टर वाले नेता से या पोस्टर चिपकाने वाले मज़दूर से?

बिहार का लोकतंत्र अब एक फुल-टाइम रियलिटी शो बन चुका है

जहां हर पार्टी कहती है “जनता हमारे साथ है,” पर जनता कहती है — “हम तो बस तमाशा देख रहे हैं।”

इंडिया vs इंडिया अब चुनावी नारा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की आत्मकथा बन चुकी है — जहां गठबंधन साथ चलते हैं, बस मंज़िल आते-आते रास्ता बदल लेते हैं।

जब तक राजनीति में ‘गठबंधन’ शब्द का अर्थ ‘सिद्धांत’ नहीं, बल्कि ‘सीट शेयरिंग’ रहेगा — बिहार की जनता हर बार उसी गठबंधन में फंसी रहेगी, जो बदलता सिर्फ़ झंडा है, सोच नहीं।