कौशल विकास योजना: स्कैम का एक अनोखा रुप?

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का लक्ष्य रोज़गार देना था, लेकिन रिपोर्ट ने योजना की गड़बड़ियों और कमियों को सामने लाकर रख दिया है।
कौशल विकास योजना: स्कैम का एक अनोखा रुप?

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का लक्ष्य रोज़गार देना था, लेकिन रिपोर्ट ने योजना की गड़बड़ियों और कमियों को सामने लाकर रख दिया है।

भारत को विश्व का युवा राष्ट्र कहा जाता है क्योंकि यहां कि युवा जनसंख्या सबसे अधिक है। सरकार सहित हम सब इसे एक उपलब्धि मानते हैं। लेकिन समस्या तब होने लगती है जब बात इन युवाओं को रोज़गार देने की आती है। भारत में बेरोज़गारी की समस्या सालों से बनी हुई है। हर सरकार द्वारा इसके समाधान के लिए योजनाएं तो लाई जाती हैं, पर वो योजनाएं अक्सर भ्रष्टाचार के बोझ के तले दब कर रह जाती हैं। वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। पर आज भाजपा सरकार को अपना तीसरा कार्यकाल शुरु किए डेढ़ साल से ज़्यादा हो चुका है पर बेरोज़गारी की समस्या अब भी अपना विकराल रुप लिए खड़ी है। हालांकि साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की शुरुआत ज़रूर की गई थी। पर अब सीएजी की हालिया जारी की गई रिपोर्ट को देख कर पता चलता है कि इस योजना ने युवाओं को रोज़गार के अवसर से ज़्यादा इससे जुड़े लोगों को फर्जीवाड़े के अवसर दिए हैं।

हाल में सीएजी (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक)  की रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना कि ख़ामियों और इससे जुड़े भ्रष्टाचार को उजागर किया है। 2015 से 2022 तक तीन चरणों में चलने वाली इस योजना का बजट 14,450 करोड़ रुपया था, जिनमें से 10,194 करोड़ रुपए का फंड रिलीज़ किया गया और 9,261 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 

मंत्रालय का दावा था कि इस योजना के तहत 1.32 करोड़ युवाओं को कुशल बनाने का लक्ष्य था। जिसका पीछा करते हुए मंत्रालय ने 1.1 करोड़ युवाओं को सर्टिफिकेट दिया जो कि योजना का लगभग 83% भाग है। पर सीएजी का कहना है कि यह केवल कागज़ों पर दिखने वाली सफलता है जिसके पीछे है आंकड़ों के साथ किया गया खेल!

क्या है सीएजी की रिपोर्ट में?

इस स्कीम की सबसे बड़ी आलोचना दीर्घकालिक योजना की कमी को लेकर थी। साथ ही इस योजना के तहत कंस्ट्रक्शन, लॉजिस्टिक्स, ब्यूटी एंड वेलनेस, फर्नीचर एंड फिटिंग्स तथा टूरिज्म जैसे हाई डिमांड के सेक्टर में 60% की ट्रेनिंग होनी थी। पर इन सेक्टर्स में केवल 22.7% ट्रेनिंग हुई और कम डिमांड वाले सेक्टर्स जैसे कि रिटेल और इलेक्ट्रॉनिक्स में 40% से ज्यादा ट्रेनिंग कराई गई।

सबसे चिंताजनक स्थिति रही प्लेसमेंट को लेकर। इस योजना का मूल उद्देश्य था युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना। लेकिन 56 लाख लाभार्थियों में से केवल 41% लाभार्थियों को ही नौकरी मिल पाई, जबकि लगभग 33 लाख युवा बेरोज़गार ही रह गए। इसके अलावा कुछ राज्यों में फर्जी प्लेसमेंट के दस्तावेज़ तक जमा किए जाने के मामले सामने आए हैं।

अब ऐसे में प्रश्न अधिकारियों के साथ-साथ सरकार पर भी उठते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जीरो टॉलरेंस की बात करने वाली सरकार की इतनी बड़ी लागत वाली योजना में इस तरह की धांधली आखिर हुई कैसे?

कैसे किया गया फर्जीवाड़ा?

रिपोर्ट में फर्जीवाड़े के एक नहीं कई मामले सामने आए हैं। रिपोर्ट बताती है कि योजना में शामिल 95 लाख प्रतिभागियों में से लगभग 90 लाख प्रतिभागियों यानी कि लगभग 94% प्रतिभागियों का बैंक खाता विवरण ही नहीं मौजूद था। बाकी बचे प्रतिभागियों में से 52,381 के लिए 12,122 बैंक खातों के विवरण दोहराए गए थे। जिससे प्रशिक्षण पूरा करने के बाद मिलने वाली 500 रुपए की राशि कभी उनतक पहुंच ही नहीं पाई। इतना ही नहीं जिन प्रतिभागियों के खाते नंबर अलग थे उनमें से भी कईयों के खाता नंबर की जगह 111111, 12345678, उनके नाम, कोर्स के नाम इत्यादि लिख दिए गए थे।

 

इसके अलावा 10 लाख से अधिक प्रतिभागियों के ईमेल एड्रेस नादारद थे और जिनके मौजूद थे उनमें से कईयों के ईमेल दोहराये गए थे और कई जगह ईमेल की कॉलम में abcd@gmail.com तथा 123@gmail.com लिख दिए गए थे। फोन नंबर के मामले में भी यही हाल था। लगभग 87,000 मोबाइल नंबर ऐसे थे जिनमें दस से कम डिजिट थे या नंबर की जगह पर 1000000000 अथवा 1111111111 लिखे हुए थे।

साथ ही योजना के तहत ट्रेनिंग देने वाली कंपनियों द्वारा भी काफ़ी हेर-फेर किया गया है। एनएमपी नामक एक कंपनी ने प्रशिक्षण खत्म होने के बाद अपलोड किए जाने वाले फोटो के स्थान पर एक ही फोटो को अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग केंद्रों से अपलोड कर दिया। 

प्रारंभिक ऑडिट के दौरान पाया गया कि एनएसडीसी द्वारा प्रेजेंट मीडिया नाम की कंपनी के लिए जो प्रशंसापत्र पेश किए हैं, उनमें से तीन प्रशंसापत्र समान थे, जिनमें केवल फोटो बदल दिए गए थे और इनमें से दो के तो हस्ताक्षर भी एक थे। इस कंपनी ने भी एक ही फोटो अलग-अलग बैच के लिए अपलोड कर दिया था। 

इसके अलावा ऑडिट से पता चला कि योजना में एक ऐसी कंपनी भी शामिल थी जिसने 2014-15 के बाद रजिस्टर ऑफ कंपनीज़ में रिटर्न दाखिल ही नहीं किया था। रेडिएट डिज़ाइन्स नाम की इस कंपनी ने योजना के तहत मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र में 15,218 प्रतिभागियों को प्रमाणित करने का दावा किया था, जबकि उसके पास कोई सत्यापित कार्यालय या संबंधित अनुभव था ही नहीं। 

यही नहीं कई मामलों में इन प्रशिक्षण केन्द्रों के भौतिक निरीक्षण करने वाले अधिकारियों के काम में भी गड़बड़ी नज़र आई है जहां एक ही अधिकारी नें एक ही दिन में एक से अधिक राज्यों के प्रशिक्षण केन्द्रों का निरीक्षण कर लिया।

क्या है मंत्रालय की सफाई?

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में सीएजी द्वारा इंगित खामियों पर मंत्रालय ने सफाई देते हुए कहा कि ज़मीनी स्तर की व्यावहारिक दिक्कतों के कारण बैंक खाता विवरण को बाद में गैर-अनिवार्य किया गया था और भुगतान आधार-सीडिंग के माध्यम द्वारा डीबीटी से किया गया था। 

मंत्रालय ने बताया कि, मोबाइल नंबर या ई-मेल आईडी अनिवार्य नहीं थी क्योंकि अधिकांश प्रशिक्षु अनियमित श्रमिक, किसान और महिलाएं थीं, जिनके पास मोबाइल या ई-मेल होने की संभावना कम होती है। मंत्रालय ने किसी भी वित्तीय अनियमितता से इनकार करते हुए बताया कि सभी भुगतान डीबीटी के ज़रिये हुए हैं और कोई भी डुप्लीकेशन नहीं हुआ है। 

निरीक्षण के दौरान एक ही निरीक्षक के विभिन्न स्थानों पर मौजूद दिखने के मामले में मंत्रालय ने तकनीकी और नेटवर्क कारणों का हवाला दिया और जून 2025 में बताया कि अब प्रत्येक निरीक्षक के लिए अलग लॉगिन बनाए गए हैं और ऐप को इस तरह अपडेट किया गया है कि निरीक्षक केवल रियल-टाइम जियो-टैग्ड तस्वीरें ही अपलोड कर सकेंगे और मोबाइल गैलरी से फोटो अपलोड नहीं हो पाएगा।

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का लक्ष्य युवाओं को रोज़गार देना था, लेकिन सीएजी की रिपोर्ट ने योजना की दस्तावेज़ी गड़बड़ियों और कार्यान्वयन में कमियों को सामने लाकर रख दिया है। इससे ये स्पष्ट होता है कि आंकड़ों में दिख रही सफलता के पीछे वास्तविक ज़मीनी असर मौजूद नहीं है। यह साफ़ करता है कि योजनाओं की सच्ची सफलता केवल पारदर्शी क्रियान्वयन और जवाबदेही से ही सुनिश्चित की जा सकती है।