बिहार में कुपोषण: अब ‘मध्यम कुपोषित’ बच्चे भी एनआरसी में भेजे जाएंगे

राज्य में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में लगभग 41 प्रतिशत कम वज़न के हैं। करीब 38 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड हैं और लगभग 23 प्रतिशत बच्चे वेस्टिंग की श्रेणी में आते हैं।
बिहार में कुपोषण: अब ‘मध्यम कुपोषित’ बच्चे भी एनआरसी में भेजे जाएंगे

राज्य में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में लगभग 41 प्रतिशत कम वज़न के हैं। करीब 38 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड हैं और लगभग 23 प्रतिशत बच्चे वेस्टिंग की श्रेणी में आते हैं।

बिहार में कुपोषण कोई नई कहानी नहीं है। यह वही कहानी है, जो हर साल सरकारी रिपोर्ट में छपती है, हर बार मंत्रियों के भाषण में चिंता बनकर आती है, और हर गांव की मिट्टी में किसी बच्चे की धीमी सांसों की तरह दब जाती है। लेकिन इस बार राज्य सरकार ने जिस फ़ैसले की घोषणा की है, उसने कुपोषण की स्थिति को लेकर एक और गहरी सच्चाई सामने रख दी अब सिर्फ़ गंभीर रूप से कुपोषित नहीं, बल्कि मध्यम कुपोषण वाले बच्चों को भी एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) में भर्ती किया जाएगा।

यह फ़ैसला किसी उत्साहजनक नीति सुधार से ज़्यादा एक चेतावनी जैसा लगता है। क्योंकि जब ‘मध्यम’ कुपोषित बच्चों को भी अस्पताल जैसे संस्थागत केंद्रों में भर्ती करने की ज़रूरत पड़ जाए, तो इसका मतलब है कि कुपोषण का दायरा अब पहले से कहीं बड़ा और खतरनाक हो चुका है।

मुज़फ्फरपुर से जारी हुई सरकारी जानकारी के अनुसार, विटामिन की कमी, बार-बार संक्रमण, एनीमिया और दुर्बलता से जूझ रहे बच्चों को अब व्यापक स्तर पर स्क्रीनिंग में शामिल किया जाएगा। स्वास्थ्य उपकेंद्रों से लेकर पीएचसी और आंगनवाड़ी तक हर जगह बच्चे अब चिन्हित होंगे। पहले केवल गंभीर कुपोषित (SAM) बच्चों को ही एनआरसी भेजा जाता था, लेकिन अब मध्यम कुपोषण (MAM) को भी गंभीर मानते हुए उसी इलाज की व्यवस्था में शामिल करने का निर्णय लिया गया है। यह बदलाव इसलिए किया जा रहा है क्योंकि लंबे समय से कुपोषण बिहार की ऐसी समस्या बन गया है, जिसे सिर्फ़ आंगनवाड़ी के पोषण आहार से नहीं निपटा जा सकता।

मुज़फ्फरपुर के प्रभारी जिला अनुमंडल एवं मूल्यांकन पदाधिकारी अमित कुमार का बयान साफ़ बताता है कि स्थिति सतही नहीं है। उन्होंने बताया कि अब मध्यम कुपोषित बच्चों को भी एनआरसी में भर्ती किया जाएगा, ताकि उन्हें पोषण के साथ-साथ चिकित्सकीय निगरानी भी मिल सके। यह वही निगरानी है, जो अब तक लाखों बच्चों की पहुंच से बाहर थी। बिहार में कुपोषण किसी एक जिले या एक वर्ग का मुद्दा नहीं यह राज्यव्यापी स्वास्थ्य संकट है, जिसका असर शिशुओं की मौत से लेकर जीवनभर की कमज़ोरी तक दिखाई देता है।

दूसरी तरफ़, राज्य शिशु स्वास्थ्य के पदाधिकारी डॉ. विजय चौधरी की चिट्ठी ने कुपोषण की गंभीरता को और स्पष्ट किया है। उन्होंने सभी जिलों को निर्देश दिया है कि मध्य और गंभीर कुपोषित बच्चों की पहचान तुरंत कर अस्पतालों के लिए रेफर किया जाए। यह निर्देश अचानक नहीं आया है। 

कुपोषण में बिहार के हालत पहले से भी अधिक भयावह

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार बिहार के हालात पहले से भयावह हैं। राज्य में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में लगभग 41 प्रतिशत कम वज़न के हैं। करीब 38 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड (कम कद वाले) हैं और लगभग 23 प्रतिशत बच्चे वेस्टिंग (अत्यधिक दुबले) की श्रेणी में आते हैं। यानी बिहार के हर पांचवे घर में एक बच्चा पोषण की लड़ाई में हार रहा है।

एनआरसी यानी पोषण पुनर्वास केंद्रों का मकसद है गंभीर और मध्यम कुपोषित बच्चों को 14 दिनों तक चिकित्सकीय निगरानी में रखना। यहां उन्हें दवा, आहार, दूध, मल्टीविटामिन, खनिज, उपचार, और माता-पिता को पोषण शिक्षा दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार के सभी एनआरसी इस अतिरिक्त भार को संभालने के लिए तैयार हैं? क्या हर जिले में बिस्तरों की संख्या पर्याप्त है? क्या प्रशिक्षित नर्सें उपलब्ध हैं? क्या कोई सिस्टम यह सुनिश्चित करेगा कि इलाज के बाद बच्चों का फॉलो-अप भी हो?

इस समय बिहार में एनआरसी की क्षमता सीमित है, और कई बार बिस्तर खाली न होने की वजह से बच्चे या तो घर वापस भेज दिए जाते हैं या इलाज अधूरा रह जाता है। कई जिलों में तो एनआरसी केंद्र भवनों के भीतर तो मौजूद है, लेकिन वहाँ पर्याप्त स्टाफ नहीं होता। कुपोषण जैसी बीमारी सिर्फ़ मल्टीविटामिन की गोलियों से नहीं ठीक होती इसके लिए निरंतर चिकित्सा, साफ़ भोजन, पोषण का सही खुराक, और मां-बाप को जागरूक करने के संस्थागत प्रयास की आवश्यकता होती है।

आंगनवाड़ी और आशा दीदी पर एक और ज़िम्मेदारी

सरकार कह रही है कि स्वास्थ्य केंद्र, आंगनवाड़ी, आशा और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता गांवों में जाकर स्क्रीनिंग करेंगे। यह बात कागज पर जितनी सुंदर लगती है, ज़मीन पर उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले से पोखर-पोशण, टीकाकरण, सरकारी योजनाओं की रिपोर्टिंग, गर्भवती महिलाओं की मॉनिटरिंग, स्कूल की सूची, और कई बार प्रशासनिक कार्यक्रमों में लगी रहती हैं। आशा कार्यकर्ता भी घर-घर जाकर मरीजों को अस्पताल भेजने, प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल में लगी रहती हैं। इन दोनों पर अब कुपोषण की पहचान और रिपोर्टिंग का भार बढ़ने वाला है। और यह ऐसा बोझ है, जिसे बिना पर्याप्त प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और संसाधन दिए नहीं उठाया जा सकता।

इस सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर बिहार में कुपोषण इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है? इसका जवाब समाजशास्त्रीय भी है और आर्थिक भी। बिहार की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। कई परिवार तीन समय भोजन तक नहीं जुटा पाते। मां का पोषण खराब होने से बच्चे जन्म से ही कमज़ोर होते हैं। जगह-जगह गंदगी है, दूषित पानी है, बार-बार बीमारियां होती हैं, और जब बच्चा हर महीने दो-दो बार बीमार हो जाए तो उसके शरीर का पोषण बन ही नहीं पाता। आंगनवाड़ी में अनियमितता, स्कूलों में मध्याह्न भोजन की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और कुपोषण के प्रति जागरूकता की कमी, ये सभी मिलकर स्थिति को और खराब बनाते हैं।

सरकारी सिस्टम अक्सर कुपोषण को सिर्फ़ ‘बच्चे के कम वज़न के रूप में देखता है। लेकिन यह कम वज़न संस्कृति, गरीबी, बीमारी, सेवा वितरण और प्रशासनिक ढांचे की विफलताओं का संयुक्त परिणाम होता है। एक बच्चा सिर्फ़ भूख से कुपोषित नहीं होता बल्कि वह व्यवस्था की कमज़ोरी से कुपोषित होता है।

सरकार कह रही है कि बच्चों को अस्पताल में दवा, भोजन, दूध और देखभाल की कोई कमी नहीं होगी। यह सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन जब हम बिहार के ग्रामीण अस्पतालों की वास्तविक स्थिति देखते हैं जहां डॉक्टर और दवाइयां नहीं हैं, तो सवाल यह उठता है कि कागज़ पर वादा पूरा होगा या ज़मीन पर? क्योंकि कुपोषण की लड़ाई किताबों से नहीं लड़ी जाती। यह लड़ाई दवा, आहार, पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य प्रणाली की मज़बूती से लड़ी जाती है।

यह भी बताया जा रहा है कि पोषण काउंसलर माताओं को उचित मार्गदर्शन देंगे। यह अच्छी पहल है। लेकिन बिहार जैसे राज्य में, जहां अधिकांश माताएं ख़ुद एनीमिया से पीड़ित हैं, और कई को पोषण संबंधी जानकारी कभी दी ही नहीं गई, वहां काउंसलिंग सिर्फ़ एक चरण है। असली चुनौती है उस काउंसलिंग को क्रियान्वित करना। क्या घर में खाने को पर्याप्त सामग्री होगी? क्या परिवार आर्थिक रूप से सक्षम होगा? क्या महिला के पास पोषण आहार की उपलब्धता होगी? यह सब सवाल अनुत्तरित हैं।

बिहार आंकड़े डराने वाले

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि बिहार में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में लगभग 23 प्रतिशत ‘वेस्टिंग’ है, जो देश में सबसे अधिक में से एक है। वेस्टिंग का मतलब है बच्चा अत्यधिक दुबला होना, और यह स्थिति सीधे-सीधे जान का जोखिम पैदा करती है। इसके अलावा, बिहार में 8.8 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे हैं। यह सिर्फ़ संख्या नहीं ये वे बच्चे हैं जो खेल नहीं पाते, जिनकी हड्डियां बाहर दिखती हैं, जो थोड़ी सी भी बीमारी में अस्पताल पहुंच जाते हैं। ये बच्चे सिर्फ़ सरकारी फाइलों के शब्द नहीं ये बिहार की आने वाली पीढ़ी हैं।

सरकार का यह निर्णय कि मध्यम कुपोषित बच्चों को भी एनआरसी भेजा जाएगा, यह दिखाता है कि राज्य अब स्थिति को सामान्य नहीं मान सकता। लेकिन साथ ही यह भी दर्शाता है कि कुपोषण का दायरा कितना बढ़ चुका है। अब यह बच्चों की बीमारी नहीं यह शासन का टेस्ट है। बिहार यह लड़ाई कैसे लड़ता है, यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में बच्चे स्वस्थ पैदा होंगे या कुपोषण के चक्र में ही फंसे रहेंगे।

कुपोषण एक ऐसी बीमारी है, जिसे इलाज से अधिक रोकथाम की ज़रूरत होती है। और जब रोकथाम विफ़ल हो जाए, तभी इलाज का सहारा लिया जाता है। लेकिन बिहार उस मोड़ पर खड़ा है जहां रोकथाम तो विफ़ल हुई ही है, अब इलाज की व्यवस्था भी चुनौती बन रही है। सरकार के फैसले में गंभीरता है, लेकिन सफल तभी होगा जब स्वास्थ्य उपकेंद्र, आंगनवाड़ी, एनआरसी, आशा कार्यकर्ता, डॉक्टर और नर्स सभी को संसाधन, प्रशिक्षण और सतत मॉनिटरिंग मिले।